अव्यक्त को व्यक्त करने की क्षमता है, अनिल प्रभा में : डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

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समीक्षित पुस्तक: “शिवना कथा सप्तक : अनिल प्रभा कुमार’
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन
विधा : कहानी
कथाकार : अनिल प्रभा कुमार
प्रकाशन वर्ष : 2024
मूल्य : 139/-रुपए (अमेज़न पर उपलब्ध)
समीक्षक : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

डॉ. अनिल प्रभा कुमार प्रवासी कथाकारों में एक महत्त्वपूर्ण नाम है। कथा-साहित्य में उनके हस्तक्षेप ने हिंदी साहित्य को एक अलग प्रकार के शिल्प और कथ्य को जन्म दिया है। वह एक उर्वर कथाकार हैं जो अपनी कहानियों में समाज, परिवार और आदमी को परस्पर कड़ीबद्ध करते हुए एक ऐसे संसार की कल्पना करती हैं जहाँ मानवीय संबंधों में समरसता की बाढ़ उमड़ती हो।
उनके सद्य:प्रकाशित कहानी संग्रह ‘कथा सप्तक’ में कुल सात कहानियां हैं और सभी कहानियां भाव पक्ष और कला पक्ष की दृष्टियों से परिपक्व हैं। अगर उनकी कहानियों में कथानक पर नज़र डाली जाए तो बेशक वे भिन्न-भिन्न मुद्दों और विषयों पर आधारित हैं। उनकी कहानियां हमारे समय के जागृत साक्ष्य हैं जो हमारा सामना जीवन के यथार्थ से करवाते हैं। उनमें सूक्ष्म मानवीय स्पर्श है। संवेदनाओं की असीम गहराई है। मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने की अकुलाहट है। जमीन से जुड़ी हुई ज़िंदग़ियों का आह्वान है, आलाप है. मनुष्य की पीड़ा और वेदना का थर्मामीटर हैं; या, यूं कहा जाना चाहिए कि उस पीड़ा का मापक यंत्र हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘सफेद चादर’ ज़िंदग़ी की कीमत का आकलन करने वाली विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में कार दुर्घटना में एक हिरण की मौत हो जाती है। हिरण के संबंध में पति जो कार चालक है और उसकी पत्नी के उदासीन विचार हैं। यदि किसी मनुष्य की मौत, कार-दुर्घटना में होती तो इसकी सूचना पुलिस को दी जाती; लेकिन, यह तो जानवर ठहरा। अधिकतर, वे अपने ही हितों की बातों में लिप्त रहते हैं। वे कंधे के दर्द से राहत पाने के लिए डॉक्टर ली से ‘टुइना थैरेपी’ करवाने आगे निकल पड़ते हैं। कहानीकार छोटे-छोटे कथा-तंतुओं को जोड़ते हुए आगे बढ़ती हैं. पति को हिरण से टक्कर के कारण कार को हुए नुकसान की चिंता है. दूसरी ओर, पत्नी को मरे हुए हिरण की चिंता बार-बार सताती है। आदमी को अधिक चिंता इस बात की है कि क्षतिग्रस्त कार की मरम्मत में कितने पैसे खुद खर्च करने होंगे और कितने पैसे इनश्योरेंस से मिलेंगे! तब, पत्नी को अपने छोटे भाई मुकेश की कुछ समय पहले दिल्ली में बस की चपेट में हुई मौत की स्मृति कुरेदने लगती है। हिरण की मौत का मुकेश की मौत से सादृश्य दिया जाना कथाकार द्वारा प्रयुक्त एक रूपक की भांति है। पर, मुकेश की मौत पर उसके पति की वैसी ही उदासीनता है जैसी कि हिरण की मौत पर थी। पति को तो इस बात की चिंता है कि इंश्योरेंस द्वारा पूरी रक़म मिल जाए ताकि वह इस तरह की बचत से कहीं छुट्टियां मनाने जा सके। रात में पत्नी सपने में अपने भाई के शव को कुछ लोगों द्वारा सफेद चादर ओढ़ाते देखकर व्याकुल हो जाती है। जब वह जागती है तो अपने पति से कहती है कि उन्हें भी हिरण के शव पर सफेद चादर ओढ़ा देनी चाहिए थी।
