पर्यावरण दिवस पर ‘भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण’ के राजभाषा विभाग में’ नदी गायब है’ पर परिचर्चा


‘भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण’ के निगमित मुख्यालय का राजभाषा विभाग हिन्दी के प्रसार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अनेक गतिविधियों का परिचालन करता है। इन कार्यक्रमों में भाषा के साथ सामाजिक सरोकार भी केंद्र में होते हैं। इस कार्यालय द्वारा दिनांक 05 जून, 2026 को पर्यावरण दिवस पर प्रख्यात कहानीकार श्री एस. आर. हरनोट जी की कहानी “नदी गायब है” पर सार्थक परिचर्चा आयोजित की गई। विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. राजेंद्र गौतम आमंत्रित थे। इसमें ‘प्राधिकरण’ के 40 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों ने भाग लिया। भारत सरकार और उसके निकायों के राजभाषा विषयक आयोजन अधिकतर तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित होते हैं जबकि यह आयोजन एक अभिनव प्रयोग था। इसमें सभी प्रतिभागियों ने क्रमशः कहानी का पाठ किया और फिर डॉ. राजेंद्र गौतम ने कहानी के सभी पक्षों का विस्तार से विश्लेषण किया। कार्यक्रम में ‘प्राधिकरण’ की कार्यपालक निदेशक (प्रशासन) श्रीमती माया लवानिया की विशेष उपस्थिति रही। संयोजन श्री संजीव कुमार, संयुक्त महाप्रबंधक (राजभाषा) ने किया और कार्यक्रम के आरंभ में इसके स्वरूप पर प्रकाश डाला। प्रो. गौतम ने इस अभिनव प्रयोग की सराहना करते हुए कहा कि भाषा के तकनीकी पक्षों की जानकारी जहां अधिकारियों और कर्मचारियों को राजभाषा में कार्य करने का कौशल प्रदान करती है, वहां ऐसे आयोजन मानवीय संवेदना को उत्प्रेरित करते हैं और प्रतिभागियों को सामाजिक सरोकारों के प्रति भी जागरूक बनाते हैं।
दिल्ली के सफदरजंग हवाई अड्डे पर स्थित राजीव गांधी भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में एक रोचक प्रसंग तब आया जब शिमला में उपस्थित ‘नदी गायब है’ के रचनाकार श्री एस. आर. हरनोट से प्रो. गौतम ने वीडियो कॉल के द्वारा प्रतिभागियों से जुड़ने का आग्रह किया। प्रतिभागियों का रचनाकार से यह सीधा संवाद बहुत उत्प्रेरक था। हरनोट जी ने इस कहानी के अतिरिक्त भी ऐसी अनेक कहानियों और उपन्यासों की रचना की है, जिनमें पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता तो व्यक्त हुई ही है, साथ ही हिमाचल की लोक संस्कृति और लोक-आस्थाओं के भी अद्भुत बिम्ब दिखाई देते हैं। जैसा कि डॉक्टर गौतम ने इस कार्यक्रम में स्पष्ट किया, आधुनिक जीवन की जटिलताएं और संघर्ष और पारंपरिक मान्यताओं के बीच के नाजुक रिश्ते को भी उन्होंने अपनी ‘नदी रंग जैसी लड़की’, ‘एक नदी तड़पती है’, ‘पीठ पर पहाड़’ और ‘हिडिंब’ जैसी रचनाओं में छुआ है। ‘नदी गायब है’ में कॉरपोरेट घरानों की धन-लोलुपता और प्रशासनिक शक्तियों से उनकी साँठ-गांठ से उत्पन्न उस त्रासद स्थिति का चित्रण है जो प्रकृति और संस्कृति– दोनों के लिए एक गंभीर संकट पैदा करती है। प्राकृतिक संसाधनों को लूटने वाले कॉरपोरेट घराने स्थानीय जीवन को दूभर कर देते हैं। विनाश विकास का वेश धरण कर आता है। ‘प्राधिकरण’ के अधिकारियों ने जन-सरोकारों के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कहानी पर खुलकर चर्चा की। इस चर्चा में कार्यालयी औपचारिकता की अपेक्षा गंभीर साहित्यिक और सामाजिक विचार-विमर्श हुआ। प्रो. गौतम ने कहानी के रचना-विधान और अभिव्यक्ति कौशल की भी विस्तार से चर्चा की तथा कहानी के उन प्रयोगों को और शब्दावली को रेखांकित किया जो लोकजीवन और स्थानीय विशेषताओं को साकार करती है। कार्यपालक निदेशक श्रीमती माया लवानिया ने विषय की प्रासंगिकता की चर्चा करते हुए राजभाषा विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को धन्यवाद दिया और उसे प्रत्येक प्रकार के प्रशासनिक सहयोग का आश्वासन भी दिया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण दिवस के संदर्भ में मैं वर्तमान चिंताजनक स्थितियों में इसके लिए बधाई तो नहीं दे सकती लेकिन मैं अनुभव करती हूँ कि चुनौती के रूप में हमें वर्तमान स्थितियों पर चर्चा करनी चाहिए। कार्यक्रम का समापन राजभाषा विभाग के उपमहा-प्रबंधक श्री संजीव कुमार द्वारा धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। आयोजन में प्राधिकरण के राजभाषा विभाग की पूरी टीम ने, विशेषकर श्री देवकांत पांडेय ने, सक्रियता सहयोग प्रदान किया।
रिपोर्ट :— डॉ. राजेन्द्र गौतम
