विस्थापन: अपना निर्णय या नियति (संस्मरण) : सुषमा मल्होत्रा
इस संस्मरण में सुषमा मल्होत्रा ने कुल्लू में अपने अनुभवों को अत्यंत दिलचस्प भाषा-शैली में वर्णित किया है। पर्वतीय क्षेत्र में रहने का उनका सपना कुल्लू आकर ही पूरा हुआ। पहले तो उन्हें कुल्लू में अति आत्मीय भाव से स्वीकार किया गया; लेकिन, बाद में उन्हें अहसास हुआ कि मूल रूप से पंजाब की निवासी होने के कारण, उनके साथ लोगों का व्यवहार आत्मीय नहीं रहा. खट्टे-मीठे अनुभवों से सज्जित यह संस्मरण पठनीय है। – संपादक, डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
लेखिका का परिचय
*सुषमा मल्होत्रा, न्यू जर्सी , अमेरिका
*लेखिका एवं शिक्षिका
*सुषमा मल्होत्रा के तीन हिंदी काव्य संग्रह और एक अंग्रेजी काव्य संग्रहप्रकाशित। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में निरंतर लेखन। देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में, साझा काव्य संग्रह और कहानी संग्रह में भी प्रकाशित।
*अमेरिका और भारत की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत। हिंदी शिक्षा के लिए ‘अमेरिकी संघीय अनुदान’ की प्राप्ति।
*न्यूयॉर्क राज्य शिक्षा विभाग में हिंदी और पंजाबी की रीजेन्ट्स परीक्षाएँ आरम्भ की।
*संस्थापक अध्यक्ष, ‘निर्मल रोशन साहित्यिक मंच अमेरिका’
*अध्यक्ष, ‘अखिल विश्व हिंदी समिति न्यूयार्क, न्यू जर्सी चैप्टर।’
*Email:- sushmam626@gmail.com

“विस्थापन: अपना निर्णय या नियति”
मैं 1991 में कुल्लू, हिमाचल प्रदेश भारत से न्यूयार्क, अमेरिका में अपने पति और बेटों के साथ आकर बस गई थी। मैं लगभग हर दूसरे वर्ष अमेरिका से भारत जाती रहती थी। लेकिन, मुझे कुल्लू वापिस जाने का अवसर लगभग दस वर्ष बाद मिला। मैं हमेशा से कुल्लू जाकर पुरानी यादें ताज़ा करना चाहती थी। मैंने कुल्लू जाने के लिए दिल्ली से फ़्लाइट लेने का फ़ैसला किया। मैं और मेरे पति इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पहुँचे और चेक-इन करके जहाज पर चढ़ने का इंतज़ार करने के लिए बैठ गए। दिल्ली का मौसम मेरे कुल्लू जाने के फ़ैसले का साथ नहीं दे रहा था। बारिश शुरू होने के कारण फ़्लाइट में देरी हो रही थी। लेकिन, मेरी सहेली कुल्लू में अब एक प्रिंसिपल हैं जिनके पति फ़ोन पर हमसे बात कर रहे थे। वे हमारा इंतज़ार कर रहे थे और इतने वर्षों के बाद हमसे मिलने के लिए उत्साहित थे।
मुझे आज भी हैरानी होती है कि मैं चार वर्ष हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में कैसे रही। हम पंजाब से वहाँ क्यों गए थे? हालात क्या थे? हालाँकि, मैंने हमेशा प्रकृति से घिरे और किसी जलाशय—चाहे छोटा हो या बड़ा—के बहुत पास एक लकड़ी के घर में रहने का सपना देखा था। शायद भगवान ने प्राकृतिक वातावरण में रहने की परिस्थितियाँ बनाकर मेरा सपना पूरा किया था। एयरपोर्ट पर बैठे-बैठे मुझे वह दिन याद आया जब मेरे पति ने मुझे एक खबर दी थी और उस खबर से मैं बहुत हैरान रह गई थी। जब मेरे पति ने मुझे बताया था कि एक जूनियर साइंटिस्ट को प्रमोट करके उनसे सीनियर पद दे दिया था, जो एक साइंटिस्ट के लिए बेहतर पद था। वे बहुत परेशान थे, लेकिन बेबस भी थे। मैंने उनसे पूछा, “अब क्या होगा?” उन्होंने कहा, “होना क्या? कुछ नहीं।“ फिर, कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा कि वे अब पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के इलावा किसी और विश्वविद्यालय में भी नौकरी ढूँढना आरम्भ करेंगे।