इस प्रकार, यह कहानी मानवीय संवेदना के जुड़ने और उखड़ने की कहानी है। कहानी संवेदनाओं की तलाश करती है। ये संवेदनाएं किसी जानवर की मृत्यु और किसी मनुष्य की मृत्यु पर अलग-अलग होती हैं। अनिल प्रभा जी बड़ी सूक्ष्मता से इन संवेदनाओं के पर्त को खोलती हैं।
संग्रह की अगली कहानी का शीर्षक है–‘महानगर में ही कहीं’। यह मर्माहत करने वाले एक रिपोर्ताज़ की तरह है।ग़रीब परिवार का एक भारतीय लड़का हरजीत ग्रोवर कैलीफोर्निया में ग़ुमनाम ज़िंदग़ी गुज़र-बसर करता है। वह स्याह, सन्नाटा और कोलाहल से भरे महानगर की पृष्ठभूमि में एक ठिंगने से कमरे में अपनी सारी उम्र गुज़ार देता है। वह ग़ुम इच्छाओं के कब्रिस्तान में इसी कमरे में डेरा डाले बैठा रहता है। यह कहानी एक ऐसे हताश व्यक्ति की है जो स्वयं के लिए भी अपरिचित है। वह अत्यल्प सुविधाओं के साथ सीमित दिनचर्या में अपने निष्क्रिय जीवन का अवसान कर देता है। उसका जीवन चकरघिन्नी करते समय की चाक पर बिल्कुल ठहरा हुआ है। उसे घंटे, दिन, महीने और सालों के बीतने का इंतज़ार नहीं है। शायद इंतज़ार है इंतज़ार के ख़त्म हो जाने का। उसकी युवावस्था में, माँ सिलाई मशीन पर सिलाई का काम करके जो पैसे मिलते थे, उसे वह उसके पिता को सौंप देती थी। पिता उसे अपनी तरह मेकैनिक बनाना चाहता था लेकिन वह मस्त आज़ाद रहना चाहता था।
अमेरिकी प्रवास में उसने लीसा नाम की एक लडकी से प्रेम भी किया था जिस प्रेम में शुष्कता थी, नीरसता था, जिससे तंग आकर लीसा उसे छोडकर कहीं चली गई। उस एकातिंत जीवन में उसने अंतिम सांस ली और उसकी लाश कई दिनों तक कमरे में ही तब तक सड़ती रही, जब तक कि उसकी बदबू ने पडोसियों की नाक में दम नहीं कर दिया।
तदनंतर, समर नाम के एक फ्री लांसिंग पत्रकार का प्रवेश होता है। वह भी अमरीका में अपना भविष्य तलाशता है जो अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की पढ़ाई करने के साथ-साथ फ्री लांसिंग करता है। समर, हरजिंदर ग्रोवर से हैरी ग्रोवर बने व्यक्ति की मौत के बाद उसकी अस्मिता की तलाश करता है। समर को आश्चर्य होता है कि हैरी की मौत के बाद उसकी डेड बॉडी का क्लेम करने के लिए उसका न तो कोई रिश्तेदार है, न ही कोई मित्र। उसकी बॉडी सार्वजनिक शवघर में पड़ी रहती है। यह भी एक बहुत बड़ी विडंबना है कि उसकी ज़ायदाद का वारिस तो मिल जाता है, लेकिन उसके मृत शरीर का कोई वारिस नहीं मिलता है जो उसका अंतिम संस्कार कर सके। बड़ी छानबीन के बाद उसकी वसीयत मिलती है जिसमें उसकी हार्दिक इच्छा का उल्लेख होता है कि उसके शव को विद्युत शव-दाहघर में जलाया जाए। यह कहानी महानगरीय जीवन में व्याप्त विभत्स हृदयविहीनता को रेखांकित करती है। इस कहानी को पढ़ कर हमारे मस्तिष्क में दिल्ली में घटित एक घटना की याद ताज़ा हो जाती है जिसमें आशा साहनी नामक वृद्धा की लाश उसके घर में नौ माह तक सड़ती रहती है और उसकी ख़बर लेने वाला कोई नहीं होता है।
डॉ. अनिल प्रभा आज के आधुनिकतावादी परिवार में आए आंधी-तूफान, झंझावात का मार्मिक चित्रण अपनी कहानियों में करती हैं। एक ऐसी ही कहानी है ‘फिर से’ जिसमें पति-पत्नी के बीच अलगाव का दंश भोग रहे बच्चों की व्यथा को बड़ी मार्मिकता से वर्णित किया गया है। राष्ट्र की सीमा की रक्षा कर रहे पिता केशी को पत्नी तिया से कई-कई महीनों तक दूर रहना पड़ता है। यह बात तिया को बिल्कुल बरदाश्त नहीं होती है और वह केशी को त्याग कर चली जाती है। उसके बाद बच्चे पिता की देख-रेख में बडे होते हैं। पुत्री संजना की शादी मां की अनुपस्थिति में होती है क्योंकि उसके पिता केशी को यह स्वीकार्य नहीं है कि तिया उस विवाह-कार्यक्रम में मौज़ूद हो। पर, शादी के बाद संजना और उसका पति सोहम फोन के माध्यम से तिया से संपर्क में आते हैं।
