दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदी भाषा शिक्षण : वर्तमान स्थिति, चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ विषय पर अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी संपन्न

दिनांक 12 जुलाई 2026 को विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा “दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदी भाषा शिक्षण : वर्तमान स्थिति, चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ” विषय पर एक महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. ओमप्रकाश के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने विश्वभर से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं हिंदी सेवियों का स्वागत करते हुए कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदी के प्रति बढ़ता आकर्षण भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रभाव का परिचायक है तथा ऐसे आयोजन हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार को नई दिशा प्रदान करते हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. तोमियो मिजोकामी (एमेरिटस प्रोफेसर, ओसाका विश्वविद्यालय, जापान) ने कहा कि हिंदी आज केवल भारत की भाषा नहीं, बल्कि विश्व समुदाय को जोड़ने वाली एक सशक्त वैश्विक भाषा बनती जा रही है। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदी शिक्षण की बढ़ती संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और इन देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा भाषाई संबंध हिंदी के विस्तार के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हिंदी शिक्षण को स्थानीय भाषाओं, संस्कृति और आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा निःशुल्क ऑनलाइन हिंदी शिक्षण, अंतरराष्ट्रीय संवाद तथा विभिन्न देशों के विद्वानों को एक मंच पर लाने के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे हिंदी के वैश्विक विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल बताया। अंत में उन्होंने सभी वक्ताओं के विचारों को उपयोगी बताते हुए विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे विमर्श हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को नई गति देंगे। मुख्य वक्तव्य में प्रो. ऋषिकेश मिश्र (विजिटिंग प्रोफेसर, स्कूल ऑफ मेडिस एंड कल्चर स्टडीज़, टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज़, टोक्यो, जापान) ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भाषा एवं संस्कृति के क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न किए हैं। उन्होंने बताया कि जापान और भारत के सांस्कृतिक संबंध अत्यंत प्राचीन हैं तथा जापान में हिंदी शिक्षण का इतिहास भी समृद्ध रहा है। उन्होंने संस्कृत, पालि, भारतीय संस्कृति तथा हिंदी के प्रभाव के साथ जापान में हिंदी अध्ययन की वर्तमान स्थिति एवं संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। सानिध्य वक्तव्य में अनिल जोशी (कवि, लेखक एवं संस्थापक, वैश्विक हिंदी परिवार) ने अपने वक्तव्य में कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने हिंदी शिक्षण को स्थानीय भाषाओं, संस्कृति, संगीत, सिनेमा और रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि वैश्विक हिंदी परिवार शीघ्र ही विभिन्न देशों के विद्यार्थियों के लिए उनकी मातृभाषाओं के माध्यम से विशेष हिंदी कार्यशालाएँ एवं ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ करेगा।

विनोद दुबे (लेखक, सिंगापुर) ने कहा कि सिंगापुर में हिंदी केवल शिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्य, संस्कृति और सामाजिक जीवन का भी अभिन्न अंग बन चुकी है। उन्होंने डीएवी हिंदी स्कूल तथा हिंदी सोसाइटी जैसी संस्थाओं के माध्यम से चल रहे हिंदी शिक्षण कार्य, प्रवासी भारतीयों के साहित्यिक योगदान, हिंदी पत्रिकाओं, सांस्कृतिक आयोजनों और रेडियो माध्यमों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी के विकास के लिए शिक्षा और संस्कृति का समन्वय आवश्यक है। डॉ. मिहिर पांडे (सहायक प्रोफेसर, भारतीय भाषा विभाग, हांकुक यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज़, सियोल, दक्षिण कोरिया) ने कहा कि भारत के प्रति आकर्षण, भारतीय संस्कृति, बॉलीवुड तथा व्यापारिक अवसरों के कारण कोरियाई विद्यार्थी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि कोरियाई विद्यार्थियों की व्याकरणिक समझ उत्कृष्ट होती है, किंतु बोलने में वे अपेक्षाकृत संकोच करते हैं। उन्होंने हिंदी एवं कोरियाई भाषा की वाक्य संरचना की समानताओं का उल्लेख करते हुए स्थानीय भाषा के माध्यम से हिंदी शिक्षण को अधिक प्रभावी बताया। डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी (एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी, ग्वांगडोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, चीन) ने बताया कि चीन में हिंदी शिक्षण का आरंभ वर्ष 1942 में हुआ था और आज लगभग 20 विश्वविद्यालयों में बी.ए., एम.ए. तथा पीएच.डी. स्तर पर हिंदी का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है। उन्होंने बताया कि भारतीय एवं चीनी शिक्षक संयुक्त रूप से विद्यार्थियों को भाषा, साहित्य, अनुवाद, पत्रकारिता, शोध तथा भारतीय संस्कृति का अध्ययन कराते हैं। उन्होंने हिंदी समाचार-पत्रों में अंग्रेज़ी शब्दों के अत्यधिक प्रयोग को चुनौती बताते हुए रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया। विमर्श सत्र में शिखा रस्तोगी (हिंदी विभागाध्यक्ष, ग्लोबल इंडियन इंटरनेशनल स्कूल, बैंकॉक, थाईलैंड) ने विभिन्न देशों में हिंदी शिक्षण की चुनौतियों, अनुभवों तथा वैश्विक स्तर पर हिंदी के विस्तार के लिए सहयोगात्मक प्रयासों की आवश्यकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने प्रतिभागियों के साथ सार्थक संवाद स्थापित करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी शिक्षण के लिए समन्वित प्रयासों पर बल दिया। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन करते हुए डॉ. वेद प्रकाश सिंह (ग्रेजुएट स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज, ओसाका विश्वविद्यालय, जापान) ने बताया कि वैश्विक हिंदी परिवार पिछले छह वर्षों से निरंतर हिंदी शिक्षण एवं भाषा संबंधी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। उन्होंने कहा कि संस्था ऑनलाइन माध्यम से विश्वभर के विद्यार्थियों को निःशुल्क हिंदी शिक्षा उपलब्ध करा रही है तथा निकट भविष्य में विभिन्न स्तरों के विद्यार्थियों के लिए विशेष भाषा कार्यशालाओं का आयोजन भी प्रारंभ किया जाएगा। अंत में डॉ. वीना शर्मा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा सहयोगी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में विभिन्न देशों से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं हिंदी प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि हिंदी के वैश्विक विस्तार के लिए भाषा शिक्षण को संस्कृति, साहित्य, तकनीक और रोजगार से जोड़ना समय की प्रमुख आवश्यकता है।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
