दिन विशेष कविता : “पुण्य-पश्चाताप” – ऋतिका ‘ऋतु’
ऋतिका ‘ऋतु’ नाम से जानी जाती नोएडा की ऋतिका यादव का पहला काव्य संग्रह वर्ष 2021 में आया था।

अंग में, प्रत्यंग में उठतीं पुकारें,‘तन सहेजो’!
प्राण पकड़े पैर अपने ही फफककर रो दिए तो
मृत्यु के पश्चात उसके हित न शव को अग्नि भी दी,
यत्न से जगती रही जिसके लिए पलकें उनींदी
है परम सुख एक दृग को, दूसरे को और दु:सह।
संशयों को पाटता संदेहप्रद विश्वास जैसे
सौ प्रमाणों में छिपा एकल विरोधाभास जैसे
वह निरर्थकता कि जिसकी हैं कई अनिवार्यताएँ।
फाँकती अवहेलना जिस पथ चलीं गौरवगथाएँ
भृकुटियों की संधि पर अंकित चरण की छाप सा वह।
इन फलों के गर्भ में विषकीट निश्चय ही पलेगा,
कर्म-कानन का कटा-‘काटा गया’ तरु भी फलेगा।
वीथि जो लाई यहाँ वापस वहाँ जाने न देगी।
बौखलाएगी क्षुधा, फल चेतना खाने न देगी।
दीर्घजीवी है क्षयी भी। हाँ मरेगा, किंतु रह-रह।
पुण्य पश्चाताप सा वह!
