दिन विशेष लघुकथा में बलराम अग्रवाल की लघुकथाएँ
१. “एक असन्तुष्ट से बातचीत”
जैसे ही कार उसके नजदीक से गुजरती, भौंकते हुए वह आदतन-सा उसके साथ दौड़ पड़ता।
आखिरकार, एक दिन मैंने कार साइड में रोकी और दरवाजा खोलकर नीचे उतर आया। पूछा, “जाते-आते क्यों भौंकते हो हर बार?”
“तुम पर नहीं, कार पर भौंकता हूँ।” वह बोला।
“क्यों?”
“हम पूँजीवाद के खिलाफ हैं।”
“लेकिन, मैं तो ड्राइवर हूँ, सर्वहारा श्रेणी का आदमी!”
“होगे; कार पूँजी का प्रतीक है और इसमें बैठे आदमी को सर्वहारा नहीं माना जा सकता!”
“अभी कुछ दिन पहले तुम एक बाइक-सवार पर भी भौंकते नजर आए थे?”
“हमारी नजर में स्कूटी-बाइक भी पूँजी ही हैं!”
“उससे पहले एक साइकिल वाले को भी खूब दौड़ाया था तुमने!”
“मुझ जैसे ग्रासरूट लेवल के शख्स को जो चीजें मुहैया नहीं हैं, वे सब पूँजी की श्रेणी में आती हैं!”
“बकवास मत करो। एक दिन, जब मैं पैदल यहाँ से गुजर रहा था, तुम एकाएक मुझ पर ही झपट पड़े थे, याद है?”
“खूब याद है!”
“उसके बारे में क्या सफाई है?”
“देख रहे हो कि जब से पैदा हुआ हूँ, नंगा घूम रहा हूँ! लिबास वालों पर हमला मेरा मौलिक अधिकार बनता है कि नहीं?”
२. “वन्दे मातरम्”
दोनों युवा थे। दोनों भारतीय। दोनों विदेश यात्रा पर, हवाई जहाज में सवार।
“एक्सक्यूज मी, यू. एस.?” एक ने दूसरे से पूछा।
“यस; और आप?”
“मैं भी!”
“यू. एस. में कहाँ?”
“कैलिफोर्निया! आप?”
“मैं भी!”
“कैलिफोर्निया में कहाँ?”
“सेन फ्रान्सिस्को ! आप?”
“लॉस एंजिल्स!”
उनमें से एक ने देखा कि दूसरा कपड़े की एक छोटी-सी पोटली को अपनी गोद में सहेजकर रखे हुए है।
“इस थैली को ऊपर लगेज के साथ रख दीजिए, अन-ईजी लग रहा होगा!”
“नहीं, इसे मैं लगेज के साथ नहीं रख सकता!”
“क्यों?”
“इसमें मेरे देश की पूजनीय माटी है!” पहले ने कहा; फिर दूसरे से पूछा, “आप भी लाये होंगे?”
“मैं!” उसका सवाल सुनकर दूसरा मुस्कुराया। फिर पहले को लाजवाब करता-सा बोला, “पूरा का पूरा यह शरीर ही देश की मिट्टी से बना है दोस्त, एक और मिट्टी को अलग से ले जाने की क्या जरूरत है!”
उसके कथन पर पहला भी मुस्कुरा दिया। हाथ के इशारे से अपने शरीर और गोद में सहेज रखी पोटली की ओर इशारा करता हुआ बोला, “इस माटी के माथे को हर सुबह इस माटी पर टिकाऊँगा तो देश के प्रति जिम्मेदारी का अहसास बना रहेगा, बस इसीलिए!”
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