दिन विशेष कथेतर : हरिप्रकाश राठी के उपन्यास ‘रमंते तत्र देवता’ की डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय द्वारा समीक्षा

डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय ने कथाकार हरिप्रकाश राठी के उपन्यास ‘रमंते तत्र देवता’ की समीक्षा करते हुए इसमें उस दिलचस्प कथानक की मूलभावना को सतह पर लाने की चेष्टा की है, जिसे हृदयंगम करते हुए यह अनुभव होता है कि जैसे उपन्यासकार ने अपने जीए हुए संसार को बिंबित किया हो। कथानक का आरंभ एक व्यक्ति की बाल्यावस्था, उसकी युवावस्था तथा उसकी मूलभूत अन्य प्रवृत्तियों, जिनमें स्त्री-आकर्षण से उद्भूत उसकी काम-भावना मुखर होती है, को उजागर किया है। उपन्यास का दार्शनिक स्वरूप भी महत्त्वपूर्ण है जहाँ जीवन की नश्वरता, क्षणभंगुर सांसारिकता, इहलौकिक एवं पारलौकिक जीवन से संबंधित चिंतन को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। समीक्षा को पढ़ने के पश्चात् इस उपन्यास में पाठकीय दिलचस्पी बेतहाशा बढ़ती है। अवश्य पढ़ें और हमारे वैश्विक हिंदी परिवार की ऐसी प्रस्तुतियों को सराहें! : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र, संपादक

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  • डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय
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प्रेम, मृत्यु और नियति के चिरन्तन प्रश्नों से जूझता : रमंते तत्र देवता (पुस्तक समीक्षा)

      ‘रमंते तत्र देवता’ कथाकार हरिप्रकाश राठी का पहला उपन्यास है जिसकी कथा-संरचना में भारतीय समाज, उसकी संस्कृति, उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, उसकी नियति तथा कर्मफल से जुड़ी मान्यताएँ और मानवीय संवेदनाओं के विविध रूप एक साथ गूँथे हुए दिखाई देते हैं। अर्थ यह कि इस उपन्यास की कथा-संरचना का आयाम एक कोणीय नहीं है बल्कि बहुआयामी और विविधरंगीय है। यहाँ व्यक्ति है, व्यक्ति का बचपन और उसका कौतूहल है, किशोर जीवन एवं मन की अल्हड़ता है; यहाँ समाज है, समाज के विभिन्न पक्ष और सोच-विचार है; यहाँ अनेक स्थानों का वर्णन और चित्रण है – अपनी सारी-की-सारी विविधताओं और खूबियों के साथ; यहाँ दर्शन है, नियति की आँख-मिचौली है; यहाँ रंग बदलती, विविध रूपों में मूर्त होती संवेदनाओं के विविध रूप हैं। यह उपन्यास यह भी प्रमाणित करता है कि साहित्य किसी भी विधा का हो वह मनुष्य-जीवन की आकांक्षाओं, जटिलताओं, संघर्षों और कुछ-कुछ नियति के खेल की अभिव्यक्ति होता है।
कथा-नायक अश्विन कुमार उपन्यास के केंद्र में हैं
। यह उपन्यास अड़सठ वर्ष का जीवन जी चुके अश्विन कुमार के जीवन-यात्रा की कथा है, उनके संघर्ष की गाथा है, उनके मानसिक उद्वेलन की गाथा है; एक ऐसे जीवन-यात्रा की कथा है जिसमें कथा-नायक किशोरावस्था से ही ‘स्त्री-सुख’ और ‘प्रेम की खोज’ करता है लेकिन अंत में वह एक ऐसे मुकाम पर पहुँचता है, जहाँ वह एक ऐसी अंतहीन त्रासदी के धरातल पर अपने को खड़ा पाता है, जिसका संबंध भारतीय दर्शन के नियतिवाद, भाग्यवाद और कर्म-सिद्धांत से जुड़ जाता है।
