गीत-ग़ज़ल और संगीत का कार्यक्रम सम्पन्न

इन दिनों संगतकारों के साथ कोई आयोजन करना काफी महंगा होता है। ऐसे में बीच का मार्ग निकाला जाता है कि पहले से रिकॉर्डेड संगीत पर गा लिया जाए, केराओके टाइप कुछ या केवल जिसे पेटी-तबला (हारमोनियम- तबला) कहते हैं, उसके साथ एक या अधिक से अधिक युगल में गा लिया जाए। ऐसे में तीन संगतकार और चार गायक, एक सूत्रधार के साथ मतलब आठ लोगों को साथ लेकर संगीत संध्या का आयोजन किसी मेजबानी से कम नहीं होता। आकाशवाणी के 90 साल पूरे होने की ख़ुशी में इसके पुणे केंद्र ने सभी के लिए गीत-ग़ज़ल और सूफीयाना कलाम की महफ़िल रखी थी- अगर है शौक मिलने का…नाम से। हल्लाज़ मंसूर की इस ग़ज़ल के साथ गीतों-ग़ज़लों की लंबी माला पिरोई गई थी। चूँकि आठ लोग मंच पर थे तो उनसे जुड़े कई श्रोता आने पक्के ही थे। साथ में आकाशवाणी का जादू भी था कि कोथरूड के एमईएस बाल शिक्षण मंदिर का सभागार खचाखच भर गया था। लगभग समय पर कार्यक्रम शुरू भी हो गया इसलिए देर से आने वालों को बैठने की जगह नहीं मिली, उन्हें खड़े रहना पड़ा। कार्यक्रम पहली मंजिल पर था और लिफ़्ट नहीं थी, इससे कुछ उम्रदराज़ लोगों व उपस्थित विकलांग व्यक्ति को तकलीफ़ हुई पर उन्हें ऊपर ले जाने की व्यवस्था आयोजकों ने की थी। प्रस्तावना देते हुए आकाशवाणी के अधिकारी इंद्रजीत बागल थोड़ा लंबा बोल गए। लोग गीत सुनने आए थे, भाषण सुनने नहीं। उसके बाद प्रसाद कुलकर्णी ने सूत्र अपने हाथों में लिए। कार्यक्रम का शीर्षक तो हिंदी था लेकिन आयोजन पत्र में कोई जिक्र नहीं था कि यह किस भाषा में होगा। प्रस्तावना और स्वागत आदि के भाषण मराठी में थे तो कुछ श्रोता असमंजस में भी थे।
खैर मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ। सूत्रधार डॉ. सुनील केशव देवधर ने बोलना शुरू किया तो हिंदी भाषा प्रेमियों के जान में जान आई कि कार्यक्रम हिंदी में था। डॉ. देवधर का अध्ययन उनके संचालन में दिख रहा था। वे एक बात से दूसरी बात को, एक गीत से दूसरे गीत को ऐसे जोड़ रहे थे कि लोगों को दो गीतों के बीच के अंतराल में उनका बोलना भी मधुर ही लग रहा था। मंच के पीछे परदे पर स्क्रीन लगी थी। उसका उपयोग केवल कार्यक्रम का पोस्टर दिखाने के लिए किया गया। जो गीत गाया जा रहा था, उसके बोल उस स्क्रीन पर दिखाकर उसका अधिक उपयोग हो सकता था। संत मलूक दास के कलाम दरद दीवाने बावरे से राजेश दातार ने अपनी रियाज़दार आवाज़ में कार्यक्रम का आगाज़ किया। राग बैरागी पर आधारित इस कलाम ने पूरे माहौल को पहले ही पल में सूफियाना बना दिया। कार्यक्रम की परिकल्पना करते हुए संगीत संयोजक राहुल श्रीवास्तव ने इसे पहला कलाम चुनकर बेहतरीन माहौल बना लिया। इस पहले ही कलाम से गायक के साथ तबले पर अमित जोशी, कीबोर्ड पर रोहित कुलकर्णी और वायोलिन पर अंजली राव ने अपनी अंगुलियों का जादू बिखेर दिया। दूसरा राग चंद्रकौस था और मिर्ज़ा ग़ालिब का कलाम था कि दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है…इस बहुश्रुत ग़ज़ल को नए तरीके से, नई धुन में सुनना सबके लिए ताज़ा अनुभव था। मृण्मयी फाटक ने इसे अपनी आवाज़ दी। निदा फाज़ली की कलम से निकले दिल में ना हो जुर्रत को सावनी लाड ने आवाज़ दी। अब राग ख़माज अपनी परतें खोल रहा था। राजेश के बाद मृण्मयी और सावनी ने सुरों पर अपनी पकड़ को बताया। यह सभी गायक इतने शानदार तरीके से गा रहे थे कि इसे सुगम संगीत का नाम दें या शास्त्रीय संगीत की बैठक कहें, तय कर पाना मुश्किल था। हालाँकि कुछ आलापदारी कम भी की जा सकती थी, इसे कार्यक्रम में और कसावट आ जाती। राग जोग में राजेश ने विरह व्याकुल पीर जागी को सुर दिया तो मृण्मयी के साथ अगला गीत यह विरह की रात साथी (गीतकार-सुरेंद्र शर्मा शिरीष) में गावती राग से विरह वेदना को जगा दिया। राग कलावती में निबद्ध गुरु नानक देव के सबद कारे रे वन खोजन जाई को सावनी ने गाया। राजेश, मृण्मयी और राहुल श्रीवास्तव की टीम में शायद सावनी नई-नवेली थी। उसकी गायिकी में भी वह अजनबीपन- अनगढ़ता दिख रही थी। राहुल ने भैरवी राग में मंसूर की ग़ज़ल अगर है शौक मिलने का सुनाई। भैरवी के बाद लगा कि समापन होगा। समय भी हो चला था लेकिन यह तो मध्याह्न था। राग भूपाली से फिर नए सिरे से आगाज़ हुआ संत कबीर के पद चदरिया झीनी रे झीनी। अब श्रोता भी पूरी तरह रंग गए थे और वंस मोर, वंस मोर की प्रतिध्वनि आने लगी थी। रागदारी के साथ मृण्मयी ने कतिल शिफाई की ग़ज़ल वो दिल ही क्या, राग पूरिया कल्याण में गाई। संत कबीर के मन लागो मेरो यार फकीरी में और उड़ जाएगा हंस अकेला क्रमशः राग वृंदावन सारंग और जोग में आधारित थे। संयोजन गौरव शिंपी का था। कुल जमा एक मधुर शाम ने मंगलवार को विराम लिया।
रिपोर्ट :— स्वरांगी साने
