श्रद्धांजलि के स्वर, साहित्य के संग

“तुम मेरी धमनियों में रक्त बन बह रहे हो,
जैसे धरती में होती है अपनी सौंधी सुगंध।
और फूलों में बसी भीनी-मधुर महक॥”
1 जून 2026 को मेरे पूज्य पिताश्री, शिक्षाविद् एवं संस्कारवान व्यक्तित्व स्वर्गीय श्री रामेश्वर प्रसाद भार्गव जी के जन्मदिवस के अवसर पर उनके प्रति श्रद्धा, स्मरण एवं कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मेरे निवास पर एक आत्मीय साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। शिक्षा और साहित्य के प्रति उनके समर्पण को स्मरण करते हुए प्रतिवर्ष उनके जन्मदिवस पर किसी न किसी रचनात्मक एवं शैक्षिक गतिविधि के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का मेरा प्रयास रहता है। इसी क्रम में इस वर्ष भी यह विशेष आयोजन संपन्न हुआ। यह गोष्ठी केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि स्मृतियों, संवेदनाओं, आत्मीयता और सांस्कृतिक मूल्यों का ऐसा संगम थी जिसने उपस्थित सभी साहित्यप्रेमियों के मन को स्पर्श किया। कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित कवियों, ग़ज़लकारों, साहित्यकारों एवं चिंतकों ने सहभागिता करते हुए अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया। कार्यक्रम का शुभारंभ स्वर्गीय श्री रामेश्वर प्रसाद भार्गव जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुआ। उनकी नातिन शिवानी ने अपने नाना-नानी से जुड़े भावपूर्ण संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि उनके नाना-नानी स्वतंत्र चिंतन, आत्मनिर्भरता एवं स्वनिर्णय की भावना के समर्थक थे। यही जीवन-मूल्य उन्होंने अपनी पुत्री को प्रदान किए और वही संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुँचे। उनके विचारों और शिक्षाओं का प्रभाव आज भी परिवार के प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार, साहित्यकार, ‘साहित्य अमृत’ के संपादक तथा आकाशवाणी, दिल्ली के पूर्व उपमहानिदेशक आदरणीय श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी उपस्थित रहे। उनके अतिरिक्त दूरदर्शन के पूर्व निर्माता-निर्देशक, मीडियाकर्मी, आलोचक एवं साहित्यकार डॉ. अमरनाथ ‘अमर’, वरिष्ठ कवि श्री राजेश्वर वशिष्ठ, प्रसिद्ध कवयित्री एवं शायरा सुश्री ममता किरण, वरिष्ठ कवि श्री राजेंद्र निगम, वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती इंदु निगम, हिंदी साहित्य एवं व्याकरण के विद्वान लेखक-संपादक श्री अशोक बत्रा, सुश्री शकुंतला मित्तल, श्रीमती सविता स्याल, श्रीमती मीना चौधरी, श्री सुजीत कुमार तथा श्रीमती रानी श्रीवास्तव सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर ‘गुरुग्राम टुडे’ के संपादक (दैनिक),संपादक व वरिष्ठ टीवी पैनलिस्ट आदरणीय श्री अनिल आर्य भी उपस्थित रहे। सभी विद्वानों के सारगर्भित काव्य-पाठ, गीत, ग़ज़लों एवं विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को अत्यंत प्रभावशाली एवं अविस्मरणीय बना दिया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार आदरणीय श्री त्रिलोक कौशिक ने अपनी विशिष्ट एवं प्रभावशाली शैली में किया। उनके संयमित, सुसंस्कृत और साहित्यिक गरिमा से युक्त संचालन ने पूरे आयोजन को विशेष ऊँचाई प्रदान की तथा कार्यक्रम को एक सशक्त साहित्यिक स्वरूप दिया। श्रोताओं में सुश्री सरोज ‘अमर’, श्री दीपक चौधरी एवं श्री उमेश (विक्की) भार्गव की उपस्थिति ने भी आयोजन की आत्मीयता को और अधिक सुदृढ़ किया। कार्यक्रम के दौरान अनेक भावपूर्ण क्षण उपस्थित हुए। आदरणीय डॉ. अमरनाथ ‘अमर’ जी ने मुझे स्नेहपूर्वक ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भेंट की। वहीं आदरणीय श्री त्रिलोक कौशिक जी ने अपनी लिखी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें मुझे उपहारस्वरूप प्रदान कीं, जो मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान स्मृतियाँ बन गईं। इस अवसर पर आदरणीया श्रीमती सविता स्याल जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त करना भी आवश्यक है। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित ‘ट्रू मीडिया विशेषांक’ तथा ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ के लोकार्पण समारोह में मेरी अनुपस्थिति के बावजूद वे स्वयं मेरे निवास पर पधारीं और मुझे सम्मानित किया। उनका यह स्नेह, अपनत्व और आत्मीय व्यवहार मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगा। एक सुखद संयोग यह भी रहा कि इसी दिन ‘गुरुग्राम टुडे’ के संपादक आदरणीय श्री अनिल आर्य जी का जन्मदिवस भी था। उनकी उपस्थिति में सभी साहित्यकार मित्रों ने मिलकर केक काटा और उन्हें जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलकामनाएँ अर्पित कीं। इस आत्मीय आयोजन ने कार्यक्रम में उल्लास और पारिवारिक ऊष्मा का एक सुंदर रंग भर दिया। अंत में मैंने अपने पिताश्री को स्मरण करते हुए अपनी भावनाएँ इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त कीं—
“यह जानते हुए भी कि तुम नहीं हो,
फिर भी तुम्हें मन मेरा ढूँढ़ता है।
वो अप्रतिम सागर प्रेम का,
वह शिक्षा तुम्हारी,
जीवन का मेरे संबल बन,
सफ़र मेरे जीवन का
सफल कर रहा है॥”
साहित्य, संवेदना, स्मृतियों और आत्मीय संबंधों से परिपूर्ण यह आयोजन न केवल स्वर्गीय श्री रामेश्वर प्रसाद भार्गव जी को समर्पित एक भावभीनी श्रद्धांजलि था, बल्कि साहित्यिक संस्कारों, मानवीय मूल्यों और पारिवारिक परंपराओं के सम्मान का एक सुंदर उदाहरण भी बना। कार्यक्रम में उपस्थित सभी साहित्यकारों, कवियों, विद्वानों एवं शुभचिंतकों के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ, जिनकी गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को यादगार बना दिया।
रिपोर्ट :— डॉ. नलिनी भार्गव
