चैट जीपीटी से कभी अच्छा अनुवाद नहीं हो सकता : योगेश सोमण

पुणे। शब्दों की वजह से कविता पसंद आती है न कि उसे दिए गए संगीत भर से। यह कहना था अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल के अध्यक्ष योगेश सोमण का। डॉ. सुनील देवधर द्वारा हिंदी अनुवादित मराठी गीत, ग़ज़ल और कविताओं की किताब ‘कविता के साए में शब्द’ का विमोचन मंगलवार 21 जुलाई को हुआ। तिलक रोड स्थित महाराष्ट्र साहित्य परिषद के सभागार में मुख्य अतिथि के रूप में सोमण ने मराठी के वीर सावरकर लिखित गीत जयोस्तुते के सटीक अनुवाद को रेखांकित किया। सोमण ने कहा कि चैट जीपीटी इस तरह का सुंदर अनुवाद कभी नहीं कर सकता जैसा डॉ. देवधर ने किया है। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. दामोदर खडसे ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि एक शीशी से दूसरी शीशी में उड़ेलते हुए इत्र उड़ भी सकता है, छलक भी सकता है। अनुवादक की जिम्मेदारी होती है कि वह इन दोनों से इत्र को बचाएँ। इस अवसर पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्याध्यक्ष एवं उक्त पुस्तक के रचयिता डॉ. देवधर ने कई उदाहरणों के साथ स्पष्ट किया कि कवि बड़ा होता है या शब्द। उन्होंने बृज बोली के दोहे और मराठी की ग़ज़ल के साथ बताया कि शब्दों से बड़ा होता है कवि। उन्होंने मराठी गीतकार जयंत भिडे के उस गीत को पेश किया जिसके हिंदी अनुवाद को गायिका साधना सरगम की आवाज़ में रिकॉर्ड किया जा चुका है। महामंडल के कोषाध्यक्ष प्रदीप निफाडकर विशेष अतिथि के बतौर उपस्थित थे और उनके एक गीत तथा एक ग़ज़ल को भी किताब में लिया गया है। इस अवसर पर निफाडकर ने मूल रचना के कुछ अंश प्रस्तुत किए व डॉ. देवधर ने उसके अनुवाद को श्रोताओं के सामने रखा। निफाडकर ने चैट जीपीटी को वह धूप कहा जिसमें इन दिनों कविता झुलस रही है। बतौर विशेष अतिथि उनका कहना था कि कविता इन दिनों धूप में खड़ी है।

यह धूप सभी भाषाओं को तो झुलसा ही रही है, सारी भाषाओं की कविताओं को और भी अधिक झुलसा रही है। कविता पर भाषा के समाप्त होने का कड़ी धूप पड़ रही है है, एआई की धूप है, सामाजिक माध्यमों की धूप है और राजनीतिक हस्तक्षेप की भी धूप है। तमाम तरह की धूप कविता पर है और उसके साए में शब्द है। पुस्तक के बारे में विचार व्यक्त करते हुए नागपुर की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. भारती सुदामे ने किताब के शीर्षक को इस तरह से समझाया कि सूर्य का प्रकाश किसी पर पड़ता है तो छाया बनती है। ऐसे किसी और भाषा की कविताओं की धूप का यह किताब साया है, जहाँ मूल कविता धूप है और अनुवाद उसके साए की तरह साथ-साथ चलता है। कवि अरुण पासवान ने कहा कि शब्द को ब्रह्म कहा गया है पर ब्रह्म को भी सरस्वती की आवश्यकता हुई है। सरस्वती के साए में ब्रह्म वैसे कविता के साए में शब्द है। डॉ. स्मिता दात्ये लिखित हिंदी समीक्षा का पाठ स्वरांगी साने ने किया। डॉ. दात्ये के अनुसार लगभग सौ वर्षों के दीर्घ कालखंड में लिखी गई विविध कवियों की रचनाओं में से प्रतिनिधि रचनाओं का चयन करना आसान काम नहीं था। डॉ. देवधर ने प्रमुख 25 कवियों को चुना। संचालन विनया केसकर ने किया। स्वागत अपूर्वा रोहन, डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव ने किया। तेज बारिश, खराब मौसम एवं छुट्टी का दिन न होने बावजूद नीलिमा गुंडी, सदानंद महाजन, कीर्तनकार चारुदत्त आफले, डॉ. गोरख थोरात, उद्योगपति नंदकिशोर राठी, अजय कोकनिया, सुमित पॉल, महेश बजाज, लोधी दंपति, नीला बोर्वणकर, डॉ. रमेश मिलन, इंदिरा शबनम, अनिता दुबे, जूही गुप्ते, महेंद्र पवार, डॉ. अनिता जठार सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।
