एआई, भाषा और भविष्य : ‘यंत्र बुद्धि’ पुस्तक पर वैश्विक हिंदी परिवार का संवाद

दिनांक : 14 जून 2026 (रविवार), विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय वरिष्ठ तकनीकी विशेषज्ञ एवं लेखक व सीईओ एल्गोटेक्नोलॉजिज बालेंदु शर्मा दाधीच की चर्चित पुस्तक ‘यंत्र बुद्धि’ पर संवाद रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री शिवकुमार निगम ( संयुक्त निदेशक (राजभाषा), इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार ) द्वारा स्वागत उद्बोधन से हुआ। तत्पश्चात कार्यक्रम के संचालक एवं संवादकर्ता विजय कुमार मल्होत्रा (पूर्व निदेशक रेल मंत्रालय भारत सरकार) ने पुस्तक का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए उसकी विषयवस्तु, मौलिकता तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा प्रारंभ की। उन्होंने श्रोताओं एवं प्रतिभागियों के प्रश्नों का संकलन कर संवाद को आगे बढ़ाया।
पुस्तक के शीर्षक ‘यंत्र बुद्धि’ पर विचार:
प्रथम प्रश्न पुस्तक के शीर्षक से संबंधित था कि इसका नाम ‘कृत्रिम बुद्धि’ के स्थान पर ‘यंत्र बुद्धि’ क्यों रखा गया। इसके उत्तर में बालेंदु शर्मा दाधीच ने कहा कि ‘कृत्रिम’ शब्द एआई की वास्तविक अवधारणा को पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाता। ‘आभासी’ या ‘कृत्रिम’ शब्द कहीं-कहीं नकली होने का बोध कराते हैं, जबकि यहाँ यंत्रों में विकसित बुद्धिमत्ता की बात हो रही है। इसलिए ‘यंत्र बुद्धि’ अधिक उपयुक्त एवं सार्थक नाम है।
एआई का स्वरूप एवं परिभाषा:
एआई के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि तकनीक के माध्यम से किसी मशीन से मनुष्य जैसी बुद्धिमत्तापूर्ण गतिविधियाँ करवाई जा सकें तो उसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता कहा जाता है। मशीन यदि डेटा के भीतर से ज्ञान अर्जित कर सके और निर्णय लेने की क्षमता विकसित कर ले, तो वह एआई का उदाहरण है।
पारंपरिक एल्गोरिदम और आधुनिक एआई का अंतर:
एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि एआई के पहले भी अनेक तकनीकी प्रणालियाँ कार्य कर रही थीं, किंतु वे मुख्यतः एल्गोरिदम आधारित थीं। वे केवल पूर्वनिर्धारित नियमों का पालन करती थीं। उदाहरण के रूप में स्पेल-चेक प्रणाली का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि वह भी एल्गोरिदम पर आधारित है। आधुनिक एआई इन प्रणालियों से आगे बढ़कर सीखने और नए निष्कर्ष निकालने की क्षमता रखता है।


