डायस्पोरा से संवाद (श्री सुभाष शर्मा)

वैश्विक हिंदी परिवार एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संयुक्त तत्वावधान में “डायसपोरा से संवाद” कार्यक्रम का आयोजन 11 मई 2026 को सायं 5:30 बजे, 208 नॉर्थ एवेन्यू, नई दिल्ली में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध लेखक, विद्वान एवं प्रौद्योगिकीविद् श्री सुभाष शर्मा जी रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रवासी भारतीयों के माध्यम से हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के वैश्विक स्वरूप पर सार्थक संवाद स्थापित करना था।
कार्यक्रम का संचालन व संवाद डॉ. अनीता वर्मा ‘सेठी’ द्वारा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ. अनीता वर्मा ‘सेठी’ ने सुभाष शर्मा जी का औपचारिक स्वागत किया। इसके पश्चात कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री नारायण कुमार जी ने अंगवस्त्र भेंट कर उनका सम्मान किया। तत्पश्चात श्री ऋषि कुमार शर्मा जी ने सभी सहभागियों एवं अतिथियों का स्वागत किया।
इसके बाद डॉ. अनीता वर्मा ‘सेठी’ ने सुभाष शर्मा जी का परिचय देते हुए संवाद आरंभ किया।
उन्होंने पहला प्रश्न हिंदी के प्रचार-प्रसार में आने वाली चुनौतियों को लेकर पूछा। इसके उत्तर में सुभाष शर्मा जी ने कहा कि विदेशों में प्रायः दो प्रश्न बार-बार सामने आते हैं— पहला, जब पूरी दुनिया अंग्रेजी की ओर बढ़ रही है तो हिंदी क्यों? दूसरा, केवल हिंदी ही क्यों, अन्य भारतीय भाषाएं क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी भाषा से ही अपनी पहचान प्राप्त करता है। यदि भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखना है तो हिंदी की ओर बढ़ना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाला समय भारत का है और भविष्य में हिंदी की आवश्यकता विश्व स्तर पर और अधिक बढ़ेगी।
डॉ. अनीता जी ने अगला प्रश्न करते हुए पूछा कि विदेश में रहते हुए क्या उन्हें भारत से दूर होने का दर्द महसूस होता है तथा एक लेखक के रूप में वे वहां रहकर साहित्यिक प्रगति को किस प्रकार देखते हैं। इसके उत्तर में सुभाष जी ने अपनी भावनाओं को इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया—
“मजा नहीं वो आया,
कहने को घर एक मैंने एक बनाया है,
लगता है वो अपना नहीं तो पराया है।”
इन पंक्तियों ने प्रवासी जीवन की पीड़ा और अपनी मिट्टी से जुड़ाव की संवेदना को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया।
इसके बाद डॉ. अनीता वर्मा ‘सेठी’ ने “साहित्य संध्या गोष्ठी” की शुरुआत के विषय में प्रश्न किया। सुभाष शर्मा जी ने बताया कि साहित्यिक अभिव्यक्ति और आपसी संवाद के उद्देश्य से यह पहल शुरू की गई थी। धीरे-धीरे यह एक महत्वपूर्ण साहित्यिक मंच बनता गया। उन्होंने बताया कि अब तक लगभग 25 से 30 पुस्तकों का विमोचन हो चुका है। सिडनी की रेखा राजवंशी जी ने आगे बढ़कर ऑस्ट्रेलिया के हिंदी कवियों का एक संग्रह तैयार करवाया। उन्होंने कहा कि विचार उनका था, किंतु रेखा जी का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि आज नई पीढ़ी में हिंदी लेखन के प्रति रुचि बढ़ रही है और युवा वर्ग भी सक्रिय रूप से आगे आ रहा है।
आगे डॉ. अनीता जी ने वैश्विक संकट और हिंदी साहित्य के संदर्भ में ऑस्ट्रेलिया की स्थिति पर प्रश्न किया। इसके उत्तर में सुभाष जी ने कहा कि वहां बच्चों के लिए हिंदी पाठ्य सामग्री का अभाव एक बड़ी समस्या है। उन्होंने बताया कि विक्टोरिया स्कूल ऑफ लैंग्वेज में विभिन्न भाषाएं पढ़ाई जाती हैं और वे लोग हिंदी के लिए भी सहयोग करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक देशों में सहयोग प्रायः वोट के आधार पर निर्धारित होता है। कई सर्वेक्षणों में लोग अंग्रेजी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं का उल्लेख कर देते हैं, जिससे हिंदी की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती। उन्होंने “हिंग्लिश” को हिंदी भाषा के सामने एक गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने विश्वविद्यालयों से जुड़े कुछ प्रसंगों का भी उल्लेख किया।

