पुस्तक लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम संपन्न

दिनांक 12 अगस्त, 2026 को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद एवं वैश्विक हिंदी परिवार के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘परदेस में हिंदी और भारतीय संस्कृति’ विषयक पुस्तक लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिंदी, भारतीय संस्कृति, प्रवासी साहित्य तथा भाषा-संरक्षण से जुड़े अनेक विद्वानों, साहित्यकारों एवं शिक्षाविदों ने अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन श्री रणविजय राव, संयुक्त निदेशक, लोकसभा सचिवालय ने किया। अतिथियों का अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया। इसके पश्चात पुस्तक का विधिवत लोकार्पण किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विमलेश कांति वर्मा, पूर्व राजनयिक एवं भाषाविद् ने साहित्य, संस्कार और संस्कृति के परस्पर संबंध पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति के विभिन्न रूप होते हैं। चित्रकला जैसी कलाएँ मूर्त अभिव्यक्ति का रूप हैं, जबकि भाषा और साहित्य अमूर्त अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने ‘साहित्य’ में निहित ‘हित’ की भावना को स्पष्ट करते हुए कहा कि साहित्य का उद्देश्य व्यापक जनहित से जुड़ा होना चाहिए। उन्होंने नए रचनाकारों को आगे लाने तथा साहित्य के स्वरूप और उसकी सीमाओं पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि पुस्तक में आवश्यक सुधार अगले संस्करण में किए जा सकते हैं। उन्होंने शालिनी वर्मा की कविताओं की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज कविता अधिक पढ़ी जाती है, सुनाई कम जाती है।
प्रो. सत्यकेतु सांकृत, डीन, डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय ने पुस्तक में निहित संदेश को केंद्र में रखते हुए अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने प्रवासी समाज की विविधता और प्रवासी साहित्य की विशेषताओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रवासी साहित्य संपूर्ण अनुभव का साहित्य है। यह जन्मना साहित्य नहीं, बल्कि अनुभवों, संघर्षों और जीवन-स्थितियों से निर्मित साहित्य है। उन्होंने कहा कि प्रवासी रचनाओं का महत्व उनके अनुभव और रचनात्मक दृष्टि में निहित है।
प्रो. जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव, कुलसचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने पुस्तक का अवलोकन करते हुए उसमें प्रस्तुत विभिन्न पक्षों और प्रणालियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पुस्तक में सांस्कृतिक पक्ष को विशेष महत्त्व दिया गया है और यही इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है।
श्री नारायण कुमार, मानक निदेशक, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद ने हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के परस्पर संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति के संबंध को मजबूत बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा नए लोगों को इससे जोड़ने के प्रयासों की सराहना की और पुस्तक की विशेषताओं का उल्लेख किया।
श्री अनिल शर्मा जोशी, अध्यक्ष, वैश्विक हिंदी परिवार ने हिंदी और मातृभाषा के प्रति जुड़ाव की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने पुस्तक के लेखों तथा लेखकों की दृष्टि को रेखांकित करते हुए प्रवासी समाज की संवेदनाओं और संवाद को पुस्तक में अभिव्यक्त बताया। उन्होंने कहा कि यदि भारत नहीं जा सकते, तो भारत को अपने आसपास निर्मित किया जा सकता है। उन्होंने इसी भाव को व्यक्त करती पंक्ति के साथ अपना वक्तव्य समाप्त किया।
श्री ऋषि कुमार शर्मा, पूर्व उपसचिव, हिंदी अकादमी, दिल्ली ने अपने वक्तव्य की शुरुआत दुष्यंत कुमार के शेर से की। उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार के कार्यों का उल्लेख करते हुए डॉ. राजेश कुमार मांझी की पुस्तक की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि पुस्तक में भाषा, प्रवासी समाज और सांस्कृतिक मूल्यों का व्यापक वर्णन है। इसमें अनेक लेखकों के आलेख सम्मिलित हैं। उन्होंने गिरमिटिया समाज के संघर्षों तथा रामायण, हल्दी आदि के माध्यम से संस्कृति को संरक्षित रखने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आलेखों को युवाओं तक पहुँचाने और उन पर व्यापक विमर्श करने की आवश्यकता है।
डॉ. दीप्ति अग्रवाल ने हिंदी की पंक्तियों के माध्यम से अपने वक्तव्य की शुरुआत की। उन्होंने प्रवासी समाज से संबंधित पुस्तकों का उल्लेख करते हुए हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन-मूल्यों के उदाहरण देते हुए पुस्तक में संस्कृति के चित्रण को अद्भुत बताया।
डॉ. संतोष पटेल ने प्रवासी भारतीयों के जीवन-संघर्ष और भाषा की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भाषा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने पुस्तक में हिंदी के विभिन्न रूपों और विविध विद्वानों के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने हिंदी की बोलियों तथा गिरमिटिया हिंदी के संदर्भ को भी रेखांकित करते हुए पुस्तक को शोधपरक आलेखों का महत्वपूर्ण संकलन बताया। उन्होंने गिरमिटिया महिलाओं के संघर्षों का उल्लेख करते हुए अपने वक्तव्य का समापन किया।
डॉ. राजेश कुमार मांझी ने अपने गुरुजनों को नमन करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से इस पुस्तक की रचना संभव हुई। उन्होंने बताया कि पुस्तक में विभिन्न प्रवासी समाजों द्वारा अपने संघर्ष और सफलता की यात्रा का वर्णन किया गया है। पुस्तक की भूमिका अंजलि जी ने लिखी है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि आगामी संस्करण में लगभग 25 देशों से संबंधित सामग्री को शामिल किए जाने की योजना है।
शालिनी वर्मा, लेखिका, कतर ने वर्तमान समय में भाषाओं के सामने उपस्थित चुनौतियों और उनके समाधान पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा को गौरव के साथ बोलना चाहिए। बच्चों को हिंदी में शिक्षा उपलब्ध कराने तथा हिंदी को बाजार और सार्वजनिक जीवन में सम्मान दिलाने की आवश्यकता है। उन्होंने विज्ञापनों आदि में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग पर भी बल दिया।
श्री विवेक मणि त्रिपाठी ने भारतीय ज्ञान-परंपरा से संबंधित पुस्तक का स्वागत करते हुए इसे महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
सुश्री आराधना झा ने पुस्तक की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए अपने विचार व्यक्त किए और पुस्तक में निहित विभिन्न विषयों की सराहना की।
सुश्री ऋतु शर्मा ननंन पांडे ने अपनेपन की भावना को जागृत करने की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने पुस्तक के महत्व, ऐतिहासिक पीड़ा और सांस्कृतिक संदर्भों को स्पष्ट किया तथा पुस्तक के शीर्षक में प्रयुक्त ‘परदेस’ शब्द की सार्थकता पर विचार व्यक्त किया।
कार्यक्रम के दौरान शिवकुमार निगम, सुनील कुमार सिंह, वरुण कुमार, नूपुर जी, आसमा कौल सहित उपस्थित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने पुस्तक के लेखक एवं आयोजकों को शुभकामनाएँ दीं।
कार्यक्रम के अंत में श्री मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’ ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं, लेखकों और उपस्थित साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
रिपोर्ट : अजय शर्मा
