साहित्य संवाद : अलका सिन्हा की कहानी ‘झील से झांकता है चेहरा’ और रचना-संसार पर सार्थक विमर्श

शनिवार, दिनांक 18 जुलाई 2026 वातायान यूरोप, गृहस्वामिनी, क्रिएटिव कल्चर एवं वैश्विक हिन्दी परिवार के संयुक्त तत्वाधान, दिव्या माथुर के संयोजन व सूत्रधार आचार्य राजेश कुमार के जी के अनुशासित समय प्रबंधन, सरल प्रवाह संचालन में आयोजित संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत बहुआयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी, गणतंत्र दिवस परेड का 13 वर्षों तक आँखों देखा हाल का प्रसारण करने वाली कहानीकार, उपन्यासकार, कवियित्री अलका सिन्हा ने अपनी एक छोटी कहानी “झील से झांकता है चेहरा” का वाचन किया, तत्पश्चात कहानी एवं उनके साहित्य पर चर्चा की गयी। संवाद श्री राम शर्मा ने, समीक्षा डॉ. विजय कुमार मिश्र, विशाल पांडेय और ऋषि कुमार शर्मा (अध्यक्ष : वैश्विक हिन्दी परिवार दिल्ली) ने की। इस अवसर पर देश-विदेश से अनेकों साहित्यकारों ने सहभागिता की।

अलका सिन्हा के संबोधन एवं कहानी में चर्चा के मेरे विचार से निम्न महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं। महानगर का खालीपन दु:ख और सुख के दो किनारे हैं: कमाने के लिए घर त्यागना पड़ता है, पेट भरने शहर तो आ जाते हैं पर प्यास नहीं बुझती है। जब हम दूसरे का दर्द अनुभव करने लगते हैं तब भाषा का बंधन स्वत: समाप्त हो जाता है। महानगर का जीवन रास नहीं आता। महानगर में मकान नम्बर ही हमारा परिचय होता है। आसपास का हाल पता नहीं होता है। ग्रामीण परिवेश में सब एक दूसरे के सुख -दु:ख में सहभागी होते हैं। उनका मत है कि शहर दूल्हा बनकर गाँव जाये और गाँव को दुल्हनिया बनाकर लाये तो हम रोबोट बनने से बच सकते हैं। चमक-दमक में रहने वाला भी अपने लोगों से आकर्षित होता है। वे 80% दिल्ली में रहीं पर उनका परिचय गाँव ही होता है। विशाल पाण्डेय जी ने उनकी कहानी “झील से झांकता है चेहरा” पर विस्तृत चर्चा की, तत्पश्चात, उनकी कृतियों “जी मेल एक्सप्रेस’, आंखों की नमी से सुरक्षित पंखो की उड़ान, झारखंड की लड़की, एवं ‘दिवा स्वप्न’ पर भी चर्चा की गयी। कार्यक्रम का समापन क्रिएटिव कल्चर के श्री मुक्ति नाथ मिश्र जी ने प्रस्तुत किया।
रिपोर्ट :— निहाल चन्द्र शिवहरे
