दिन विशेष प्रवासी रचना : “अमेरिका के सरकारी स्कूल में पहला दिन” – विनीता तिवारी

प्रवासी लेखिका विनीता तिवारी का यह संस्मरण उनके अमरीकी प्रवास के दौरान जीवंत अनुभवों पर आधारित है। अमरीका में पहुँचने के बाद उन्होंने एक स्कूल की शिक्षिका के रूप में कार्य करना आरंभ किया। अमरीकी स्कूलों में उन्हें वहाँ की स्कूल-चर्या बहुत अज़ीब-सी लगी। वहाँ के शिक्षकों, छात्रों, उनके कार्यकलाप, स्कूल की अमरीकी परंपराएं आदि का वह विशद ब्योरा देती हैं। इसके अतिरिक्त, वह अमरीका और भारत के स्कूलों के संबंध में दिलचस्प तुलनात्मक विवरण भी देती हैं। इस बाबत, यह संस्मरण पाठकों की जिज्ञासा को शांत करेगी। अवश्य पढ़ें और संभव हो तो अपनी प्रतिक्रियाएं भी कमेन्ट बॉक्स में दें! –डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र, संपादक

Vinita tiwari

वर्ष 1997 में जब अमेरिका आई तो कुछ वर्ष घर की ज़िम्मेदारियों को सम्भालने और कुछ यहाँ के हिसाब से जीवन-शैली को व्यवस्थित करने में निकल गये। फिर बच्चों एवं परिवार को प्राथमिकता देते हुए बैंक में पार्ट टाइम काम करना शुरू किया। बैंक की नौकरी में वैसे तो सब बढ़िया था; लेकिन, छुट्टियों की भारी कमी लगती थी। इसलिए, जब बच्चों ने स्कूल जाना शुरू किया तो सोचा कि बैंक की नौकरी छोड़कर विद्यालय में ही नौकरी कर ली जाए ताकि बच्चों के साथ सर्दी-गर्मी की छुट्टियों का आनंद उठाया जा सके और उन्हें इधर-उधर डे-केयर में छोड़ने की तकलीफ़ भी न उठानी पड़े। बस, फिर क्या था? बात जब दिमाग़ में बैठ गई तो कुछ दिनों पश्चात् उसका क्रियान्वयन भी हो गया। चंद परीक्षाओं एवं साक्षात्कारों से सफलतापूर्वक गुरने के बाद एक सरकारी उच्च-माध्यमिक विद्यालय में पर्मानैंट सब्स्टिट्यूट टीचर की नौकरी सुनिश्चित हुई। सब्स्टिट्यूशन में आप मूलतः एक फ़िलर की तरह कार्य करते हैं। जिस भी कक्षा में मूल अध्यापक या अध्यापिका अनुपस्थित होती है उसी कक्षा में आपको पढ़ाना होता है। अमेरिका के हाई स्कूलों में सभी बच्चों एवं शिक्षकों को स्कूल की तरफ़ से क्रोमबुक या कहिए कि हल्के वजन का छोटा-सा लैपटॉप भी मिलता है जो किताब की तरह आसानी से बस्ते में रोज़ाना लाया और ले ज़ाया जा सकता है। किताबों से लेकर हर विषय के नोट्स, होमवर्क, क्लास-वर्क और यहाँ तक कि ग्रेड्स और आपकी प्रोग्रस रिपोर्ट तक सब कुछ ऑनलाइन। सब कुछ ऑनलाइन होने से सब्स्टिट्यूट टीचर का कार्य-भार काफ़ी हल्का हो जाता है।
ख़ैर, अमेरिका के जिस उच्च माध्यमिक विद्यालय में मेरी नौकरी पक्की हुई, उसका समय था सुबह 9:30 से शाम 4:20 बजे तक। मेरी दृष्टि से किसी भी विषय की पढ़ाई में तन्मयता से जुटे रहने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा लम्बा समय। मुझे याद है कि जब हम भारत में पढ़ा करते थे तो वहाँ के सरकारी विद्यालय सात से बारह या फिर साढ़े बारह से साढ़े पाँच बजे तक की दो पारियों में चला करते थे। मतलब, सिर्फ़ 5 घंटे प्रतिदिन का स्कूल और यहाँ तक़रीबन 7 घंटे का। एक फ़र्क़ यह भी है कि अमेरिका में सप्ताह महज़ पाँच ही दिनों का होता है। फिर भी, गुणा-बाक़ी करके देखने पर विद्यालय में व्यतीत हुए कुल घंटे यहाँ भारत से ज़्यादा ही पड़ते हैं। जो भी हो मुझे इस बात की थोड़ी ख़ुशी भी होती है कि मुझे अपने बचपन का बहुत ज़्यादा समय विद्यालयों में नहीं बिताना पड़ा। लेकिन दूसरी तरफ़, यह सोचकर दु:ख भी होता है कि कितने ही विषयों से मेरी जानकारी पूरी तरह अछूती रह गयी। विद्यालय में पहले दिन जब पहुँची तो मुख्य द्वार के सामने एक-सी दिखने वाली बसों की एक लम्बी क़तार दिखाई दी। अमेरिका के सरकारी विद्यालयों में बसों की सेवा विद्यार्थियों को निःशुल्क उपलब्ध होती है। हर गली-कूचे पर रुक-रुक कर ए. सी.