दिन विशेष कविता में राकेश मिश्रा की कविताएँ

राकेश मिश्र ओंटारियो, कनाडा में निवास करते हैं। उनका जन्म भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और ओंटारियो स्थित सेनेका कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। राकेश अमेरिका और कनाडा से प्रमाणित सीपीए हैं, और भारत, अमेरिका तथा कनाडा की कई निजी कंपनियों में वित्तीय विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में वे एक निजी कंपनी में वित्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
हिंदी साहित्य, विशेष रूप से कविता और कहानियों के अध्ययन में उनकी गहरी रुचि है। वे हिंदी राइटर्स गिल्ड कनाडा के सक्रिय सदस्य हैं और संस्था की गोष्ठियों में नियमित रूप से भाग लेते हैं।

Rakesh mishra

कुएँ का मेंढक

किसी मेंढक को शायद
कुआँ ही अच्छा लगता हो
उसी ठहरे पानी में
उसने जीना सीखा है
वहाँ की गुनगुनी गर्माहट
शायद उसे माँ की गोद-सी लगती होगी
जहाँ भरोसा अधिक और डर कम है

तो क्या बुरा है कुएँ का मेंढक बने रहना?
पर अगर कभी वह दीवार लाँघ जाए
थोड़ा बहते पानी को छुए और लौट भी आए
तो भी खाली नहीं लौटेगा।
क्योंकि तब कुआँ सिर्फ़ ठहरा पानी नहीं रहेगा
उसमें थोड़ा-सा साहस
थोड़ी सी ऊष्मा और घुल चुकी होगी।

घर कहाँ है…?

क्या जन्म की मिट्टी,
या बचपन की स्मृतियाँ?
क्या कर्म की भूमि,
या अपनों का आँगन?
आज का ठिकाना,
या जीवन संध्या?

मैं किस भूमि का बीज था,
और कहाँ का वृक्ष बन खड़ा हूँ?

शायद घर कोई स्थान नहीं
एक अवस्था है,
जहाँ मैं स्वयं में पूर्ण हो जाऊँ।

घर
एक घर था कभी।
विश्वास था कि
जीवन की अंतिम धूप
उसी आँगन में बैठकर देखूँगा।
उसकी दीवारों पर सिर्फ़ रंग नहीं थे,
वे हमारी संतुष्टि के चिह्न थे।
खिड़कियों के बाहर ऋतुएँ बदलती थीं,
और भीतर जीवन अपने रंग भरता था।
गर्मी की रातें, बर्फ़ीली सुबहें,बच्चों की किलकारियाँ,
मित्रों की उदारता ,सबने मिलकर उसे घर बनाया था।
फिर समय ने पुकारा,और हमें आगे बढ़ना पड़ा।
लंबे समय तक
मैं सपनों में वहाँ लौटता रहा।
सब कुछ वैसा ही दिखता,
पर मन में एक डर बना रहता
कि अब वह घर मेरा नहीं रहा,
और उसका नया मालिक कहीं आ न जाए।
फिर भी इच्छा थी कि एक बार उसे आँख भरकर देख लूँ।
फिर एक दिन वे सपने आने बंद हो गए।
शायद इसलिए कि
मन ने समझ लिया था
कि घर ईंटों और छतों में नहीं बसता,
वह उन लोगों और यादों में बसता है
जिनके साथ हम जीवन जीते हैं।
आज एक नया आँगन है,
नई स्मृतियों का आनंदवन है l
और अब जान पाया हूँ कि
लौट आने के लिए केवल एक पता नहीं,
घर का होना ज़रूरी है।

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