वैश्विक हिंदी परिवार की संगोष्ठी में ‘दीप पर्व : अतीत से वर्तमान तक’ विषय पर हुआ सारगर्भित विमर्श

01 नवंबर, 2026। केंद्रीय हिंदी संस्थान, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन-यूके तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार के साप्ताहिक कार्यक्रम के अंतर्गत ‘दीप पर्व : अतीत से वर्तमान तक’ विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में दीपावली की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक परंपराओं, दार्शनिक महत्त्व और समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन वैश्विक हिंदी परिवार की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष ऋषि कुमार शर्मा ने किया। मुख्य वक्ता श्री मनोज श्रीवास्तव, राज्य निर्वाचन आयुक्त, मध्य प्रदेश एवं प्रसिद्ध लेखक ने दीपावली के विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि दीपावली की उत्पत्ति को किसी एक घटना, व्यक्ति अथवा कालखंड से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। संस्कृतियों के पर्व अनेक ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं के क्रमिक विकास से आकार लेते हैं। लोकमान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। यद्यपि वाल्मीकि रामायण में इस अवसर पर दीपमालाएँ जलाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, तथापि लोकस्मृति और मौखिक परंपराएँ भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। उन्होंने कहा कि किसी परंपरा का लिखित ग्रंथों में उल्लेख न होना उसके सांस्कृतिक महत्त्व को नकारने का आधार नहीं हो सकता।
दीपावली शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि यह ‘दीप’ और ‘आवली’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है दीपों की पंक्ति। एक दीप अपनी स्वतंत्र पहचान और प्रकाश बनाए रखता है, किंतु अनेक दीप मिलकर सामूहिक प्रकाश और सौंदर्य की रचना करते हैं। यह विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण है। उन्होंने कहा कि दीपावली हमें ऐसा अनुशासन सिखाती है, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहते हुए सामूहिक व्यवस्था भी बनी रहती है। एक दीप से दूसरा दीप जलाने पर पहले दीप का प्रकाश कम नहीं होता। इसी प्रकार ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, बल्कि उसका विस्तार होता है। उन्होंने दीपों की इस परंपरा को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान के प्रसार और सकारात्मक सामाजिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बताया।
श्री श्रीवास्तव ने भगवान श्रीराम के नेतृत्व और संगठन क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीराम ने वनवासी समुदायों की क्षमताओं को पहचाना और उन्हें एक सामूहिक उद्देश्य के लिए संगठित किया। उन्होंने हनुमान, सुग्रीव, नल-नील सहित अनेक सहयोगियों को उनकी योग्यता के अनुरूप दायित्व सौंपे। उनकी महानता केवल रावण पर विजय प्राप्त करने में नहीं, बल्कि सामान्य जन के भीतर विश्वास जगाकर उनकी सामूहिक शक्ति को जागृत करने में भी थी। इस दृष्टि से दीपावली जनसहभागिता, संगठन और सामूहिक सामर्थ्य का उत्सव है।
दीपावली की ऐतिहासिक एवं साहित्यिक परंपरा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कालिदास के रघुवंश, तुलसीदास के रामचरितमानस, वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित यक्षरात्रि, हर्ष के नाटकों में उल्लिखित दीपप्रतिपदोत्सव, राजशेखर के साहित्य तथा अलबरूनी के उल्लेखों का संदर्भ दिया। उन्होंने घटना-इतिहास और स्मृति-इतिहास के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी समुदाय ने किसी घटना को किस प्रकार याद रखा और अपनी परंपराओं में आत्मसात किया, यह भी इतिहास की समझ का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। सदियों से दीपावली के अवसर पर श्रीराम की अयोध्या वापसी का स्मरण किया जाना हमारी सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति का प्रमाण है।
दीपक के आध्यात्मिक महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने उसे पंचमहाभूतों का प्रतीक बताया। मिट्टी पृथ्वी, तेल जल, लौ अग्नि, वायु लौ को प्रज्वलित रखने वाली शक्ति और आकाश उसके परिवेश का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने बताया कि संस्कृत में तेल के लिए प्रयुक्त ‘स्नेह’ शब्द का अर्थ प्रेम और आत्मीयता भी है। कबीर के दोहे—
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देख्या माहिं॥”
का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अहंकार का विसर्जन होने पर ही ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है। भगवान बुद्ध के ‘अप्प दीपो भव’ संदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वयं प्रकाशित होने के साथ दूसरों तक ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने ‘दानेन वर्धति संचयेन विनश्यति’ का संदर्भ देते हुए कहा कि विद्या बाँटने से बढ़ती है, जबकि उसे संचित करके रखने से उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। उपनिषदों और भगवद्गीता के प्रकाश संबंधी विचारों के माध्यम से उन्होंने दीपावली को बाहरी प्रकाश के साथ आंतरिक चेतना और आत्मज्ञान का पर्व बताया।
