“यादों में गौरैया” उपन्यास को साहित्य सम्मान ( रांची )

प्रसिद्ध साहित्यकार और व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ के चर्चित उपन्यास को ‘साहित्य चेतना मंच’ ने चुना वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कृति महानगरीय चकाचौंध, कंक्रीट के फैलते जंगलों और बिखरते मानवीय रिश्तों के बीच लुप्त होती संवेदनाओं को शब्दों में पिरोने वाले देश के प्रख्यात लेखक, कवि और व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ के बहुचर्चित उपन्यास ‘यादों में गौरैया’ ने साहित्य जगत में एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम की है। रांची की शीर्ष सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य चेतना मंच’ ने इस वर्ष के प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार के लिए डॉ. मिश्रा की इस कालजयी कृति को सर्वसम्मति से चुना है संस्था के अध्यक्ष श्री त्रिलोचन तिवारी ने घोषणा की है कि राष्ट्रीय हिंदी दिवस (14 सितंबर) के पावन अवसर पर रांची में आयोजित होने वाले एक भव्य और गरिमामयी राष्ट्रीय साहित्यिक समारोह में डॉ. उरतृप्त को ₹21,000 की सम्मान राशि, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया जाएगा। युवाओं की पसंद और विद्वानों की कसौटी पर खरी उतरी कृति इस वर्ष पुरस्कार के चयन के लिए संस्था ने एक अनूठी और बेहद निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई थी। उपन्यास का चयन केवल बंद कमरों में बैठे समीक्षकों ने नहीं, बल्कि आज के डिजिटल दौर के युवाओं और वरिष्ठ आलोचकों की साझी सहमति से हुआ है। ‘यादों में गौरैया’ ने सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए और साथ ही प्रबुद्ध आलोचकों की कसौटी पर भी सर्वोच्च स्थान पाया। यह उपन्यास आज की पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच एक वैचारिक सेतु बनकर उभरा है, जिसने पाठकों को भीतर तक झकझोर दिया है। व्यंग्य और संवेदना का अनूठा संगम: आज के दौर का सच संस्था के अध्यक्ष श्री त्रिलोचन तिवारी ने डॉ. उरतृप्त के लेखन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा: “आज के इस अति-आधुनिक युग में जहाँ मानवीय रिश्ते बाज़ारवाद की भेंट चढ़ रहे हैं, वहाँ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ने एक छोटी सी ‘गौरैया’ को माध्यम बनाकर महानगरीय सभ्यता के खोखलेपन, दिखावे और स्वार्थपरता पर जो तीखा और मर्मस्पर्शी व्यंग्य किया है, वह अद्भुत है। उनका लेखन केवल पर्यावरण संकट को नहीं दिखाता, बल्कि तकनीकी अंधी दौड़ में अजनबी होते जा रहे इंसानी समाज का एक्स-रे करता है।” मर्मस्पर्शी लेखन शैली उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पठनीयता और अनूठी संवाद-शैली है। समकालीन हिंदी लेखन के शीर्ष हस्ताक्षरों की तरह डॉ. मिश्रा ने इस उपन्यास में आज की भाषा और आज के परिवेश को इतनी जीवंतता से ढाला है कि पाठक पुस्तक से बंध जाता है। जहाँ एक तरफ इंस्टेंट मैसेजिंग के दौर में लोग अंदर से अकेले हो रहे हैं, वहीं डॉ. मिश्रा का यह उपन्यास हमें अपनी जड़ों, अपनी प्रकृति और अपने भीतर की बची हुई इंसानियत की ओर लौटने का मूक आमंत्रण देता है। 14 सितंबर को रांची में होने वाले इस भव्य राष्ट्रीय आयोजन को लेकर देश के साहित्यिक गलियारों में भारी उत्साह है। डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ को मिलने वाला यह सम्मान न केवल उनके उत्कृष्ट लेखन की जीत है, बल्कि उस गंभीर और संवेदनशील विमर्श की भी जीत है जिसकी आज के समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है। इस गौरवमयी उपलब्धि पर देश भर के साहित्यकारों, प्रशंसकों और पाठकों ने डॉ. मिश्रा को बधाई और शुभकामनाएं प्रेषित की हैं।

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