साक्षात्कार : “जिसे उस्ताद ने अपना पूरा ‘तबला’ दे दिया” – स्वरांगी साने
तबले में अपनी मधुरता के लिए पूरब घराना जाना जाता है, उस मधुर घराने के मीठे उस्ताद थे उस्ताद जहाँगीर खाँ साहब जो अपने एक शिष्य से इतना प्यार करते थे कि उसे अपना बेटा ही मानने लगे थे, इतना कि एक बार अपने परिवारजनों से रूठकर बोरिया-बिस्तर उठाकर उस शिष्य रूपी बेटे के घर आ गए थे। सगा बेटा मनाने आया, पर वे नहीं गए, तब इस मानस बेटे ने ही किसी तरह समझाया और दो दिन बाद वे अपने घर लौटे थे। अपनी उम्र के 107 सालों तक जब तक उस्ताद साहब ज़िंदा थे मानस पुत्र उनकी सेवा करता रहा…इंदौर के पलासिया स्थित डॉक्टर शेख हातिम अस्पताल में उस्ताद साहब का इंतकाल हुआ था।
मानस पुत्र तबलाचार्य पं. दिनकर मुजुमदार, साठ साल की उम्र तक उन्होंने साइकिल चलाई और 90 साल की उम्र तक सबको सिखाया, खुले दिल से सिखाया, खूब सिखाया, जैसे उस्तादजी ने उन्हें सिखाया, वैसे ही उन्होंने बिना एक पैसा लिए सबको तबला सिखाया और घर पर पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों को गणित-विज्ञान की तालीम भी निःशुल्क दी। उस्ताद जी की यादों को टटोटले हुए वे बताते हैं डॉक्टर शेख हातिम के बड़े भाई के यहाँ उस्तादजी का आना-जाना था, उनकी लकड़ी की टाल थी और वहाँ मैं भी उस्तादजी के साथ जाता रहा था इसलिए उस्तादजी जब बीमार पड़े तो छोटे भाई के अस्पताल में उनका इलाज चला और वहीं उन्होंने आखिरी साँस भी ली। बनारस के पास के छोटे से गाँव से उम्र के चालीसवें साल में उस्ताद जहाँगीर साहब का इंदौर आना हुआ था। तब होलकर स्टेट (राजघराने) में लगभग महीने भर होलिका उत्सव हुआ करता था और हर दिन सांगितिक आयोजन होते थे। उसी दौरान किसी की संगत करने उस्तादजी आए थे और होलकर महाराज को उनका तबला इतना पंसद आया कि उन्होंने उस्तादजी से अपनी स्टेट में रहने का आग्रह कर लिया। फिर वे इंदौर के ही हो गए, उन्हें उस ज़माने में 30 रुपए महीने की पेंशन मिलती थी। होलकर स्टेट की गायिका से ही उन्होंने निकाह किया। समय के साथ उस्तादजी का बेटा भी तबला बजाने लगा। उस बेटे को उर्दू सिखाने किसी तवायफ़ का लड़का आता था जिसने कह दिया कि तबला तो कोठे पर बजता है, यह सुनना था कि बेटे ने तबला बजाना बंद कर दिया। उस्तादजी इस बात से नाराज़ होकर बोल पड़े थे- क्या तुम्हें मेरा तबला कोठे पर बजने वाला लगता है?