-हीटर की सुविधा से लब्ध बसें विद्यार्थियों को लेकर आती हैं। लेकिन मज़े की बात यह है कि हाई स्कूल के ज़्यादातर विद्यार्थी ड्राइविंग लाइसेंस पाते ही अपनी ख़ुद की कार से आना पसंद करते हैं। इसलिए, स्कूल के परिसर में फैला बड़ा-सा पार्किंग लॉट और उसमें योजनाबद्ध तरीक़े से खड़ी छोटी-बड़ी गाड़ियों का अम्बार देखने लायक़ होता है। यहाँ यह बताना शायद ज़रूरी रहेगा कि अमेरिका में मोपेड, स्कूटर, या रिक्शे-ताँगे का रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कोई स्थान नहीं हैं। हाँ, कुछ पर्यटन स्थलों पर भारत में हाथी-ऊँट की सवारी की तरह यहाँ रिक्शा या बग्गी की सवारी आकर्षण का केंद्र हो सकती है। मगर रोज़मर्रा में ये व्हीकल्स न के बराबर देखने में आते हैं। विद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुँचकर जैसे ही उसे खोलने की कोशिश की तो मालूम हुआ कि सारी इमारत इलैक्ट्रोनिक ताले-कूँजी से बंद है। दाहिने हाथ की तरफ़ एक बटन दबाते ही अंदर से आवाज़ आई “हॉव कैन ऑय हेल्प यू? मेरे ज़वाब देने पर मुझे अपनी फ़ोटो आईडी भी दिखाने को कहा गया। सब जाँच-पड़ताल के पश्चात, दरवाज़ा अनलॉक हुआ तो मैं अंदर गयी। घुसते ही दूसरा लॉक्ड दरवाज़ा! मैं हैरान! समझ नहीं पा रही थी कि इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावज़ूद अमेरिका में स्कूल शूटिंग्स की वारदातें कैसे हो जाती हैं।
ख़ैर, अमेरिका में होने वाली शूटिंग्स और उसके कारणों पर मैं किसी दूसरे आलेख में चर्चा करूँगी। तो इन दो दरवाज़ों की सुरक्षा-व्यवस्था को पार कर जब मैं विद्यालय के अंदर गई तो ऑफिस वालों ने स्कूल के नक़्शे के साथ मुझे मेरी कक्षा तक पहुँचने के दिशा-निर्देश भी दे दिए। असल में स्कूल की इमारत इतनी फैली हुई थी कि इस नक़्शे का सहारा मुझे आने वाले कई सप्ताहों तक लेना पड़ा। कक्षा में पहुँचने पर पहली घंटी दिन के 9:28 बजे सुनाई दी। ये घंटी उन विद्यार्थियों के लिए एक चेतावनी थी जो अभी तक कक्षा में नहीं पहुँचे हैं, मगर स्कूल की बिल्डिंग में दोस्तों के साथ इधर-उधर घूम रहे हैं या कक्षा में पहुँचकर भी अपनी मेज़-कुर्सी से इतर इधर-उधर भटक रहे हैं। इस दो मिनट के समय में ज़्यादातर शिक्षक और विद्यार्थी अपनी-अपनी पोजिशन ले लेते हैं। 9:30 की घंटी के साथ स्कूल प्रिंसिपल की आवाज़ टेलीकॉम पर सुनाई पड़ती है सबको सुबह की नमस्कार और उस दिन होने वाली ख़ास-ख़ास गतिविधियों की सूचना देने के बाद उन्होंने स्कूल के समस्त सदस्यों से एक मिनट का मौन रखने की अपील की।
पता चला कि अमेरिका के सरकारी स्कूलों में दिन की शुरुआत किसी क्रिश्चियन भजन, गीत या प्रार्थना से नहीं होती बल्कि सिर्फ़ “मौन के कुछ क्षणों” या कहिए “पॉज़ फॉर दि मिनट ऑफ साइलेंस” से होती है। मौन के इन क्षणों में आप जिसका ध्यान, चिंतन-मनन करना चाहें, कर सकते हैं। विद्यालय के सभी कर्मचारी और विद्यार्थी इन क्षणों में शान्ति से बिना एक दूसरे पर ध्यान दिए अपने अपने इष्ट का सामूहिक रूप से ध्यान कर वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं। मौन के इन क्षणों में कोई भगवान को अपने ख़ूबसूरत जीवन के लिए धन्यवाद प्रेषित कर रहा