पति से पत्नी के अलगाव और बच्चों से माँ के विछोह की यह दर्दनाक कहानी है। फिर, बच्चों की ज़िद पर माँ तिया वापस पति केशी के घर आती है। केशी, तिया, दामाद और बच्चों के फिर से एक-साथ होने पर जो औपचारिक क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं, भावनाओं और विचारों का विनिमय, बीते दिनों की स्मृतियों का आवर्तन होता है, ये सभी पाठकों को भावनाओं की तेज लहरों में बहाकर ले जाने के लिए काफी है। इस कहानी में कथाकार घटनाओं का विस्तार संवादों के माध्यम से करती है। सहज और सुग्राय भाषा-शैली में लिखी गई यह कहानी पाठकों को बांध लेती है। ऐसा लगता है कि जो कुछ इस कहानी में घटित होता है, वह किसी का अनुभवजन्य है। कहानी अत्यंत गतिशील है जिसमें घटनाक्रम स्वाभाविक रूप से हमें खींचता हुआ-सा लगता है।
अनिल प्रभा जी का ओब्ज़रवेशन पॉवर काबिले-तारीफ है। जब वह अफसाने बुनती हैं तो उनमें प्रकृति और आसपास का वातावरण आत्मसात होता जाता है। उनकी वर्णन-क्षमता अत्यंत प्रखर है। कहानियों की पूर्व-पीठिका का स्वाभाविक सृजन करते हुए वह कथा-वस्तु में आहिस्ता-आहिस्ता प्रवेश करती हैं। कथानक का पल्लू तो वह हमेशा मज़बूती से थामे रहती हैं। कथा-तंतुओं का विकास बड़े सधे हुए हाथों से करती हैं। शब्दों के चयन में वह कभी कोताही नहीं बरतती। बस, आम पाठक की समझ में जो आ जाए, उसी भाषा-शैली का प्रयोग करती हैं। ऐसे में, गंभीर कथानक भी स्वादिष्ट और सुपाच्य-सा लगने लगता है।
‘बेमौसम की बर्फ़’ ऐसी ही कहानी है। यह कहानी पति-पत्नी, हेमंत और चारु के रिश्तों को उकेरती है। पुत्री महक बीमार है और पिता उसकी सेवा-सुश्रूषा में समर्पित है। जाड़े का बर्फीला मौसम तबाहकुन है जो बीमार महक के लिए सही नहीं है। मौसम के और बिगड़ने पर अस्पताल का सहारा लेना होगा क्योंकि महक का बुखार बढ़ने लगता है। बीमार बेटी के लिए बर्फीले तूफान जैसे आपातकाल में घर में ही सारे बंदोबस्त किए जाते है। बिजली ग़ुल होने पर मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। फिर, मौसम के और ख़राब होने पर वे अपने परिचित रमेश और लीना के यहाँ कार से बर्फीली सड़क को चीरते हुए निकलते हैं जहाँ पॉवर ग़ुल नहीं है। वहाँ पहुंचकर कुछ घंटों के बाद, उन्हें पता चलता है कि उनके घर में बिजली आ गई है। सो, वे आधी रात को फिर वापस घर को निकल पड़ते हैं। घर पहुंचकर बाहर उन्हें मैग्नोलिया का हरा-भरा पेड बर्फीले तूफान से गिरा हुआ मिलता है। मैग्नोलिया के वृक्ष का ज़िक्र कई बार किया जाता है। मौसम की मार झेलते हुए उसमें आए परिवर्तनों को कथाकार प्रतीकात्मक रूप में वर्णित करती है। इस तरह यह कहानी बिगडैल मौसम के बदौलत दुष्कर इंसानी कवायद के लिए मज़बूर करती है। कथाकार सारे विवरण बड़ी सटीकता और सिद्धहस्तता से देती है और जिज्ञासा को आद्योपांत बनाए रखती हैं।
अनिल प्रभा जी की कहानी का आरंभ ढलती शाम, पेड़ों की झुरमुट, सांवले बादल, रंग बदलते आकाश, मौसम के नानाविध मूड जैसे प्राकृतिक ब्योरों से भरा होता है। कहानी के उतार-चढ़ाव में भी वह कथानक को परिवेश और वातारण के साथ पिरोकर प्रस्तुत करने में अपनी कुशलता का परिचय देती हैं। इस तरह उष्ण कथानक को भी सरस और सजीव बनाती हैं। इन सबके साथ मानवीय हाव-भाव के साथ मनोवैज्ञानिक सामंजस्य स्थापित करने की उनकी कला भी श्लाघ्य है।