मैंने कहा, “अरे नहीं। हमने अभी-अभी अपना घर बनाने का कार्य पूरा किया है जो इस यूनिवर्सिटी के बिल्कुल पास है। हमारा अपना पहला घर है।”
“तो क्या हुआ? मैं अपने से जूनियर के अधीन काम नहीं कर सकता। अगर मैं अभी उसे अपना सीनियर मान लेता हूँ, तो वह जीवनभर मेरा सीनियर ही बना रहेगा।” यह कहकर वे दूसरे बेडरूम में चले गए और लाइट बंद कर दी।
हमारी शादी 1978 में हुई थी। वह पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के प्लांट ब्रीडिंग डिपार्टमेंट में मक्का (maize) पर स्पेशलाइज़ेशन के साथ अपनी पीएच. डी. कर रहे थे। उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से बी.एससी. और एम.एससी. किया था। उन्होंने अपनी पीएच. डी. जारी रखी और उसी यूनिवर्सिटी में काम करने का सपना भी देखा। भला कौन नहीं देखेगा? मुझे दु:ख हो रहा था कि मैं इस समय उनकी मदद नहीं कर सकती थी ।
जब वह अपनी पीएच. डी. में व्यस्त थे, तो मैंने लुधियाना के सेक्रेड हार्ट कॉन्वेंट स्कूल में हाई स्कूल के छात्रों को इंग्लिश और भूगोल पढ़ाना शुरू किया था। मेरे पति ने शादी से पहले एक प्लॉट भाई रणधीर सिंह नगर, लुधियाना में ख़रीदा लिया था, जो विश्वविद्यालय और मेरे स्कूल के पास एक नई कॉलोनी में था। धीरे-धीरे हमारा अपना घर बनाने का सपना पूरा हुआ और साल 1982 में हम अपने दोनों बेटों के साथ उस घर में रहने लग गए थे। कुछ दिनों के बाद पति ने मुझे बताया कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश कृषि विश्विद्यालय में इसी तरह की नौकरी के लिए आवेदन पत्र भर दिया है। एक महीने से भी कम समय में उन्होंने इंटरव्यू दिया और उन्हें वहाँ पर नौकरी भी मिल गई थी।
यह उस समय की बात है जब वर्ष 1986 में पंजाब मुश्किल, तनावपूर्ण और अनिश्चित दौर से गुज़र रहा था। अल्पसंख्यक होने के कारण वे इस भेदभाव का विरोध नहीं कर सकते थे। उनके साथियों ने उन्हें सलाह दी कि वे यह कृषि विश्वविद्यालय न छोड़ें, लेकिन उन्होंने उनसे पूछा कि अगर उनके साथ ऐसा होता तो वे क्या करते। यह एक ऐसी मुश्किल स्थिति थी जिसमें या तो हार मानकर जो हुआ उसे स्वीकार कर लिया जाए, या फिर अपनी बसी-बसाई ज़िंदगी छोड़कर किसी दूर-दराज़, अनजान पहाड़ी इलाके में चले जाया जाए, जहाँ लोग सिर्फ़ छुट्टियों में जाते हैं। जब उन्होंने कुल्लू जाकर हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय में काम करने का निर्णय लिया, तो मुझे भी अपने स्कूल में इसकी जानकारी देनी पड़ी। मैं वर्ष 1978 से सेक्रेड हार्ट कान्वेंट स्कूल में पढ़ा रही थी और 1987 में मुझे नौकरी छोड़नी पड़ रही थी, जबकि हमारे दोनों बेटे शहर के इस प्रतिष्ठित स्कूल में ही पढ़ भी रहे थे। कम उम्र और दुनियादारी का कम अनुभव होने के कारण मैं मार्च 1987 में अपने पति के साथ कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) की और चली गई और वहाँ भुंतर में किराए के घर में रहने लगी। भुंतर एक छोटा सा कस्बा है परन्तु भुंतर में एयरपोर्ट है, जहाँ से लोग कुल्लू और मनाली के लिए उड़ान भर कर जाते हैं।
इस विस्थापन से जुड़ी अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। हमें सीधे तौर पर घर छोड़ने या कहीं और जाने के लिए मजबूर नहीं किया गया था, लेकिन हमें परोक्ष रूप से एक प्रतिकूल संदेश मिला था। हिमाचल कृषि विश्विद्यालय में मेरे पति की मुलाक़ात पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना के कुछ युवा कृषि वैज्ञानिकों से हुई और उनसे मिलकर इनको अच्छा लगा। वहाँ की यादें और बातें वे साझा कर सकते थे। ये हिमाचल प्रदेश के मुकाबले में एक प्रसिद्ध पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से आए थे, इसलिए उनका यहाँ पर स्वागत और सम्मान किया गया। मैंने देखा कि वे अब काफ़ी सहज महसूस कर रहे थे।