पं. दिनकर मुजुमदार कहते हैं उस्तादजी का नाराज़ होना स्वाभाविक भी था। उस्तादजी का तबला चार घराने का संपन्न वादन है, जिसमें दिल्ली,लखनऊ की गतें हैं, फ़रुखाबाद के कायदे-रेले हैं। पूरब घराने में फ़रुखाबाद, बनारस, लखनऊ और दिल्ली का उसमें मिश्रण है, मतलब दिल्ली के पूर्व के जितने भी घराने हैं, वे पूरब घराने कहलाते हैं। उस्तादजी के पहले गुरू पटना के पास आजीमाबाद के मुबारक अली थे, उनके निधन के बाद लखनऊ घराने के उस्ताद आबिद हुसैन खाँ साहब से शिक्षा ली। उसके बाद फ़रुखाबाद के छन्नु खाँ साहब से सीखा और फिर दिल्ली घराने के फिरोज़ खाँ साहब से शिक्षा ली। वे दिनकरजी बारे में कहते थे मैंने पत्थर में दूब उगाई है क्योंकि दिनकर साहब का संगीत से वैसा कोई संबंध नहीं था, वे मध्यमवर्गीय मराठी ब्राह्मण परिवार से आते हैं, जहाँ खेती-किसानी और पढ़ने-लिखने का माहौल था। उस्तादजी अपने गाँव में कुश्ती खेला करते थे, शिष्य कैसे पीछे रहते…उनके इस ख़ासमख़ास शिष्य ने भी अपने गाँव में जमकर खेती-किसानी की, दूध दुहा, आदमकद मथनी से दही मथा, कुएँ से पानी भरा…मेहनत मशक्कत से कभी जी नहीं चुराया।
ऐसा युवा जब शिष्य बना तो उस्ताद को इतना प्यारा हो गया कि उस्ताद ने उसे अपना बेटा ही मान लिया, इतना नेह लग गया कि उस्ताद रोज़ स्वयं चलकर शिष्य के घर आकर सिखाने लगे। जब उन्होंने अपने इस शिष्य को सिखाना शुरू किया तब शिष्य की उम्र थी लगभग 24 साल। गणित के इस छात्र का रूख तबले की ओर हुआ और फिर जितनी अच्छी पहचान गणित के शिक्षक के रूप में बनी उससे भी कहीं अधिक बड़ी पहचान तबले के पंडित के रूप में हो गई। पं. मुजुमदार खुद तबले की ओर मुड़े या तबले ने खुद इस हुनरमंद को अपने करीब कर लिया, कहना मुश्किल है। वैसे तो मध्यप्रदेश के छोटे से गाँव टिमरनी, जिला हरदा से मुजुमदारों का यह लड़का इंदौर में अपने फूफाजी नागेश रामचंद्र कलमकर के यहाँ पढ़ाई करने आया था। फूफाजी ने उस्ताद जहाँगीर खाँ साहब से मिलवा दिया। उस्तादजी के नागेशजी बड़े प्रिय थे और उस लिहाज़ से पं. मुजुमदार भी उस्तादजी के प्रिय बन गए। जो पहला कायदा सीखा वह था- ‘धागेतिट धागेतिट धागेतिरकिट तूना कत्ता’। पं. मुजुमदार पुरानी यादों में खोते हुए कहते हैं- मैं सरकारी स्कूल में शिक्षक था, इतनी आमदनी नहीं थी कि उस्तादजी को कुछ दे सकूँ और उस्तादजी ने भी कभी पैसे नहीं माँगे। मैं उनकी सेवा न कर सका।
पं. मुजुमदार के मन का यह संकोच उनकी सहधर्मिणी मालिनी ने शायद पहचान लिया था इसलिए जब तक वे जीवित रहीं उन्होंने घर आने वाले हर मेहमान का इतना स्वागत किया कि उनके घर से जाने वाला पूरी तरह अघाकर लौटा। पं. मुजुमदार अपनी सहधर्मिणी को याद करते हुए कहते हैं उस्तादजी को हमारे यहाँ का बना अचार इतना पसंद था कि वे अपने घर भी ले जाते थे। उनका भोजन कई बार हमारे घर होता था, उन्हें पापड़ भी बहुत अच्छे लगते थे। पत्नी ने सबकी पूरे मन से आवभगत की। हरसिद्धि का वह छोटा-सा घर था लेकिन दिल बहुत बड़ा था। उनकी बड़ी बेटी स्मिता (अब वाजपेयी) बताती हैं कि उस घर में इतने बड़े बड़े कलाकार आकर गए कि आज सोचती हूँ तो खुद ही हैरत में पड़ जाती हूँ। उस मोहल्ले ने भी हमें बहुत स्नेह दिया, किसी को हमारे यहाँ संगीत की रात-दिन होती चर्चाओं या आवाज़ों से दिक्कत नहीं हुई। हमारे बाबा मोहल्ले के सार्वजनिक नलके से पानी भर कर लाते थे, उनके साथ हम दो बहनें भी पानी भरा करतीं, घर के कामों में माँ की मदद करतीं, इतने मेहमान…नाते-रिश्तेदार, लगातार आना-जाना लेकिन सुबह के दो-तीन घंटे और शाम के दो-तीन घंटे रियाज़ से कोताही नहीं होती, मैं सितार लेकर बैठती, छोटी बहन संगीता तबला।
