कृष्ण के व्यक्तित्व और ब्रज क्षेत्र पर वैश्विक हिंदी परिवार की ऑनलाइन संगोष्ठी

नई दिल्ली, 30 अगस्त 2026। केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा ‘कृष्ण का व्यक्तित्व और ब्रज क्षेत्र’ विषय पर एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी में विद्वानों ने श्रीकृष्ण के बहुआयामी व्यक्तित्व, ब्रज संस्कृति, लोकजीवन, प्रकृति और कर्मयोग के पारस्परिक संबंधों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन लेखिका स्वरांगी साने ने किया, जबकि संचालन संपादक मनोज अनाम ने किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सुनील देवधर, कार्याध्यक्ष, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे ने की। अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने श्रीकृष्ण को ऐश्वर्य, बल, यश, सौंदर्य, ज्ञान और वैराग्य का समन्वित प्रतीक बताया। उन्होंने ब्रज को केवल भौगोलिक क्षेत्र न मानकर गतिशीलता, समरसता और कृष्ण-प्रेम का केंद्र बताया, जहाँ विभिन्न वर्गों और संप्रदायों के साधक कृष्ण-भक्ति में एकाकार हो जाते हैं।
मुख्य अतिथि डॉ. मृदुल कीर्ति, वरिष्ठ प्रवासी लेखिका, अमेरिका ने श्रीमद्भगवद्गीता के ब्रजभाषा काव्य-अनुवाद से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कृष्ण के व्यक्तित्व में निहित लोकमंगल, कर्म और मानवीय संवेदना के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की।
मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध ब्रज संत-कवि कृष्ण गोस्वामी ने ब्रज और श्रीकृष्ण के तादात्म्य को स्पष्ट करते हुए गोवर्धन लीला के मर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण ने इंद्र-पूजा के स्थान पर गोवर्धन, प्रकृति और गोधन की महत्ता स्थापित की। इस प्रसंग में लोककल्याण और प्रत्यक्ष कर्म को प्राथमिकता देने का संदेश निहित है। उन्होंने कहा कि कृष्ण का जीवन लोकमंगल की भावना और कर्मप्रधान दृष्टि का सशक्त उदाहरण है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. बीना शर्मा, पूर्व निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान ने ब्रज संस्कृति, स्थानीय रीति-रिवाजों और लोकगीतों में कृष्ण की सार्वभौमिक उपस्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ब्रज का प्रत्येक कण और वहाँ का जनमानस कृष्णमय है।
डॉ. हरिशंकर पाल, अध्यक्ष, नागरी लिपि परिषद ने गोवर्धन लीला के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि कृष्ण द्वारा नंद जी को कर्म की वास्तविकता समझाना गीता के कर्मयोग की आधारभूमि के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि निष्काम कर्मयोग का दार्शनिक संदेश ब्रजभाषा की मधुरता में ढलकर जनसाधारण के लिए अत्यंत सहज और सुगम बन जाता है। उन्होंने ब्रज और कृष्ण को एक-दूसरे का पर्याय बताते हुए कृष्ण के लोककल्याणकारी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।
सान्निध्य वक्तव्य में सुप्रसिद्ध प्रवासी लेखिका डॉ. शैलजा सक्सेना, कनाडा ने ब्रज और श्रीकृष्ण के अटूट संबंध पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि गायों, प्रकृति और ग्रामीण परिवेश के बीच विकसित कृष्ण का व्यक्तित्व उन्हें अत्यंत उदार, सहज और मानवीय स्वरूप प्रदान करता है।
विमर्श सत्र में डॉ. भगवान मकरंद, सुप्रसिद्ध कवि एवं ज्योतिषाचार्य ने पुष्टिमार्गीय अष्टछाप कवियों—सूरदास, नंददास आदि—के पदों के संदर्भ में ठाकुर जी की अष्टयाम लीलाओं का विश्लेषण किया। उन्होंने रेखांकित किया कि कृष्ण-भक्ति केवल बौद्धिक तर्क का विषय नहीं, बल्कि भाव, प्रेम और शरणागति का मार्ग है।
कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हर्ष वर्धन राय ने किया। देश-विदेश से जुड़े विद्वानों, साहित्यकारों और हिंदीप्रेमियों की सक्रिय सहभागिता ने संगोष्ठी को सार्थक और विचारोत्तेजक बनाया।
