“गुंजन” राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ की कहानी को प्रथम पुरस्कार

दार्जलिंग: पहाड़ों की मखमली धुंध, चाय के बागानों की हरीतिमा और किताबों की सोंधी खुशबू को अपने आंचल में समेटे दार्जलिंग की प्रतिष्ठित मासिक साहित्यिक पत्रिका ‘गुंजन’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता (जनवरी-मार्च 2026) के बहुप्रतीक्षित परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। इस बेहद गरिमामयी, प्रतिष्ठित और कठिन अखिल भारतीय प्रतियोगिता में देश के जाने-माने साहित्यकार, शिक्षाविद और प्रखर रचनाकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ने एक अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। उनकी मर्मस्पर्शी और संवेदनात्मक कहानी ‘इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं’ को देश भर से प्राप्त प्रविष्टियों में से प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया है। इस अखिल भारतीय कहानी महाकुंभ में देश के कोने-कोने से प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई थीं, जिनमें कुल 703 कहानियों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई थी। इस गलाकाट प्रतियोगिता में, जहाँ हर कहानी की अपनी एक अलग धुन, विशिष्ट शैली और विधागत विविधता थी, वहाँ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ के विशिष्ट शब्द-शिल्प ने निर्णायक मंडल को गहराई तक प्रभावित किया। ‘गुंजन’ पत्रिका की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष निर्णायक मंडली तथा संपादक मंडल ने गहन समीक्षा के बाद उनकी इस अनूठी रचना को कथ्य, शिल्प, भाषा-शैली और संवेगात्मक गहराई के धरातल पर सर्वश्रेष्ठ पाया। एक ऐसे दौर में जब समकालीन लेखन अक्सर तात्कालिकता और सतहीपन का शिकार हो जाता है, डॉ. मिश्रा की यह पुरस्कृत कहानी मानव जीवन की आंतरिक जटिलताओं, आधुनिक महानगरीय जीवन की अंधी आपाधापी और यांत्रिक युग में बढ़ती संवादहीनता के बीच भटकती हुई मानवीय संवेदनाओं को बेहद सलीके और परिपक्वता से छूती है। यह सर्वोच्च सम्मान न केवल उनकी विलक्षण लेखन क्षमता, बल्कि उनकी गंभीर जीवन-दृष्टि और समाज के प्रति उनकी संवेदनशीलता पर एक बार फिर से अपनी मजबूत मुहर लगाता है, जिससे समकालीन हिंदी कहानी लेखन को एक नई और सकारात्मक दिशा मिली है। इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ने सोशल मीडिया और देश के विभिन्न साहित्यिक गलियारों में अपने विचारों को साझा किया है। उन्होंने इस सफलता को शब्दों की वास्तविक जीत बताते हुए कहा कि जब सात सौ से अधिक उत्कृष्ट कहानियों की उस विशाल भीड़ में से उनकी कहानी ‘इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं’ को प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया, तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी पारखी ने बेहद सलीके और आत्मीयता से उनकी रूह को छू लिया हो। उनके अनुसार, कहानियाँ लिखना और कुछ नहीं, बल्कि इस शोर-शराबे से भरी दुनिया में खुद से मिलने की और खुद को तलाशने की एक नाकाम सी कोशिश मात्र है। उन्होंने जीवन के आधुनिक यथार्थ को रेखांकित करते हुए आगे कहा कि जब जिंदगी के सारे भौतिक रास्ते बंद हो रहे हों और दुनिया के सारे नेटवर्क बिजी आ रहे हों, तब शब्दों का यह निश्छल सफर इंसान को भटकाव से बचाकर किसी सही और सुरक्षित जगह पर पहुँचा देता है। डॉ. मिश्रा ने स्पष्ट किया कि यह सम्मान सिर्फ एक औपचारिक पुरस्कार नहीं है, बल्कि उन शब्दों की वैचारिक जीत है जिन्हें उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ कागज़ पर उतारा था। इसके साथ ही उन्होंने अपनी इस अनूठी कृति की अंतर्निहित संवेदनात्मक गहराई को समझने, उसे सराहने तथा देश स्तर पर यह सर्वोच्च स्थान प्रदान करने के लिए ‘गुंजन’ पत्रिका की सम्मानित निर्णायक मंडली, संपादक मंडल और पाठकों का हृदय की गहराइयों से बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार प्रकट किया।