उपन्यास के अंतर्गत कथाकार हरिप्रकाश राठी जी ने अतीत-भ्रमण की बात की है, उन्हीं के शब्द को उधार लेकर कह सकता हूँ कि ‘रमंते तत्र देवता’ एक तरह से ‘अतीत-भ्रमण’ की कथा है; लेकिन इस अतीत-भ्रमण के भी अनेकानेक आयाम हैं, इसमें हमें न मालूम कितने मोड़ दिखाई देते हैं जिनसे हम रूबरू होते हैं, सुख-दुःख के न मालूम कितने क्षणों-पलों से हम गुजरते हैं, संघर्ष के न मालूम कितने रूपों से हमारा साक्षात्कार होता है, द्वंद्व की न मालूम कितनी स्थितियाँ हमारे आँखों के सामने अचानक ही खड़ी हो जाती हैं
। राठी जी इन शब्दों के साथ हमें अतीत-भ्रमण पर ले जाते हैं, “पलंग पर लेटे-लेटे अड़सठ पार अश्विन कुमार भी आज उस किशोर वय में पहुँच गए हैं जब वे मात्र पंद्रह वर्ष के थे।” (‘ रमंते तत्र देवता’: हरिप्रकाश राठी, पृष्ठ–19 )
यहाँ एक प्रश्न उठाया गया है, जिस प्रश्न पर चर्चा करने के लिए कथा-नायक को माध्यम बनाया गया है
। प्रश्न नया नहीं है, वह तो शाश्वत और जीवनयापन के बीच जन्म लेने वाला सहज प्रश्न है। प्रश्न है, “क्या मनुष्य का वर्तमान जीवन केवल और केवल उसके अतीत और पूर्वजन्म के कर्मों की देन है?” और इसके विविध पक्षों पर कार्य-कारण की पूरी शृंखला के साथ विचार करने के लिए कथाकार ने तीन महत्त्वपूर्ण पक्षों को सामने रखा है। ये तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष इस रूप में सामने आते हैं। ----

पहला –- कथा-नायक की चेतना में स्त्री-सुख का कौतुक और उसकी लालसा ।
दूसरा –- प्रेम की प्राप्ति, स्त्री-सुख की प्राप्ति, लेकिन उस प्राप्ति का अल्पायु होना या
यह भी कह सकते हैं कि असमय ही दुर्घटनाओं का शिकार हो जाना ।
तीसरा – जीवन में आने वाली त्रासदियों के कारणों की खोज में आत्मान्वेषण करना,
दार्शनिक परिणति तक पहुँचना और पुनर्जन्म के, कर्मफल के सिद्धांतों एवं
मान्यताओं की स्वीकृति।
पहले में फ्रायड का मनोविज्ञान, उसका कामशास्त्र विषयक चिंतन और सिद्धांत क्रियाशील दिखाई देता है। दूसरे में कथा-नायक उदात्त नहीं है क्योंकि वह स्त्री को अपने सुख और जीवन की पूर्णता के साधन के रूप में देखता है; प्रेम-भाव से ज्यादा काम-भावना से देखता है और यह भी कि उसकी खोज नितांत आत्मकेंद्रित है। तीसरा पक्ष इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कथा-नायक यहाँ एक तरह से बदले रूप में आता है, द्वन्द्व के बीच गुजरता दिखाई देता है, दार्शनिक भावों से जुड़ता सामने आता है। उपन्यास के दार्शनिक पक्ष पर मतभेद हो सकता है, होना भी चाहिए लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि जीवन के अंतिम पक्ष में कथा-नायक अपने जीवन की त्रासदियों का कारण पूर्वजन्म के फल के रूप में देखता-सा महसूस करता है।
निस्संदेह भारतीय दर्शन एवं चिंतन-परम्परा में पूर्वजन्म, प्रारब्ध, नियति, भाग्य, कर्मफल आदि की अवधारणा गहरी रही है लेकिन कथा-नायक का प्राप्त निष्कर्ष उसे व्यक्तिगत रूप से सांत्वना दे सकते हैं लेकिन इसे तार्किक दृष्टि पर चलते हुए स्वीकार नहीं किया जा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि उपन्यास नियतिवाद का समर्थन करता है। उपन्यास और कथा-नायक दोनों इस विचार को पुष्ट करते दिखाई देते हैं कि अतीत में नारी की पूजा नहीं की गई, उसे उचित सम्मान नहीं दिया गया, उसकी निरंतर उपेक्षा की गई इसीलिए इस जीवन में, वर्तमान में स्त्री-सुख से बार-बार वंचित होना पड़ा। और यहीं पर कथा-नायक अपने इस विचार को भी पुष्ट करने का प्रयास करता है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा नारियों का उचित सम्मान किया जाना चाहिए| इस प्रकार यह उपन्यास एक संदेश देता भी दिखाई देता है।