संग्रह की अगली कहानी ‘किसलिए’ इस लिहाज़ से उल्लेखनीय है कि कथाकार अपना ध्यान एक कुत्ते, जिसका नाम पेपे है, पर टिकाती है। चिड़िया और गिलहरी का पीछा करने, बांहों के घेरे में आकर हाथ-पैर-मुंह चूमने-चाटने, पूंछ हिलाने और जीभ लपलपाने जैसी कुत्ते की मनचली आदतों का सजीव चित्रण है। कहानी में पारिवारिक बातों, समस्याओं, गतिविधियों आदि का जीवंत ब्योरा मिलता है जिनसे पाठक पूरी जिज्ञासा से स्वयं को जोड़ सकता है। फिर, रिटायर्ड डैडी की देखरेख में कुत्ते को ईशा द्वारा घर पर छोड़ जाना डैडी के लिए एक ज़हमत जैसा है। कुत्ते की बीमारी में उसके चिकित्सीय निदान के लिए उपाय किया जाता है। एक तरह से यह कहानी कुत्ते के मनोविज्ञान की कहानी है जिसे पढ़कर पाठक विस्मय-सागर में डूबते-उतराते नज़र आएंगे। नि:संदेह, कुत्ते के उच्छृन्खल व्यवहार के साथ मानवीय आचरण का तालमेल बैठाना, कथाकार का आपबीती अनुभव जैसा लगता है।
डॉ. अनिल प्रभा की कहानियों के शीर्षक भी बड़े मज़ेदार से लगते हैं—किसलिए, बेमौसम की बर्फ, फिर से, महानगर में ही कहीं आदि। ये शीर्षक किसी रूपक जैसे लगते हैं जिनका प्रत्यक्ष सादृश्य कथानक में व्यवहृत किसी विशेष घटना से हो सकता है। बहुत कम कहानियां किसी पात्र या चरित्र पर केंद्रित होती हैं, बल्कि वे कुछ ऐसी घटनाओं के घटित होने की ओर संकेत करती हैं जिससे कि पाठक का ध्यान बरबस आकर्षित हो जाए कि आख़िर, कहानी में ऐसा क्या आश्चर्यजनक है जिसे कथाकार बताना चाहती है। उसके बाद पाठक कहानी की कथा-वस्तु को तलाशने और खंगालने में पूरी तरह खो जाता है।
अब देखिए, अगली कहानी का शीर्षक है—बहता पानी। इस कहानी में एक प्रवासिनी काफी समय के बाद भारत लौटती है और एयरपोर्ट पर जैसे ही कदम रखती है उसका मन भाव-विह्वल हो उठता है। अपनी मूल जन्मभूमि में होने का अहसास उसे भावुक कर देता है। उसका यादों में खोकर ख़्फ्तुलहवास होना किसे द्रवित नहीं कर देगा? अनिल प्रभा उसकी मन:स्थिति का वर्णन कुछ इस प्रकार करती हैं—‘इस बार कुछ बदला हुआ ज़रूर होगा। मायका होगा, मां नहीं होगी. पीहर होगा, पिता नहीं होंगे। भाई के घर जा रही है. भाभी होगी, भतीजी ससुराल में होगी।’
एक प्रवासिनी के अपनी मातृभूमि के अपने गृह में प्रवेश करने पर जितना जीवंत चित्रण अनिल प्रभा करती हैं, वैसा चित्रण एक कथाकार की प्रस्तुतिकरण की क्षमता की पराकाष्ठा है। यह प्रवासिनी स्वर्गवासी हो चुके स्वजनों के स्मृति-सागर में गहराई से डूबने-उतराने लगती है। लेकिन बाबुल का घर अब भाई का हो चुका है-यह अहसास उसके हृदय को विदीर्ण कर जाता है। आख़िर में, भारत में अपने अधिवास-काल के ख़त्म होने पर, जब वह वापस विदेश जाने को होती है तो उसका मन फिर से कचोटने लगता है। वह कार में बैठी-बैठी अपने भाई के स्वामित्व में अपने पिता के घर को आख़िरी बार तीव्र इच्छा से निहारती है। तब, उसे एक चेतावनी का स्वर सुनाई देता है—“मत देख पीछे मुड़कर, पत्थर हो जाएगी।”
नि:संदेह, कहानी का कथानक एक कहानी में घटित घटनाक्रम की दृष्टि से छोटी तो है लेकिन इसका पाठक के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। एक प्रवासी की अपने मूल देश में न होने की विषादावस्था का अंदाज़ा इस कहानी को पढ़कर लगाया जा सकता है। कहानी को आद्योपांत पढ़ने के बाद मन में यह सवाल हूक सा उठता है कि हम विदेश-ग़मन क्यों करते हैं?