होता है तो कोई अपने दिन की अच्छी शुरुआत के लिए प्रार्थना। सम्भव है कुछ अपनी परेशानियों के लिए ईश्वर से झगड़ भी रहे हों और कुछ का ध्यान सिर्फ़ दूसरों की गतिविधियों पर ही हो; लेकिन जो भी हो, अमेरिका के सरकारी स्कूलों का धर्म- निरपेक्ष और सभी धर्मों के प्रति समान आदर-भाव का यह तरीक़ा मुझे बेहद पसंद आया, जिसमें किसी भी एक धर्म, मज़हब या संप्रदाय को दूसरे धर्मों एवं सम्प्रदायों से न सिर्फ़ प्राथमिकता देने से बचा गया बल्कि सरकारी विद्यालयों को धार्मिक आधार देने से भी बहुत सम्भव बचा गया। “मौन के क्षण” जैसे ख़त्म हुए तो “pledge of allegiance” (निष्ठा की शपथ/प्रतिज्ञा) की शुरुआत हुई। स्वयं प्रधानाध्यापक द्वारा बाक़ायदा पूरा pledge of allegiance पढ़ा गया जो की सभी कक्षाओं में टेलीकॉम द्वारा सुनाई पड़ रहा था, लेकिन ग़ज़ब कि बहुत से बच्चे इस पूरी समयावधि में बाक़ायदा अपनी कुर्सी पकड़ कर बैठे रहे। इस राष्ट्र के प्रति आदर-सम्मान की क्रिया में उन्होंने भाग लेने की ज़रूरत ही नहीं समझी। अमेरिका में देश के सम्मान में खड़ा होना या नहीं होना आपकी अपनी इच्छा और श्रद्धा पर निर्भर है; यहाँ भी किसी पर किसी तरह की कोई ज़बरदस्ती या नियम क़ानून नहीं। स्वतंत्र देशों में स्वतंत्रता के पैमाने कितने वृहद् और कितने विस्तृत हो सकते हैं ये पहली बार जीवन में महसूस हुआ। pledge of allegiance के बाद सभी कक्षाओं में लगे big screen computers जिन्हें यहाँ promethium board भी कहते हैं पर मॉर्निंग अनाउंसमैंट सुनाया गया।तत्पश्चात् मेरी नज़र कक्षा में बैठे विद्यार्थियों पर गई सब बच्चे अलग-अलग तरह की पोशाक में बैठे हुए थे। यह बहुत ही अनोखी-सी बात है, जिसे शायद दुनिया में बहुत ही कम लोग जानते हैं कि यहाँ प्राइमरी से लेकर हाई स्कूल तक, विद्यार्थियों की कोई यूनिफ़ॉर्म राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नहीं की गई है। मतलब यह कि आपकी जो इच्छा हो, आप वह पहनकर स्कूल आ सकते हैं। हाँ, अगर आपकी वेशभूषा बिलकुल ही सामाजिक दायरों के बाहर है तो आपको अलग से बुलाकर सचेत किया जा सकता है; मगर, आपको किसी नियत तरह के परिधान में आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसका परिणाम यह है कि मैं स्कूल में टरबन पहने सिख बच्चों को भी देखती हूँ तो हिज़ाब या कभी-कभी अबाया पहने मुस्लिम बच्चियों को भी। फटी जींस में आ रही गोरी लड़कियों को देखती हूँ तो लम्बे, घुंघराले बालों में हेयर बैंड या टोपी लगाए लड़कों को भी। पिछले साल अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा अफ़ग़ानिस्तान से सेना हटा लेने के बाद आए अफ़ग़ान शर्णार्थियों की बढ़ी संख्या से विद्यालयों में दिखाई देने वाला यह विरोधाभास अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया।
लेकिन वाह रे देश! यहाँ मन-ही-मन आप जो भी सोचते रहे, लेकिन किसी के भी कपड़े लत्तों, रंग-रूप, नैन-नक़्श पर उल्टी-सीधी टिप्पणी करना आज की तारीख़ में एक बड़ी समस्या को बुलावा दे सकता है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और एक दूसरे के प्रति आदर-भाव की ऐसी मिसाल इस स्तर पर देखने को मिलती हो। मेरी भगवान से प्रार्थना है कि इस देश में मिल रही असीमित स्वतंत्रता और संसाधनों का कभी भी किसी के द्वारा दुरुपयोग न हो और यह देश हमेशा दुनिया के सामने नयी-नयी मिसालें क़ायम करता रहे।

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