‘रमंते तत्र देवता’ गहरी संवेदना का भी उपन्यास है। यह केवल कथा-नायक की त्रासदी से ही हमें नहीं जोड़ता है बल्कि यह कुछ चिरंतन प्रश्नों से भी हमारा साक्षात्कार करवाता है। और यह प्रश्न चिरंतन प्रश्न है, शाश्वत प्रश्न है जोकि जीवन, प्रेम, मृत्यु, नियति आदि से जुड़ा हुआ है। हम यह भी कह सकते हैं कि भारतीय जनमानस में जो नियतिवाद की, कर्मफल की, पुनर्जन्म की अवधारणा रची-बसी हुई है, उसी का एक सशक्त दस्तावेज है–यह उपन्यास।
उपन्यास छह दशक पीछे की स्मृति से शुरू होता है और यहाँ ‘भवितव्यता’ पर विशेष दृष्टि रखी गई है। या यह भी कह सकते हैं कि उसे ही सबका कारक मान लिया गया है। “भवितव्यता के मंसूबे हमारे इरादों से सर्वथा भिन्न होते हैं” जैसे कथनों के माध्यम से इस }विचार को बल भी दिया गया है। लेकिन इसका एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि भवितव्यता पर दृष्टि रखने के बावजूद उपन्यास अंध-विश्वासों और जीवन की गति में बाधा पहुँचाने वाली जड़ परम्पराओं पर गहरा प्रहार करता है–विशेष कर विधवा स्त्रियों की दशा-दिशा और उनसे जुड़ी रूढ़िवादी मान्यताओं एवं सोच पर। ऐसे स्थलों पर हम उसके प्रगतिशील सोच को स्थापित होते देखते हैं। और इस अर्थ में उपन्यास सार्थक सोच को जन्म देता है; समयानुकूल बदलावों की जरूरत को रेखांकित करता है तथा जड़ता के समक्ष खड़े होकर हस्तक्षेप करता दिखाई देता है।
उपन्यास का आयाम बड़ा है तभी तो यह जीवन एवं समाज के विविध पक्षों और कोणों को अपने में समेट कर चलता है और दर्शन, धर्म, युद्ध, कर्मफल, अतीत, वर्तमान से जुड़े न मालूम कितने विषयों पर चिंतन और संवाद करता है। दर्शन का जीवन में क्या महत्त्व है? धर्म क्यों जन्मा और उसकी क्या जरूरत है? धर्म के वास्तविक अर्थ को न जानने के कारण क्या अनर्थ होते हैं? युद्ध की क्या कोई सार्थकता है? क्या वह सिर्फ विनाश का ही कारण नहीं बनता है? जैसे अनेकानेक सवाल हैं जिनसे यह उपन्यास मुठभेड़ करता है। धर्म की व्याख्या करते समय यह कार्य-कारण की समूची शृंखला को सामने रख कर चलता है। कथाकार ने लिखा है कि – “अधिकांश मनुष्य जिस धर्म में पैदा होते हैं बहुधा उस मत को लेकर मतान्ध हो जाते हैं। धर्मगुरु इस मतांधता की आग में घी डालते हैं। धर्म तो मनुष्य के सुख-सुकून एवं अमन-चैन के लिए है। एक व्यवस्था है, प्रबंधन है जिसके ध्वज तले सभी सहकार एवं सहयोग के भाव से जी सकें।” (वही, पृष्ठ – 61-62)
कथा-नायक अश्विन और उसके मित्र विनय की बातों के बीच में ऋषि उतंक और कृष्ण के संवाद को लाकर उसके बहाने युद्ध की चर्चा और उसके परिणामों की चर्चा भी उपन्यास में बखूबी की गई है। उपन्यासकार ने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि वास्तविक अर्थों में– “संसार का इतिहास युद्धोन्मादी नहीं, संसार के शांतिदूत लिखते हैँ।” और यह भी कि “युद्ध किसी समस्या का हल नहीं।” यूँ भी हमारी धरती वसुधैव कुटुंबकम् की भावना लेकर चलती रही है। यह विराट भहाव हमारा सिद्धांत ही नहीं, मूलमंत्र है।” (वही, पृष्ठ – 120-123)