संग्रह की अन्तिम कहानी ‘वायवी’ मुख्य रूप से दो स्त्रियों यानी, माँ वीरो और उसकी बेटी प्रीत की दैनंदिन की कहानी है। उनकी ज़िंदग़ी को समय की परिधि में संकुचित नहीं किया जा सकता है; बल्कि, उनके द्वारा जीवन जीने का पैमाना उनकी सांसें हैं। माँ वीरो घर में होकर भी नहीं है और उसकी बेटी अपनी मां के साथ सर्वत्र है। माँ, प्रीत के पिता निन्धे के इंतज़ार में है जो कोई बीस वर्षों से घर वापस नहीं आया है। शायद, वह किसी अज्ञात ज़ुर्म में जेल की सज़ा काट रहा है। माँ वीरो दुल्हन के कपड़ों पर कढ़ाई और पच्चीकारी का काम करके घर का गुज़ारा करती है। उन्हें ढांढस बंधाने के लिए प्रीत के ताया जी हैं। इसके अतिरिक्त, कहानी की पृष्ठभूमि में मायूसी का साम्राज्य है जो कहानी के हर पात्र पर हावी है।
अनिल प्रभा जी के पात्र प्राय: अंतर्मुखी होते हैं जो स्वयं से बतियाते हुए बातों का तूफान खड़ा करते हैं। खुद से उलझते हैं, खुद से झगड़ते हैं, खुद से बतियाते हैं आत्मालाप करते हैं और ऐसा करते हुए ख़ुद से ही बहल भी जाते हैं। वे गृहस्थ जीवन के विभिन्न मसलों से जूझते हैं, रिश्तों को भावनात्मक स्तर पर तौलते हैं, स्मृतियों की भूल-भुलैया में भटकते हैं, जो कुछ अपने समाज, समय और प्रारब्ध से मिलता है-उससे वे संतुष्ट नहीं होते हैं। एक शांत कुंठा के साथ वे दुनिया से अलविदा भी कर जाते हैं। वे अभाव, संत्रास, प्यास, क्षुधा और एकाकीपन से संघर्ष करते हुए अपनी अस्मिता को मिटा देना ही अपनी नियति समझते हैं। एक बात स्पष्ट हो जाता है या यूं कहा जा सकता है कि इन कहानियों को पढ़ते हुए एक सच उद्घाटित होता है कि विदेश प्रवास करना अंततोगत्वा सुख और संतोष का स्रोत नहीं बन सकता। इसके अलावा, अनिल प्रभा कई बार वस्तुस्थितियों और पात्रों का ब्योरा देते हुए दार्शनिकों की भांति भी बतियाने लगती हैं। उनके चिंतन में समूचे मानव-समाज की पीड़ा के शमन करने की बेचैनी साफ नज़र आती है।
अनिल प्रभा में अव्यक्त को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है। इम्प्लिसिट को एक्सिप्लिट करने का माद्दा है। उनकी भाषा में मुहावरा गढ़ने का लालित्य है। भाषा में संक्षिप्तता तो होती है लेकिन उसकी अभिव्यंजकता भी प्रशंसनीय है। उनके पात्र बातूनी तो हैं, लेकिन उनके संवाद में संक्षिप्तता है। जब वे बतियाते हैं, किसी से या स्वयं से, तो उनके भीतर और उनके बाहर का वातावरण एक्सपोज़ हो जाता है। कथाकार, कहानी लिखते समय शब्दावलियों के चयन पर काफी परिश्रम करती हैं। वर्तमान कहानी-शिल्प के अनुसार वह कथानक के विस्तार के लिए पात्रों के संवाद पर अधिक निर्भर करती हैं और संवाद के जरिए ही घटनाक्रम को आगे बढ़ाती हैं।

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