दिन विशेष कविता में डॉ. कनिका वर्मा की कविताएँ
डॉ. कनिका वर्मा कनाडा से हैं। शिक्षण और अनुसंधान में उनका 14 वर्ष से अधिक का अनुभव है। वे नियमित रूप से भाषा, कविता और रंगमंच पर कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं।
लेखकीय प्रेरणा उन्हें जीवन और मानवीय रिश्तों को देखने, समझने और जीवित रहने की लालसा से आती है। – स्वरांगी साने
1. काँच की पत्तियाँ
कैनेडा की सर्दियों में
कितनी बार ऐसा नज़ारा देखने को मिलता है
जैसे पेड़ों पर काँच की पत्तियाँ लगी हों
दूर से देखने पर वो कितनी मज़बूत और दृढ़ लगती हैं
पर छूते ही गिरकर चकनाचूर हो जाती हैं
मैं जब गिरकर बिखरती हूँ
तुम हर मुझे हर बार समेट लेते हो
इन पत्तियों को समेटने वाला कोई नहीं
शायद इसीलिए कुदरत सर्दियाँ आने से पहले ही
इन पेड़ों से पत्तियाँ छीन लेती है
2. वक़्त का भ्रम
जब हम किसी को अपना वक़्त देते हैं
तो उसकी क़ीमत घंटों, महीनों या डॉलरों
में नहीं नापी जा सकती
वक़्त सिर्फ़ एक प्रवाह है क्षणों का
पर सच तो ये है
कि ना हम किसी को वक़्त दे सकते हैं
और ना कोई हमें वक़्त दे सकता है
हम सिर्फ़ वक़्त साथ बिता सकते हैं
दो लोग अपनी मर्ज़ी से
वक़्त के वो क्षण साथ बिताते हैं।
या कह लो कि साथ बहते हैं
वक़्त की नदी में
फिर उन्हें उसी वक़्त की नदी में
दूसरों का हाथ थामे उन्हें भी खींचना होता है
ताकि सब धीरे-धीरे बहते रहें
क्योंकि पहुँचना तो कहीं है नहीं
सिर्फ़ बहते रहना है
किसी के साथ या अकेले, बहते तो रहना है
फ़िर क्यों हम किसी एक के साथ के लिए तड़पते हैं?
क्या उसके साथ बहना ज़्यादा सुखद होता है या ज़्यादा सहज?
या बहना भी थम सा जाता है?
या हमारे अतिरिक्त हमें कोई और भ्रम में नहीं डाल सकता?