दो और पक्ष हैं जिनका जिक्र जरूरी है। एक तो वह पक्ष जहाँ वे मारवाड़ियों के व्यावसायिक कौशल की चर्चा करते हैं और दूसरा वह चित्रण जहाँ वे स्थान विशेष की विशेषताओं का जीवंत चित्र खींचते हैं। उपन्यास के माध्यम से राठी जी ने मारवाड़ियों की व्यावसायिक कुशलता के अनेक पक्षों को उद्घाटित किया है और माना है कि–“धरती पर जहाँ-जहाँ सूरज का प्रकाश पड़ता है, तुम्हें मारवाड़ी मिल जाएँगे। उनकी व्यावसायिक प्रतिभा ही नहीं जीवट भी अदम्य है। वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी व्यावसायिक समीकरण साध लेते हैं। उनके अंतर में छुपा अर्जन एवं विसर्जन का विराट भाव उन्हें जनप्रिय भी बनाता है।” (वही, पृष्ठ – 81)
मारवाड़ियों के साथ-ही-साथ राठी जी मारवाड़ के वैभवशाली इतिहास और उसकी परम्पराओं का भी जीवंत चित्र खींचते हैं–विशेषकर जोधपुर की, और उसी के साथ उदयपुर की भी यात्रा बखूबी करवाते हैं। राठी जी के इस चित्रण से गुजरते हुए जिन्होंने इन दोनों स्थलों को भौतिक रूप से नहीं देखा है वे भी उससे सहज ही जुड़ जाते हैं। वे इस यात्रा के बहाने इन स्थलों के इतिहास और उसके गौरव को, उसकी भौगोलिक संरचना को, उसकी स्थापत्य-कला को उसके दर्शनीय स्थलों की महत्ता को भी रेखांकित करते हैं।
इन सारे-के-सारे चित्रणों के बीच किशोर मन-मस्तिष्क के प्रश्नों की उपस्थिति ही यहाँ विशेष रूप से दिखाई देती है और इन प्रश्नों में प्रेम एवं काम से जुड़े प्रश्न बार-बार आते हैं। सच तो यह है कि कथा-नायक इन्हीं प्रश्नों से जूझता दिखाई देता है–जीवन के हर एक पक्ष में। इस जूझने की यात्रा में वह अनेक बार अपने दोस्त का भी सहारा लेता है। इस जूझने की प्रक्रिया में वह, या कहें कथाकार इस निष्कर्ष पर भी पहुँचता है कि–“यह दुनिया भी कितनी विचित्र है? जो है उससे ऊब जाती है और जो नहीं है उसकी ओर बेतहाशा लपकती है।… अप्राप्य की चाह प्राप्त होते ही व्यर्थ बन जाती है।” (वही, पृष्ठ – 38)
प्रेम की महत्ता, उसकी तासीर और उसकी ताकत का भान कथा-नायक को बखूबी है। वह जानता है कि यही वह रंग है जो जीवन को बहुरंगी बनाता है। वह कहता भी है कि – “इन सात रंगों (इंद्रधनुष के रंगों) के परे भी एक रंग है–प्रेम का रंग। यह रंग जब जीवन में घुलता है तो अन्य सभी रंग फीके पड़ जाते हैं।” (वही, पृष्ठ – 42) कथा-नायक प्रेम को सिर्फ बहुरंगी बनाने वाला ही नहीं मानता है बल्कि यह भी स्वीकार करता है कि वह अर्थात् प्रेम मनुष्य के भीतर के अनेकानेक गुणों को निखारने की भी शक्ति और दृष्टि देता है। राठी साहब ने अपने अनुभवों के निचोड़ के रूप में यह लिखा है कि–“प्रेम मनुष्य के भीतरी गुणों को निखारने का सबसे सुन्दर रसायन है।… प्रेम समूची कायनात को सुंदरतम बना देता है।” (वही, पृष्ठ – 92)