संगीता (अब अग्निहोत्री) कहती हैं कि हर दुपहरी ठीक बाबा याद दिलाते चार बज गए। हम समझ जाते चार बजे रियाज़ का समय हो गया। बाबा तबला सिखाते समय दुरुस्त करते चलते कि ऐसा नहीं ऐसा बजाओ। भारत में तब तबला वादिकाएँ नगण्य थीं, लोग मेरी बहुत प्रशंसा करते लेकिन गुरू के रूप में बाबा (पिता) को संतुष्टि नहीं होती थीं। कई कार्यक्रमों में भी बाबा पहली पंक्ति में बैठे होते और मैं बजा रही होती तो मेरा सारा ध्यान बाबा की ओर रहता, उनके चेहरे पर असंतोष दिखता और मैं मन मसोस कर रह जाती। लेकिन बाद में कई बार बाबा की आँखों से खुशी के आँसुओं को भी झरते देखा, तब उन्होंने यह भी कहा कि तुम्हें देखकर उस्तादजी की याद आ गई। संगीता कहती हैं शायद बाबा ने हमेशा तारीफ़ इसलिए भी नहीं की क्योंकि दुनिया तारीफ़ कर रही थी और ज़मीन से जोड़े रहने के लिए गुरू के रूप में उन्हें थोड़ा कठोर होना पड़ा होगा, लेकिन पिता के रूप में उन्होंने लाड़ भी उतने ही किए। शाम को कहते घूमकर आओ, गन्ने का रस पीना चाहो तो ये लो पैसे लेकर जाओ। लोगों ने कहा मैं उनकी बेटी होने से उन्होंने मुझे ज़्यादा सिखाया लेकिन ऐसा नहीं है, बाबा ने हर किसी को खुले मन से सिखाया, सबको अपने बच्चों जैसा प्यार दिया। बाबा को लगता था कि घर जाते-जाते वे चीज़े भूल जाएँगे इसलिए शिष्यों का भोजन भी हमारे घर पर होता रहा, बाबा ने भी शिष्यों से कभी पैसे नहीं लिए।
बाबा का कहना है ‘बाँटते रहो’, यह बाँटने का हुनर उन्हें अपने उस्ताद से मिला होगा। बड़ी बेटी बताती हैं- एक बार उस्तादजी से कोई तबला माँगने आ गया, उस्ताद जी ने सिंगल जोड़ी तबला उसे दे दिया। बाबा हतप्रभ रह गए, उस्तादजी को शायद यह भाव दिख गया, उन्होंने बड़े प्यार से कहा- ‘मैंने तो उसे केवल तबला दिया है, तुम्हें तो पूरा ‘तबला’ दे दिया है’। इस ‘पूरे तबले’ में इतनी चीज़ें हैं कि उस विरासत को सँभालने का जतन करती संगीता कहती हैं केवल तीन ताल (त्रिताल) में ही इतना मैटर है कि पूरी ज़िंदगी लग जाए तब भी पूरा नहीं बजा पाऊँगी। उस्तादजी भी कहते थे कि तीन ताल आधार है, सब कुछ गतें-टुकड़े तीन ताल से निकले हैं। तीन ताल में साधारण चक्करदार परन है- ‘तकिटतकिट धिन घिडनग’, वही रूपक ताल में फ़रमाइशी बनकर आ जाती है। तीन ताल दिल के नज़दीक है, जैसे धड़कन नज़दीक है। बाबा ने उस्तादजी से जो सीखा उसे कलमबद्ध किया और उनके हस्तलिखित मेरे पास आज भी हैं, बाबा बताते हैं कि उस्तादजी को लिखना नहीं आता था, बमुश्किल बहुत धीरे-धीरे केवल अपना नाम लिख पाते थे लेकिन उनकी स्मरण शक्ति बहुत ज़बरदस्त थी और यही स्मरण शक्ति बाबा के पास भी है। मैंने भी बचपन से सुना तो वह अवचेतन मन में संग्रहीत होता रहा। जहाँगीर खाँ साहब खुद हमारे घर आते थे, सिखाते थे और माहौल बना रहता था। पूरब के तबले की विशेषता बाबा ने सबको बताई कि बाएँ पर घिस्सा नहीं मारना, एक बार हाथ रख दिया तो कलाई के दबाव को कम-ज़्यादा कर ही बजाना यह दिमाग में पैठ गया। डग्गे का ‘दाबगास’ (आवाज़ का घुमाव, कहाँ दबाना, कहाँ छोड़ना जैसे ‘घेघेनग’ में उतार चढ़ाव कैसे होगा) यह आजकल देखने में नही आता। डग्गे के बोलों में उस्तादजी को महारथ हासिल थी। ढग्गे का काम जो बता पाए वही असली तबलावादक हो सकता है, ऐसे ढग्गे को संभालकर तबले के पास ले जाकर बैठाने वालों में हैं संगीता अग्निहोत्री, पं. दिनकर मुजुमदार और उस्ताद जहाँगीर खाँ साहब।


