लंदन में ‘अस्मि’ का लोकार्पण — एक अविस्मरणीय शाम

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18 अक्टूबर मेरे जीवन की उन तारीखों में शामिल हो गया है, जिसे मैं हमेशा सहेजकर रखूँगी। लंदन के ऑक्सब्रिज में स्थित द एंट्रियम में, यूके हिंदी समिति के तत्वावधान में मेरे पहले उपन्यास ‘अस्मि’ का लोकार्पण हुआ। वर्षों से मन में पल रहे शब्दों और भावनाओं को पुस्तक के रूप में लोकप्रिय होते देखना मेरे लिए बेहद भावुक और अविस्मरणीय अनुभव था।

इस विशेष अवसर पर, विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. अनुराधा पाण्डेय, दिव्या माथुर, डॉ. पदेश गुप्त, ललित मोहन जोशी एवं भारत से पधारे विवेक रंजन श्रीवास्तव, खुदेजा खान जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा बढ़ाई। उनके बीच अपनी पुस्तक को प्रस्तुत होते देखना मेरे लिए सम्मान के साथ-साथ गहरी आत्मीयता से भर देने वाला क्षण था।

मेरे लिए शाम का सबसे भावपूर्ण हिस्सा वह था, जब सभी वक्ताओं ने ‘अस्मि’ शीर्षक की सार्थकता और उपन्यास के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने जिस आत्मीयता, संवेदनशीलता और गंभीरता से पुस्तक को पढ़ा और समझा, उसे सुनना मेरे लिए अत्यंत सुखद और समृद्ध कर देने वाला अनुभव रहा।

भारत से तरुण जी और पंकज सुबीर जी के भी बेहतरीन समीक्षात्मक सन्देश प्राप्त हुए जिन्हें इंदु बारोट एवं इरा ने सुन्दरता से पढ़कर सुनाया.

कार्यक्रम का संचालन आस्था देव ने बेहद प्रभावी, सहज और सुरुचिपूर्ण ढंग से किया। उनकी गरमाहट भरी शैली और मधुर वाणी ने पूरे आयोजन को एक सुंदर प्रवाह दिया। सोम्या वार्ष्णेय ने धन्यवाद ज्ञापन के माध्यम से सभी अतिथियों और आयोजन से जुड़े लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया और बेहद अपनत्व के साथ अपने उद्गार व्यक्त किये।

इस अवसर पर बर्मिंघम, मेनचेस्टर, ऑक्सफ़ोर्ड एवं लन्दन के कोने कोने से पधारे प्रतिष्ठित लेखक, मित्र समूह, जिनके प्रति मेरा मन कृतज्ञता से भर गया। इस सफल, सुगम, सुन्दरतम आयोजन के लिए सुरेखा जी और हिन्दी समिति के प्रिय सदस्यों का आभार व्यक्त करने के लिए तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं।

आयोजन में पुस्तक आवरण और छपाई की भी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। शिवना का हृदय से आभार।

अपने पहले उपन्यास को इतना स्नेह, सम्मान और अपनापन देने के लिए मैं सभी अतिथियों, साहित्यकारों, मित्रों और पाठकों की हृदय से आभारी हूँ। आप सबकी उपस्थिति, शुभकामनाएँ और आत्मीय शब्द मेरे लिए इस पुस्तक की यात्रा की सबसे बड़ी पूँजी हैं। यह शाम मेरे लिए केवल एक लोकार्पण समारोह नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, प्रतीक्षा और भावनाओं को मिले सामूहिक स्नेह का उत्सव थी।

रिपोर्ट : शिखा वार्ष्णेय, लंदन

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