पूर्वोत्तर एवं कश्मीर में देवनागरी लिपि का प्रयोग : चुनौतियाँ और संभावनाएँ

दिनांक 31 मई 2026 को विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय था— “पूर्वोत्तर एवं कश्मीर में देवनागरी लिपि का प्रयोग : चुनौतियाँ और संभावनाएँ”। कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन हिंदी अकादमी के पूर्व सचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने किया। उन्होंने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. हितेंद्र मिश्र, निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कश्मीर से चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि भारत की विविधता में उसकी वास्तविक शक्ति निहित है। उन्होंने देवनागरी लिपि के माध्यम से भाषा-विकास की संभावनाओं पर विचार व्यक्त किया तथा बताया कि पूर्वोत्तर भारत में लगभग 171 भाषाएँ बोली जाती हैं। उन्होंने कहा कि कई भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं, जबकि अनेक भाषाओं ने रोमन लिपि को अपनाया है। देवनागरी के प्रसार हेतु अपेक्षित प्रयासों के अभाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रोमन लिपि ने इस स्थिति का लाभ उठाया है। राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ भी इसके लिए उत्तरदायी रही हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि जिन भाषाओं की ध्वनियों को देवनागरी में अभिव्यक्त किया जा सकता है, उन्हें चिह्नित कर क्रमबद्ध रूप से सूचीबद्ध किया जाए तथा आवश्यकतानुसार नए चिह्नों का निर्माण कर उच्चारणों की मैपिंग की जाए। उन्होंने मानकीकरण, अनुसंधान तथा कार्यान्वयन पर बल देते हुए कहा कि पूर्वोत्तर और कश्मीर की भाषाओं के पारंपरिक ज्ञान को देवनागरी लिपि के माध्यम से संरक्षित एवं समृद्ध किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल विचार-विमर्श पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यवहारिक स्तर पर कार्य करना भी आवश्यक है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. जोराम बेगी, प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त, अरुणाचल प्रदेश ने अपने वक्तव्य में कहा कि रोमन लिपि के प्रयोग में भी अनेक समस्याएँ सामने आ रही हैं। रोमन और देवनागरी की तुलनात्मक समीक्षा से नए समाधान खोजे जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ निकटता के कारण देवनागरी एक सशक्त विकल्प बन सकती है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि अरुणाचल प्रदेश में लोग प्रायः व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल माध्यमों में अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं, जो एक चुनौती है। इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय भाषाओं के लिए देवनागरी एक उपयुक्त विकल्प सिद्ध हो सकती है तथा इसके लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

विशिष्ट अतिथि डॉ.मुदस्सिर अहमद भट्ट, सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर ने कश्मीरी भाषा में देवनागरी लिपि की चुनौतियों और संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कश्मीरी भाषा का प्रारंभिक संबंध शारदा लिपि से रहा है, जबकि वर्तमान में उस पर फारसी-अरबी लिपि का प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि कश्मीरी भाषा की कुछ विशिष्ट ध्वनियाँ ऐसी हैं जिन्हें देवनागरी में अभिव्यक्त करने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने इस दिशा में शोध, मानकीकरण तथा नए चिह्नों के विकास की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि देवनागरी के माध्यम से कश्मीरी भाषा और साहित्य के विकास की संभावनाएँ व्यापक हैं। बीज वक्ता के रूप में डॉ.रमेश गौड़, निदेशक, कलानिधि प्रभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने भाषा और लिपि के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की अनेक मातृभाषाओं की अपनी कोई लिखित लिपि नहीं है, जो एक गंभीर चुनौती है। उन्होंने बताया कि ऐसी भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए भारत सरकार को प्रस्ताव भेजे गए हैं, जिनमें से अनेक स्वीकृत हो चुके हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि पूर्वोत्तर की भाषाओं को देवनागरी के माध्यम से लिपिबद्ध कर उनके संरक्षण एवं संवर्धन का कार्य किया जाए। उन्होंने इस कार्य को राजनीतिक दृष्टिकोण से अलग रखते हुए सांस्कृतिक संरक्षण के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। वक्ता के रूप में डॉ. तादाम रूती, विभागाध्यक्ष, शासकीय महाविद्यालय, दोईमुख-मिदपू, अरुणाचल प्रदेश ने अरुणाचल प्रदेश में देवनागरी लिपि की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि राज्य में 26 प्रमुख जनजातियाँ हैं, जिनमें से केवल दो जनजातियों की अपनी लिपि है। अधिकांश समुदाय अन्य लिपि का प्रयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि देवनागरी अभिव्यक्ति की दृष्टि से अत्यंत सक्षम लिपि है तथा स्थानीय ध्वनियों के अनुरूप आवश्यक नए चिह्न विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उचित प्रयासों से देवनागरी का विस्तार संभव है और वे स्वयं इस दिशा में सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। कार्यक्रम के अंत में डॉ. जयशंकर यादव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, आयोजकों तथा सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ.वरुण कुमार, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा किया गया। अंततः यह संगोष्ठी पूर्वोत्तर और कश्मीर की भाषाओं में देवनागरी लिपि की संभावनाओं, चुनौतियों और भविष्य की कार्ययोजना पर गंभीर विमर्श का महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुई। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि सरकारी प्रयासों के साथ-साथ सामाजिक सहभागिता, अनुसंधान, मानकीकरण तथा व्यवहारिक कार्यों के माध्यम से ही देवनागरी लिपि का व्यापक विकास और प्रसार संभव है।

रिपोर्ट :— अजय शर्मा

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