मॉरीशस में भारतीय संस्कृत और उसे घेरे चुनौतयाँ : अभमन्यु अनंत

जिन दिनों भारतीय संस्कृति अपनी पराकाष्ठा पर थी, उन दिनों विश्व के कई देशों को ‘रामायण का देश’ कहकर संबोधित किया जाता था। वह चाहे थाईलैंड, मलेशिया, श्रीलंका रहे हों या जावा, सुमात्रा, बाली। यही नहीं, इनसे भी दूर तक फैले देशों में भारत की भाषा और महाभारत तथा अन्य भारतीय ग्रंथों की कथाएँ अपनी सांस्कृतिक छाप के साथ वहाँ के जनजीवन से जुड़ी हुई थीं। उन दिनों फ्रांसीसी भाषा और संस्कृति एक दायरे तक सीमित थी। आज फ्रांसीसियों की भाषा और सांस्कृतिक स्वाभिमान के कारण पूरी तस्वीर बदल गई है। फ्रांसीसी संस्कृति और भाषा विश्व के इस छोर से उस छोर तक फैलती जा रही है, पर भारतीय संस्कृति और भाषा, दूसरे देशों की बात तो दूर रही, खुद अपनी जमीन से उखड़ती-सी प्रतीत हो रही है।
इतना कुछ होते हुए भी विश्व में चंद देश आज भी ऐसे हैं, जहाँ भारतीय संस्कृति वहाँ के जनजीवन की सबसे बड़ी धरोहर ही नहीं, बल्कि उनकी अस्मिता भी है और उन देशों में सबसे प्रमुख मॉरीशस है, जिसे करीब 200 वर्ष पहले भारत से पहुँचे मजदूरों ने मारीच देश कहा था। उस देश में ‘रामायण’ की गूँज शुरू हुई, तो लोगों के बीच मरहम को मिले आशीर्वाद की सार्थकता का एहसास होना शुरू हो गया था। भारतीय आप्रवासियों की उस पहली घड़ी से आज तक मॉरीशस राम नाम के गुंजन का द्वीप बना रहा है।
आज के आधुनिक मॉरीशस में, जिसे विकासशील देशों में प्रमुखता दी जाने लगी है, ‘रामायण’ के सत्संग भी उसी रफ्तार के साथ विकसित होते रहे हैं। जीवन के सबसे विकट क्षण में, जब किसी आत्मीय जन के निधन की शोकाकुलता मन को व्यथित करती है, ‘रामायण’ ही परिवार के आत्मीय जनों को धीरज बँधाती है। मृत्यु के समय और उसके 7 दिन बाद तक ‘रामचरितमानस’ की चौपाइयाँ और दोहे शोकाकुल परिवार को सांत्वना प्रदान करते हैं और जीवन को फिर से बल देते हैं।
मॉरीशस में भारतीय संस्कृति व परंपरा पूर्णतया जीवित है, क्योंकि इसे संजोया और संवारा है वहाँ के आदमियों ने। यही कारण है कि वह संस्कृति और परंपरा एक सूत्र में पिरोई हुई-सी मिलती हैं। आधुनिकता की सारी उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए भी मॉरीशस के गाँवों और शहरों ने भारतीय परंपरा से जुड़कर रामायण के प्रति अपनी आस्था को बनाए रखा है। वे सत्संग चाहे झाँझ-ढोलक के साथ हों, चाहे गीत-भजनों के साथ हों या पाठ और विवेचन के रूप में, वे आज भी उसी श्रद्धा और अनुराग के साथ होते हैं।
अंतर केवल इतना है कि मॉरीशस में भारतीयों के आगमन के समय यातना शिविरों जैसी बस्तियों में होते थे, आज वे भव्य पंडालों, शानदार घरों और रेडियो-टेलीविजन के जरिए हो रहे हैं। वहाँ भारतीय विषयों पर केवल गाँवों और गलियों के नाम ही नहीं रखे गए हैं, बल्कि सिनेमाघरों, दुकानों और बसों तथा लारियों के नाम भी नालंदा, सूर्यवंशी, बनारस, सम्राट अशोक तथा अजंता आदि रखे गए हैं। भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में यहाँ डाक टिकट भी समय-समय पर निकलते रहे हैं।
मॉरीशस वह देश है जहाँ प्रगति और आधुनिकता के पारंपरिक मूल्यों को नकार कर नहीं, स्वीकार किया गया है, बल्कि उन्हें बनाए रखा गया है। भारतीय संस्कृति, भाषा और धर्म के यदि विस्तार की चर्चा करें, तो हमारे लिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन परिस्थितियों की ओर एक बार ध्यान दें, जिनके बीच से होकर सफेद सोने यानी शक्कर के देश में भारतीय संस्कृति आंतरिक शक्ति के रूप में फैली हुई है। वहाँ प्रगति के नाम पर संस्कृति की नीलामी नहीं हुई तथा औरों के मुखौटे को अपने चेहरे पर लगाकर अति आधुनिक होने के फख्र से भी अभी वह देश मुक्त है। सभी आधुनिक सुविधाओं और तामझाम के बीच भी आनंद और आत्मशांति की तृप्ति वह अभी तीज-त्योहारों और सांस्कृतिक उत्सवों से ही प्राप्त की जाती है।
