दिन विशेष व्यंग्य : अम्मी की दुआओं में – डॉ. रमेश यादव
बरेली रेलवे स्टेशन के बाहर वह बड़े दार्शनिक अंदाज़ में बैठा था, जैसे भारतीय रेलवे की देरी और अपनी बेरोज़गारी- दोनों का कारण खोजने निकला हो।
दो साल से नौकरी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसके जूते घिस गए थे और रिश्तेदारों की सलाहें चमकने लगी थीं। और एक दिन अचानक उसे नौकरी मिल गई।
एक छोटे से दफ्तर में असिस्टंट मैनेजर की… पद में जान थी मगर तनख़्वाह बेजान थी। डूबते को तिनके सहारा… मानते हुए उसने नौकरी स्वीकार कर ली।
तनख़्वाह मामूली होने के बावजूद घर में ऐसा माहौल था, मानो उसने नासा का चाँद मिशन संभाल लिया हो।
अम्मी ने पहली तनख़्वाह पर मिठाई बाँटी। बीवी ने ऑनलाइन बच्चों के कपड़े, जूते कार्ट में डाल दिए। बच्चों ने उसे ऐसे देखना शुरू कर दिया जैसे अब्बू नहीं, चलता-फिरता एटीएम लौट आया हो।
लेकिन तीसरे महीने में ही कंपनी बंद हो गई। मालिक रातों-रात ऐसे गायब हुआ जैसे चुनाव जीतने के बाद नेता जनता के बीच से गायब हो जाते हैं।
अब हालत ये थी कि जेब में सिक्के थे और उधार इतना कि राशन वाला उसे देखते ही मुस्कुराने के बजाय कैलकुलेटर निकाल लेता था।
बिजली का बिल मेज़ पर ऐसे पड़ा था जैसे अदालत का समन हो।
घर पहुँचा तो अम्मी ने पानी देते हुए वही सदाबहार संवाद बोला- “बेटा… ऊपर वाले की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता… निराश मत हो, इसमें भी अल्लाह की कोई भलाई होगी।”
उसने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
उसके जेहन से आवाज़ आई-
“हाँ, बिल्कुल… ऊपर वाले की मर्ज़ी से ही नीचे वालों ने ईएमआई बनाई होगी! कर्जा वसूली वाला यमदूत बनाया होगा…!”
काम की तलाश में वह फिर दर-दर भटकता रहा।
हर जगह वही सवाल-
“अनुभव कितना है?”
उसे समझ में नहीं आ रहा था कि बेरोज़गार आदमी अनुभव कहाँ से लाए? क्या घर बैठकर ‘बेरोज़गारी प्रबंधन’ में पीएच-डी करे?
थककर वह रेलवे स्टेशन के बाहर बैठ गया।
तभी सामने शोर मचा।
एक बूढ़ा आदमी सीढ़ियों पर गिर पड़ा था।
भीड़ तुरंत सक्रिय हो गई।
पानी लाने के बजाय कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगे- ताकि रील पहले अपलोड हो सके। इंसानियत की जिम्मेदारी ऊपरवाले ने जिन्हें दी है, वो लोग जानें…।
वह भी एक पल के लिए ठिठका। कुछ भला बुरा हो गया तो पुलिस चौकी के चक्कर काटो..।
फिर न जाने क्या सोचकर वह बूढ़े की तरफ दौड़ पड़ा।
पानी पिलाया, पास के अस्पताल में ले गया। एक-दो लोग जो उसके साथ थे वे रील बनाने में मगन थे।
डॉक्टर ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा-
“थोड़ी देर और हो जाती तो जान जा सकती थी।”
यह सुनकर साथ आए हुए लोगों ने राहत की साँस ली कि चलो, अब वीडियो का इमोशनल एंड मिल गया….अस्पताल की प्राथमिक प्रक्रिया की बारी आते ही साथ आए लोग वीडियो एडिटिंग के बहाने चलते बने। बूढ़े को होश आया तो उसने बेटे का नंबर दिया।
कुछ देर बाद बूढ़े का बेटा आया।
महँगे कपड़े, गाड़ी और चेहरे पर वही आत्मविश्वास जो सिर्फ टैक्स बचाने वालों में पाया जाता है। उसने हाथ पकड़कर कहा- “आपने मेरे अब्बू की जान बचाई है… मैं आपका एहसान नहीं भूलूँगा।”
बातों-बातों में दोनों ने एक दूसरे को जाना। पता चला कि बेटा एक कंपनी का मालिक है।
उसने तुरंत उसे नौकरी का प्रस्ताव दे दिया-“मेहरबानी नहीं कर रहा… सच में मेरी कंपनी एक जगह खाली है। मुझे ईमानदार आदमी चाहिए था।”
वह भीतर ही भीतर भावुक हो उठा।
पहले से बेहतर नौकरी… ज्यादा तनख़्वाह… इज़्ज़त भी।
उसे अचानक अम्मी की बात याद आई।
धीरे से आसमान की तरफ देखकर बोला-
“समझ गया, मालिक…
पहली नौकरी इसलिए गई थी ताकि मैं किसी बूढ़े को बचाकर दूसरी नौकरी पा सकूँ।
आज तो रिज़्यूम और अनुभव की जगह ‘मानवता’ काम आ गई!
घर लौटकर उसने अम्मी के हाथ चूम लिए-
“अम्मी… आपकी दुआओं में सचमुच असर है।”
अम्मी मुस्कुराईं-
“मैंने कहा था ना बेटा… ऊपर वाला देर करता है, अंधेर नहीं।”
वह मन ही मन सोचने लगा-
“और नीचे वाले… ?” और उसकी नजर अखबार की उस खबर पर गई जिसमें छपा था-
‘नाशिक शहर में एक बड़ी कंपनी में नौकरी के बदले जबरन धर्म परिवर्तन करवाया गया!”
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