कार्यक्रम में वक्ता के रूप में श्री ऋषि कुमार शर्मा जी ने सुभाष शर्मा जी के साहित्यिक योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि उनके लेखन में गहरी संवेदनशीलता और सामाजिक दृष्टि दिखाई देती है। उन्होंने सुभाष जी की कहानी “बेटी तो अपनी है” में घर-जमाई की चर्चा का विशेष उल्लेख किया तथा उनकी कविता “पतझड़” की भी चर्चा की।
तत्पश्चात उपस्थित साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने सुभाष शर्मा जी के साहित्य और उनके कार्यों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
“प्रवासी संसार” के संपादक श्री राकेश पांडे जी ने टिप्पणी करते हुए दो बच्चियों से जुड़ी संवेदनात्मक चर्चा का उल्लेख किया और कहा कि सुभाष जी की रचनाओं में प्रवासी जीवन का पुट अत्यंत प्रभावशाली ढंग से दिखाई देता है।
वेद प्रकाश व्यथित जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर बच्चों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जिससे नई पीढ़ी हिंदी से जुड़ती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय संस्कृति से जुड़े उत्सवों के माध्यम से प्रवासी भारतीयों को भारतीय परंपराओं से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है।
हरिसिंह पाल जी ने कहा कि पत्रिका संपादन के माध्यम से उनका प्रवासी हिंदी समाज से परिचय हुआ तथा नगरी लिपि की ऑस्ट्रेलिया शाखा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। उन्होंने हिंदी भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे इन प्रयासों की सराहना की।
श्री वरुण कुमार जी ने प्रश्न किया कि अन्य देशों के डायसपोरा की तुलना में भारतीय डायसपोरा किस प्रकार अलग और विशिष्ट है। उन्होंने यह भी पूछा कि “हिंग्लिश” जैसी समस्या क्या अन्य भाषाओं के साथ भी देखने को मिलती है।
श्री अनिल जी ने “हिंग्लिश” की समस्या पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भाषा के साथ संस्कृति जुड़ी होती है। यदि भाषा को उसकी समग्रता में समझना है तो अपनी परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ना आवश्यक है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री नारायण कुमार जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि फिजी में एक समय तत्कालीन एआरएसपी के निदेशक ने वहां के तानाशाह को समझाया था कि शासन केवल सैनिक शक्ति से नहीं, बल्कि जनता के सहयोग से चलता है। उन्होंने कहा कि हिंदी डायसपोरा का कभी सूर्यास्त नहीं होता और हिंदी ही उसकी प्रमुख भाषा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीयों से पहले पाश्चात्य विद्वानों ने हिंदी के महत्व को पहचाना था।
कार्यक्रम में डॉ. जी. जी. सक्सेना, डॉ. राजपाल जी, एम्स से जुड़े विद्वान, श्री अनुज अग्रवाल जी सहित अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं हिंदी प्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के संयोजक श्री शिव कुमार निगम तथा सह-संयोजक श्री शिवम शर्मा रहे। कार्यक्रम के अंत में श्री शिवम शर्मा जी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं उपस्थित श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सभी के सहयोग की सराहना करते हुए हिंदी भाषा के वैश्विक प्रसार हेतु निरंतर कार्य करते रहने का आह्वान किया।
यह आयोजन हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के वैश्विक विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायी पहल सिद्ध हुआ। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि विश्वभर में भारतीय अस्मिता, संस्कृति और भावनात्मक एकता का सशक्त माध्यम है।
रिपोर्ट :— शिवम शर्मा