एक दिन मैं कुल्लू के कॉन्वेंट स्कूल, “आवर लेडी ऑफ़ स्नो” में अपने बेटों को पहली और दूसरी कक्षा में दाखिल करवाने गई। मैं स्कूल के प्रिंसिपल से मिली और उन्हें बताया कि हम पंजाब से आए हैं। मैं उनके अध्यापकों से भी मिली और उन्हें बता दिया कि हमारे बेटे इस शहर में नए हैं और उन्हें घुलने-मिलने में थोड़ा समय लग सकता है। लगभग एक सप्ताह के बाद मुझे उसी स्कूल से फ़ोन आया कि कोई एक अध्यापक जो छुट्टी पर जा रहा है तो क्या मैं उसकी जगह कुछ समय के लिए पढ़ा सकती हूँ। मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं अभी नए वातावरण में नौकरी करने के लिए तैयार नहीं थी। मुझे यहाँ पर समांजस्य स्थापित करने के लिए समय की आवश्यकता थी। प्रकृति के करीब रहते हुए, मुझे अंग्रेज़ी साहित्य की अपनी पढ़ाई—रोमांटिक कवि कीट्स, वर्ड्सवर्थ और शेली—की यादें ताज़ा हो आईं। मैंने प्रकृति का आनंद लेना शुरू कर दिया और अधिकतर कविताएँ प्रकृति पर लिखनी भी आरम्भ कर दी थीं। पहाड़ियों से घिरी ब्यास नदी और कुल्लू घाटी, जहाँ दिन छोटे और रातें लंबी होती थीं, प्रकृति के बीच रहने का मेरा एक स्वप्न सत्य होने जैसा था।
परन्तु मेरी किस्मत में कुछ और ही लिखा था; एक महीने बाद आवर लेडी ऑफ़ स्नो स्कूल के प्रिंसिपल ने स्वयं मुझे मिलने के लिए बुलाया। उस दिन बिना कारण जाने मैं उनसे मिली और उन्होंने मुझे हाई स्कूल के छात्रों को इंग्लिश और भूगोल जो कि मेरे विषय थे, पढ़ाने की नौकरी का ऑफ़र देकर मुझे हैरान कर दिया। कुछ समय और थोड़ा सहज महसूस करने के बाद, मैंने ‘आवर लेडी ऑफ़ द स्नोज़ स्कूल’ कुल्लू में पढ़ाने का फ़ैसला किया। इस स्कूल में पढ़ाने से मैं स्कूल और शहर के अन्य लोगों से जुड़ी। शायद, किस्मत और भगवान यही चाहते थे कि मैं उस शहर में अच्छी तरह बस जाऊँ। मोहल में एक दयानन्द पब्लिक स्कूल था और कुछ दिनों के बाद वहाँ के मैनेजमेंट ने मुझसे संपर्क किया। उन्होंने मुझे प्रिंसिपल पद के लिए आवेदन-पत्र भरने का सुझाव दिया। यह सोचते हुए कि मैं युवा हूँ और मुझे इतनी ज़िम्मेदारी वाली नौकरी नहीं मिलेगी, मैंने दयानन्द पब्लिक स्कूल, मोहल में प्रिंसिपल पद के लिए आवेदन-पत्र भर दिया। दयानन्द पब्लिक स्कूल मैनेजमेंट बोर्ड ने दिल्ली से आकर सुंदरनगर में सभी उम्मीदवारों का साक्षात्कार किया। कुछ समय पश्चात मैं हैरान हो गई जब मुझे टेलीग्राम से सन्देश मिला कि मुझे प्रिंसिपल पद के लिए सर्वसम्मति से चुन लिया गया था।
इस तरह सितंबर 1987 में, मैं डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल, मोहल, कुल्लू की प्रिंसिपल बन गई थी। अब हम एक किराए के घर से निकलकर, आलूबुखारे और सेब के बाग के बीच बने हुए एक बड़े और नए घर में रहने लगे। अब समय घर, बच्चों की देखरेख और नौकरी की जिम्मेदारियों में बीतने लगा। जल्द ही, मुझे डी.ए.वी. मैनेजमेंट, कानूनी सलाहकारों, डिप्टी कमिश्नर और हिमाचल प्रदेश के मंत्रियों के साथ उनकी लोकल और नेशनल मीटिंग्स में शामिल होना पड़ता था। पंजाब लौटने की मेरी इच्छा धीरे-धीरे कम हो रही थी। मुझे इन सब में ईश्वर की मौजूदगी महसूस हुई और अब मैं कोई शिकायत नहीं कर सकती थी। वर्ष 1988 में मैंने स्कूल को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (Central Board of Secondary Education) से संबद्ध कराने के लिए आवेदन दे दिया। यह कोई आसान प्रक्रिया नहीं थी, लेकिन मैंने पहल करने का फ़ैसला किया और और प्रक्रिया शुरू कर दी थी। यहाँ याद करते हुए एक बहुत ही ख़ुशी की अनुभूति हो रही थी कि उन दिनों महामहिम राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमन जी गर्मियों में कुल्लू-मनाली आते थे।
कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर उनके सम्मान में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते थे और उनके स्वागत के लिए कुल्लू मनाली के आसपास के क्षेत्र के प्रधानाध्यापकों को आमंत्रित भी करते थे। मुझे भी दो बार पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमन जी से मिलने और स्वागत करने का अवसर प्राप्त हुआ। दयानन्द पब्लिक स्कूल के छात्रों ने दोनों बार राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमन जी के स्वागत में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। राष्ट्रपति श्री वेंकटरमन जी से मिलने के अलावा, मुझे और मेरे स्टाफ को वर्ष 1988 में फर्स्ट लेडी जानकी वेंकटरमन और 1989 में उनकी बेटी पद्मा वेंकटरमन से मिलने और उनका अभिवादन करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।
धीरे-धीरे हम मणिकरण के गुरुद्वारे, मनाली, हडिम्बा देवी का मंदिर, रोहतांग पास और बिजली महादेव को देखने भी चले गए थे। ये सब जगह बहुत ही सुकूँ देती थीं। उन्हीं दिनों मुझे स्कूल से संबंधित हिमाचल प्रदेश के एक मंत्री से मिलना था। जब मेरा परिचय उनसे कराया गया, तो उन्होंने अचानक मुझसे पूछा, “क्या आप बाहर से हैं?” मैं उनकी बात समझ नहीं पाई। इसलिए मैंने उनसे पूछा, “जी बाहर से हैं, मैं समझ नहीं पाई। तो उन्होंने उत्तर दिया, “मेरा मतलब है कि आप हिमाचल प्रदेश से नहीं हैं।“ हैरान होकर मैंने जवाब दिया, “जी, हाँ और नहीं भी। हम लुधियाना, पंजाब से आए हैं क्योंकि मेरे पति पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में काम करते थे और अब उन्हें हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय में साइंटिस्ट की नौकरी मिली है। दूसरी बात, मेरे बड़े जेठ (पति के भाई) हिमाचल प्रदेश में जोगिंदर नगर रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर के तौर पर काम करते हैं।“ यह कहते हुए मेरा चेहरा थोड़ा लाल हो गया और कमरे में उपस्थित सभी लोग मुझे देखने लगे थे। “यहाँ के नहीं हैं” वाली बात हमेशा मेरे मन में रही। मैं अपने ही देश में एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने के दर्द को महसूस करने लगी थी। हर किसी की नज़र में स्वयं के लिए, “बाहर से हो” के भाव ढूंढने लगी थी। उस घटना के बाद, मैंने इसे अपने पिता जी के उस फ़ैसले से जोड़ा, कई वर्ष पहले जिसके तहत वे यू.पी. के चंदौसी शहर से पंजाब के अमृतसर शहर में रहने चले गए थे। वे चंदौसी के नॉर्दर्न रेलवे इंस्टीट्यूट में इंस्ट्रक्टर के तौर पर काम करते थे। वहाँ दस साल काम करने के बाद उन्होंने पंजाब जाने का फ़ैसला किया। शायद, उन्हें भी एहसास हुआ होगा कि चंदौसी उत्तर प्रदेश में वे “बाहर से” हैं और पंजाब लौटना अपने ही राज्य (घर) में लौटने जैसा है। कौन जाने, जिंदगी में विस्थापन या जगह बदलना इंसान का अपना निर्णय होता है या पहले से किस्मत में निश्चित होता है।