राठी जी यह भी मानते हैं कि प्रेमपथ पर पुरुषों की अपेक्षा नारी अधिक संजीदगी से यात्रा करती है; वह साहस के साथ अपना पैर आगे बढ़ाती है; वह सीमाओं की परवाह नहीं करती है; वह किसी भी प्रकार के बंधन को स्वीकार नहीं करती है। अपने अनुभव के आधार पर कथा-नायक का मित्र विनय इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहता है–“मुझे पहली बार लगा स्त्री पुरुष से अधिक साहसी होती है। वह मूलतः संकोची होती है पर प्रेम में हर सीमा लाँघ जाती है। उसका प्रेम किसी परिधि में नहीं बँधता।” (वही, पृष्ठ – 43)
यह सच है कि उपन्यास का ताना-बाना कथा-नायक की लालसा, उसकी अतृप्ति, उसके जीवन की शून्यता आदि को लेकर बुना गया है और अनेक वर्णनों के बीच वही बार-बार आता है लेकिन इसका आयाम यहीं तक सीमित नहीं है। जीवन के अनेकानेक और भी पक्ष हैं जो किसी-न-किसी रूप में यहाँ सामने आते हैं। ऐसे स्थलों पर कथाकार का चिंतक रूप; उसकी दार्शनिक दृष्टि; समय, समाज और व्यक्ति के जीवन के प्रति उसकी सोच स्पष्ट होती दिखाई देती है। कुछ कथन ऐसे हैं जो सहज ही हमारा ध्यान खींचते हैं और जिन पर सोचा-विचारा जाना चाहिए। कुछ अंश उद्धृत करना चाहूँगा —
“समयबद्धता पावन उपासना की तरह है। जो समय की कद्र नहीं करता, समय उसकी कद्र नहीं करता।” (वही, पृष्ठ – 24)
“दुनिया में ऐसी कौन-सी मंजिल है, ऐसा कौन-सा आसमान है जिसके लिए परिंदा प्राण-पण से उड़ान भरे और उसे वह न मिले।” (वही, पृष्ठ – 94)
“जीवन के सबसे बड़े पाठ पुस्तकें नहीं, कंधों पर आई जिम्मेदारियाँ सिखाती हैं।” (वही, पृष्ठ – 95)
“परदुःखकातर हृदय दूसरों की मनःस्थिति तुरंत भाँप लेते हैं। हृदय का हृदय से संबंध होता है| कुछ रिश्ते नियति की अबूझ डोरी से बँधे होते हैं…” (वही, पृष्ठ – 175)
“संसार में जितना वैचारिक वैविध्य है उससे कई गुना अधिक स्वभाव वैविध्य है। यह दुनिया जितनी बहुरंगी है उतनी ही नीरस भी है।” (वही, पृष्ठ – 197)
“स्वीकारोक्ति शांति का प्रथम सोपान है।” (वही, पृष्ठ – 43)
अंततः हम कह सकते हैं कि कथाकार हरिप्रकाश राठी जी का उपन्यास ‘रमंते तत्र देवता’ एक विचारोत्तेजक एवं गहन संवेदना का उपन्यास है जिसका आयाम बड़ा है; जिसमें ‘नियति की अबूझ डोरी’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। रिश्ते, घटनाएँ, मिलना-बिछुड़ना, सुख-दुःख, उल्लास-विषाद सब लगता है जैसे नियति की अबूझ डोरी से संचालित हैं। यह सही है कि उपन्यास एक बालक, एक युवक की सहज काम-भावना और उसके स्त्री-आकर्षण से शुरू होता है लेकिन धीरे-धीरे यह मनुष्य-जीवन की नश्वरता, सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता, पूर्वजन्म के कर्म-फल आदि के चिंतन से जुड़ जाता है और यह भी कि तब उपन्यास की कथा सिर्फ एक कथा-नायक के जीवन की त्रासदी की ही कथा नहीं रह जाती है बल्कि जीवन, मृत्यु और नियति के चिरंतन प्रश्नों पर विचार करने वाला, चिंतन करने वाला उपन्यास बन जाता है। मानवीय चेतना की अतृप्त कामनाओं, वियोगों के संत्रास तथा उसकी दार्शनिक छटपटाहट को चित्रित करने में कथाकार पूरी तरह सफल रहा है। और सबसे बड़ी बात यह कि यह उपन्यास भारतीय जन-मानस में रची-बसी नियति की अवधारणा और भारतीय दर्शन के कर्म-सिद्धांत पर विचार करने वाला एक सशक्त दस्तावेज बनकर भी सामने आता है।

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