साहित्य और भाषा के विकास में एआई की भूमिका:
एआई के साहित्यिक उपयोग पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अनुवाद प्रणालियों और गूगल ट्रांसलेट जैसे उपकरणों के माध्यम से आम लोगों का एआई से परिचय हुआ। वर्ष 2022 में चैटजीपीटी के आगमन ने एआई की संभावनाओं को नई दिशा दी। अब एआई केवल विश्लेषण और अनुवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि रचनात्मक लेखन, चित्र निर्माण तथा भाषा-संबंधी अनेक कार्य भी कर सकता है।
उन्होंने एआई की तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया—
नवीन एवं रचनात्मक सामग्री का निर्माण।
मानवीय भाषा को समझने की क्षमता।
संदर्भ के अनुरूप उत्तर एवं अनुवाद प्रस्तुत करने की योग्यता।
रोजगार पर एआई का प्रभाव:
रोजगार संबंधी प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि एआई निश्चित रूप से कार्य-क्षेत्र को प्रभावित करेगा। यह लोगों के कार्यों को अधिक दक्षता के साथ कर सकता है। उदाहरणस्वरूप वीडियो निर्माण में गीतकार, संगीतकार, संपादक तथा अन्य विशेषज्ञों के कई कार्यों को एक ही मंच पर संपन्न करने की क्षमता विकसित हो रही है। इसलिए भविष्य में कार्य-पद्धति में बड़े परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
एआई के क्षेत्र में भारत की स्थिति:
भारत की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि एआई के क्षेत्र में भारत अभी निवेश और संसाधनों के स्तर पर विकसित देशों से पीछे है। जहाँ वैश्विक एआई कंपनियों में सैकड़ों अरब डॉलर का निवेश हुआ है, वहीं भारत सरकार ने एआई विकास हेतु लगभग 10,385 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान में उपलब्ध मॉडलों पर कार्य कर रहा है, किंतु ‘भाषिणी’ और ‘सर्वम’ जैसे स्वदेशी प्रयास भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग:
मशीन लर्निंग को मशीनों की सीखने की प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा कि डीप लर्निंग मानव मस्तिष्क की संरचना से प्रेरित एक उन्नत तकनीक है, जो मशीन लर्निंग का ही विकसित रूप है और अधिक गुणवत्ता के साथ कार्य करती है।
दिव्यांगजनों के लिए एआई की उपयोगिता:
दृष्टिबाधित एवं श्रवणबाधित व्यक्तियों के संदर्भ में उन्होंने बताया कि एआई उनके जीवन को अधिक सुगम बना सकता है। पढ़ने में असमर्थ व्यक्तियों के लिए यह ध्वनि के माध्यम से सहायता कर सकता है तथा सुनने में असमर्थ व्यक्तियों के लिए वाणी को पाठ में परिवर्तित कर सकता है।
बिग डेटा की अवधारणाव:
बिग डेटा की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर उपलब्ध विशाल मात्रा में सूचनाएँ, ध्वनियाँ, चित्र, फाइलें और अन्य सामग्री डेटा का हिस्सा हैं। भारत के पास विशाल जनसंख्या और सस्ती इंटरनेट सेवाओं के कारण डेटा की प्रचुरता है, किंतु गुणवत्ता और सुव्यवस्थित संग्रहण अभी भी चुनौती है। उन्होंने बताया कि हिंदी का डिजिटल डेटा एक प्रतिशत से भी कम है।
डिजिटल डेटा और भारतीय भाषाएँ:
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में सामग्री को सार्वजनिक मंचों पर साझा करने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम है। बड़ी मात्रा में सामग्री पीडीएफ के रूप में उपलब्ध है, न कि खोज योग्य पाठ (टेक्स्ट) के रूप में। इसके बावजूद भविष्य में चीनी मंदारिन और हिंदी जैसी भाषाओं के डिजिटल विस्तार की व्यापक संभावनाएँ हैं।
भारतीय एआई परियोजनाएँ:
‘भाषिणी’, ‘सर्वम’ तथा अन्य भारतीय एआई परियोजनाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि ये प्रयास भारतीय भाषाओं और ध्वनि-आधारित तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि गूगल जेमिनी और चैटजीपीटी जैसी वैश्विक प्रणालियों की बराबरी करने में अभी समय लगेगा।
श्रोताओं के प्रश्न:-
संवाद सत्र के दौरान उपस्थित श्रोताओं ने भी अनेक प्रश्न पूछे।
अनीता वर्मा ( लेखिका व स्थानीय संपादक ) जी का एक प्रश्न था कि क्या मनुष्य के विचारों को सीधे एआई द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है। इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि मस्तिष्क की गतिविधियों को पूर्णतः समझना अभी भी चुनौतीपूर्ण है और इस दिशा में अनुसंधान जारी है।
स्वरांगी साने ( लेखिका ) एआई के अधिक उपयोग से मस्तिष्क पर प्रभाव तथा कार्बन फुटप्रिंट संबंधी प्रश्न पर उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग करने के लिए भी मानव मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। मौलिक चिंतन का स्थान अभी भी मनुष्य ही ले सकता है।
हरिराम पंसारी जी ने एआई के दुरुपयोग और साइबर सुरक्षा के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि सरकारें और तकनीकी संस्थाएँ ऐसे सुरक्षा उपाय विकसित कर रही हैं जिनसे दुरुपयोग को रोका जा सके। कुछ उन्नत प्रणालियों पर सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध भी लगाए गए हैं।
अश्विनी केगांवकर जी का प्रश्न भारत में एआई निवेश की संभावनाओं पर उन्होंने कहा कि एआई के विकास हेतु पर्याप्त वित्तीय संसाधनों, समय और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विश्व की प्रमुख एआई परियोजनाओं में भारतीय मूल के विशेषज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

संगोष्ठी के अंत में राजीव रावत ( आई आई टी खड़गपुर)ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी वक्ताओं, श्रोताओं, मार्गदर्शकों तथा आयोजक संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इसी के साथ यह ज्ञानवर्धक एवं विचारोत्तेजक संगोष्ठी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।

रिपोर्ट :— अजय शर्मा

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