इतिहास के छात्र इस बात को जानते हैं कि भारत में जब अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब दो प्रमुख सामरिक सेनापति थे—क्लाइव और डुप्ले। मॉरीशस में फ्रांसीसियों का राज्य था। भारत में अपनी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अंग्रेजों की नजर मॉरीशस पर गई, क्योंकि वह एक ऐसे सामरिक महत्त्व का क्षेत्र था, जहाँ से हिंद महासागर पर धाक जमाई जा सकती थी। अंग्रेजों ने मॉरीशस पर आक्रमण किया और उसे फ्रांसीसियों से जीत लिया। फ्रांसीसियों ने हारकर सत्ता तो अंग्रेजों के हवाले कर दी, लेकिन अपनी सांस्कृतिक शक्ति अंग्रेजों के हवाले नहीं की। इसका परिणाम यह हुआ कि मॉरीशस अंग्रेजों के कब्जे में तो आ गया, पर फ्रांसीसियों की सांस्कृतिक पकड़ के कारण फ्रेंच भाषा वहाँ पर जोर पकड़ती गई और उसके साथ ही उसका साहित्य और संस्कृति विस्तार पाते गए।
विश्व के अन्य देशों में भारत जहाँ अपने सांस्कृतिक प्रभाव व लोकप्रियता को गँवाने लगा है, वहीं फ्रांस धीरे-धीरे उसे बनाने लगा है। वे देश भी अब फ्रेंचभाषी देश या फ्रेंचान्मुख कहलाने लगे हैं, जो कल तक राम और बुद्ध के रंगों में रंगे हुए थे। श्रीलंका, इंडोनेशिया और बर्मा जैसे देशों से भी भारतीय संस्कृति लुप्त होती जा रही है।
भारतीयों के आप्रवास के समय मॉरीशस पर अंग्रेजों का राज्य शुरू हो चुका था, पर जमीन के अधिकारी फ्रेंच थे। उन्हीं की शक्कर की कोठियों में काम करने के लिए भारतीय गिरमिटिया मजदूर के रूप में पहुँचे थे। खाली हाथ नहीं गए थे। उनके साथ थे रामचरितमानस, हनुमान चालीसा जैसे धार्मिक ग्रंथ और उन्होंने गंगा की आस्था और हिमालय का संकल्प लिए अनजान और बंजर धरती पर पाँव रखे थे।
मॉरीशस में और भी कई देशों के लोग और भी आए-गए, पर चट्टानों की भूमि, तूफानों के उस देश से लौटते रहे। भारतीयों ने अपने आत्मविश्वास के बल पर चट्टानों की छातियों को चीरकर उनमें गन्ने उगाए। हिमालय की सहनशीलता के साथ हर तूफान का सामना किया। भारतीयों को वहाँ प्रलोभन देकर ले जाया गया था कि वह देश में पत्थरों को उलटने से सोना मिलता है। उन्हें पत्थर उलटकर सोना तो नहीं मिला, पर उनके माथे से भी पसीने की बूँदें खेतों में मोती के रूप में उगती रहीं।
उन्हें जहाँ रोटी के लिए पानी के साथ खून भी बहाना पड़ा, वहाँ उन्होंने पथरीली और बंजर जमीन को हरा-भरा बनाया और संस्कृति, धर्म और भाषा के दारुण दंड भी झेले, फिर भी अभियान जारी रहा। दूसरी ओर फ्रांसीसियों को जहाँ उन मजदूरों के पसीने की बूँदों को निचोड़कर अपनी तिजोरियाँ भरनी थीं, वहीं उन्हें उन बेबस भारतीयों पर भाषा, संस्कृति और अपना धर्म भी थोपना था, ताकि कुली कहलाने वाले अपनी जड़ और पहचान से कट जाएँ और हमेशा के लिए उनके दास बनकर रह जाएँ। अपने मंतव्य की पूर्ति के लिए फ्रांसीसी पूँजीपतियों ने ऐसा कुछ नहीं किया, खैर… यह तो अलग विषय बन जाता है।
इतिहास वैसे भी झूठ बोलता है और मॉरीशस में तो वह एक गूँगा भी बना रहा। इतिहास का गूँगा होना उसके झूठ बोलने से अधिक खतरनाक होता है। झूठ तो बस तब बोला जाता है, जब इतिहास लिखवाए जाते हैं। उसमें अध्याय, पन्ने, आर्थिक व राजनीतिक सत्ता के बल पर लिखवाए जाते हैं। इतिहास का गूँगा होना मॉरीशस में इतिहास की हत्या-सा लगता है।
मार्क ट्वेन जैसे लेखक को मॉरीशस यात्रा के दौरान यह कहने को विवश हो जाना पड़ा कि भगवान ने पहले मॉरीशस को बनाया होगा, फिर उसकी नकल पर स्वर्ग को बनाया होगा। लेकिन बंजर भूमि को स्वर्ग बनाने वाले उन महान भारतीय मजदूरों को अब कौन जानता है? उनके नाम खुद इतिहास में नहीं मिलते, जिन्होंने खुद इतिहास का निर्माण किया।
