हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी के सौजन्य से ‘मैं अभिव्यंजना’ पुस्तक लोकार्पण, परिचर्चा एवं सम्मान समारोह का आयोजन सम्पन्न।

रविवार, 12 जुलाई, 2026 को हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी द्वारा वरिष्ठ कवयित्री सुश्री सरोज शर्मा की पुस्तक ‘मैं अभिव्यंजना’ (काव्य संग्रह) लोकार्पण, परिचर्चा एवं सम्मान समारोह का आयोजन अकादमी के रोहिणी स्थित सभाकक्ष में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि के रूप में सुविख्यात कवयित्री डॉ. कीर्ति काले, कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीशंकर बाजपेई, सानिध्य श्री सुधाकर पाठक तथा विशिष्ट अतिथियों के रूप में सुश्री ममता किरण, डॉ. आरती लोकेश एवं डॉ. सविता चड्ढा की गरिमामयी उपस्थिति थी। दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथियों के सम्मान के बाद कार्यक्रम को विधिवत रूप से शुभारम्भ किया गया। अपने स्वागत उद्बोधन में हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी के अध्यक्ष सुधाकर पाठक ने कहा कि सुश्री सरोज शर्मा ज़मीन से जुड़ी हुई एक संवेदनशील कवयित्री हैं। उन्होंने लंबे समय तक दिल्ली नगर निगम में सरकारी अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और सेवानिवृत्ति के बाद वे पूर्ण रूप से साहित्यिक साधना में संलग्न हैं। साथ ही वे हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी की वरिष्ठ पदाधिकारी भी हैं। उन्होंने मंचासीन अतिथियों का परिचय देते हुए सुश्री सरोज शर्मा को उनकी नवीनतम कृति के लिए शुभकामनाएँ दीं। स्वागत उद्बोधन के बाद मंचासीन अतिथियों एवं हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी के पदाधिकारियों द्वारा ‘मैं अभिव्यंजना’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। अकादमी के पदाधिकारियों द्वारा सरोज जी का सम्मान भी किया गया। अपने उद्बोधन में सरोज शर्मा ने इस पुस्तक की रचना-प्रक्रिया, जीवन के अनुभव, साहित्यिक संगतियों पर अपने विचार रखे। वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री ममता किरण ने कहा कि भले ही यह सरोज जी की पहली पुस्तक है, किंतु वे लंबे समय से साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय रही हैं। आज जब डिजिटल युग में लोग रील बनाकर पोस्ट कर रहे हैं और कुछ लाइक्स, व्यूज पाकर वायरल हो रहे हैं, ऐसे समय में धीमी गति से अपने मनोभावों को लिखना और पुस्तक के रूप में लाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। सरोज जी की रचनाओं को पढ़ते हुए हम अपने अतीत से जुड़ते चले जाते हैं। उनकी रचनाओं में वह बहुत कुछ हम पाते हैं, जो हम भुला चुके हैं। उन्होंने उनकी कुछ रचनाओं का काव्य-पाठ भी किया। आबू धाबी से पधारीं शिक्षविद् एवं कवयित्री डॉ. आरती लोकेश ने सरोज जी को शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए आबू धाबी में हिन्दी भाषा की स्थिति पर अपना सारगर्भित विचार व्यक्त किया । वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सविता चड्ढा ने सरोज जी की पुस्तक पर अपना समीक्षात्मक मंतव्य रखा। इसी तरह कवि एवं ब्लॉगर श्री नीरज त्यागी ने सरोज जी की पुस्तक पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत की । कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सुविख्यात कवयित्री डॉ. कीर्ति काले ने कहा कि पुस्तक प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है। सृजन करने में हम सभी को आनंद आता है, किंतु अपने लिखे हुए को संकलित करके पुस्तक रूप में लाना एक लंबी प्रक्रिया होती है। इसलिए कई रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित नहीं होतीं। सरोज जी ने अपने अनुभवों को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया, जो कि सराहनीय है, किंतु यह जानकर हैरानी होती है कि यह उनकी पहली पुस्तक है। लिखने के लिए तो वे काफ़ी वर्षों से लिख रही हैं, किंतु जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम अपने रचनाकर्म को समय नहीं दे पाते । उन्होंने उनकी कुछ चुनिन्दा कविताओं का पाठ भी किया। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीशंकर बाजपेई जी ने कहा कि सरोज जी की पहली पुस्तक है और पहली पुस्तक का स्वागत किया जाना चाहिए, उसकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए, हाँ उस पर चर्चा की जा सकती है। उन्होंने कविता की जादू पर बात करते हुए कहा कि कविता सीधे-सपाट शब्दों में नहीं, बल्कि कविता इशारे-इशारे पर अपनी बात कहती है और यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि कौन कविता लिख रहा है, बल्कि कविता महत्त्वपूर्ण होती है। सरोज जी नियमित रूप से साहित्यिक गोष्ठियों में नहीं जातीं, नियमित रूप से साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं छपती, किंतु इससे उनकी पहली पुस्तक का महत्त्व कम नहीं हो जाता। उन्होंने आगे कहा कि बहुत कम ऐसी पुस्तकें होती हैं, जिनमें वास्तव में कविता होती हैं। कविता एक बारीक़-सी चीज़ है और बहुत कम लोग कविता की बारीकियों को पकड़ पाते हैं। डॉ. भावना शुक्ल के कुशल संचालन में आयोजित इस समारोह के उपरांत भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन भी संपन्न हुआ, जिसका संचालन कवि श्री विनोद पाराशर ने किया। समारोह में अकादमी की पदाधिकारी सुश्री सुरेखा शर्मा, सुषमा भंडारी, प्रकाश कंवर, विजय शर्मा, राजकुमार श्रेष्ठ, ध्रुव शिवहरे, द्वारिका पांडे, किशोर कुणाल के अतिरिक्त कई वरिष्ठ साहित्यकार और कवि उपस्थित थे।

रिपोर्ट :— राजकुमार श्रेष्ठ

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