लक्ष्मी पूजन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लक्ष्मी का अर्थ केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि स्वच्छता, शोभा, सौंदर्य और सुव्यवस्था भी है। दीपावली पर घरों की सफाई और सजावट की परंपरा इसी भाव को व्यक्त करती है। शुभ-लाभ की अवधारणा धन के साथ नैतिकता, मंगल और सामाजिक कल्याण को जोड़ती है। उन्होंने दीपावली को अनेक पर्वों का समूह बताते हुए धनतेरस, वसुबारस, नरक चतुर्दशी, रूप चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा और यम द्वितीया के सांस्कृतिक महत्त्व पर भी विचार व्यक्त किए। धनतेरस को भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य से जोड़ते हुए उन्होंने स्वास्थ्य को वास्तविक धन बताया।
नरक चतुर्दशी के प्रसंग में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध कर बंदी बनाई गई कन्याओं को मुक्त कराने की कथा का उल्लेख किया। उन्होंने इसे नारी की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों की पुनर्स्थापना के प्रतीक के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। रूप चतुर्दशी को रूपों की विविधता और सौंदर्य का उत्सव बताते हुए उन्होंने कहा कि सौंदर्य केवल बाहरी रूप अथवा बाज़ार द्वारा निर्धारित मानकों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुणों, संवेदना और आंतरिक प्रकाश में निहित होता है।
गोवर्धन पूजा के संदर्भ में उन्होंने पर्वतों, वनों और पर्यावरण के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पहाड़ों का क्षरण, वृक्षों की कटाई और पर्यावरणीय असंतुलन गंभीर चुनौतियाँ हैं। गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराती है। उन्होंने ‘गौ’ शब्द के इंद्रिय संबंधी अर्थ की चर्चा करते हुए इंद्रियों की शुद्धता और संयम का संदेश भी दिया।
यम द्वितीया और चित्रगुप्त पूजा पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि चित्रगुप्त जीवन के उजले और अँधेरे, दोनों पक्षों का लेखा रखते हैं। जीवन का समग्र मूल्यांकन उसके सभी पक्षों को स्वीकार करके ही संभव है। इस अवसर पर कलम-दवात और पुस्तकों की पूजा को लेखन, ज्ञान और विचार के प्रति सम्मान का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि कलम की शक्ति में विश्वास रखने वाला समाज ही विचार और अभिव्यक्ति के महत्त्व को समझ सकता है।
दीपावली और आतिशबाजी की परंपरा पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि भारत में आतिशबाजी की परंपरा को केवल विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन के बाद शुरू हुआ मानना उचित नहीं है। उन्होंने ‘आकाश भैरव कल्प’, ‘पेशवा यांची बखर’ में वर्णित कोटा की दीपावली तथा शोधकर्ता पी. के. गड़े के शोध का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक विवरणों में आतिशबाजी और लंका-दहन के दृश्य प्रस्तुत किए जाने के संदर्भ मिलते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक ग्रंथों और पुस्तकालयों के नष्ट होने के कारण अनेक परंपराओं के लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं; इसलिए किसी परंपरा का उल्लेख न मिलना उसके अस्तित्व को नकारने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
अपने वक्तव्य के समापन में श्री श्रीवास्तव ने राम और लोक के संबंध पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि श्रीराम की सबसे बड़ी उपलब्धि लोक को साथ लेकर चलना था। वनवास के दौरान उन्होंने विभिन्न समुदायों को संगठित किया और उनमें विश्वास जगाया। अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। इसलिए किसी एक प्रसंग के आधार पर राम और लोक के बीच दूरी अथवा द्वंद्व की कल्पना करना उचित नहीं है। दीपावली लोकसहभागिता, सामूहिकता और आत्मीय संबंधों का उत्सव है।
कार्यक्रम में वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने मुख्य वक्ता के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि दीपावली को जुआ, केवल धन की पूजा, अनियंत्रित आतिशबाजी और मदिरापान जैसी प्रवृत्तियों तक सीमित करना उचित नहीं है। यह भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ अभिव्यक्तियों में से एक है, जिसमें स्वच्छता, सामाजिकता, पारिवारिक संबंधों की दृढ़ता और जीवन के चारों पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष—का समन्वय दिखाई देता है।
उन्होंने योग, कोविड काल में भारत के चिकित्सा एवं वैक्सीन सहयोग तथा सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के अनेक मूल्य विश्वभर में स्वीकार किए जा रहे हैं। दीपावली को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिली है और इसका आयोजन व्हाइट हाउस, ब्रिटिश संसद तथा डाउनिंग स्ट्रीट जैसे प्रतिष्ठित स्थानों पर किया गया है। उन्होंने भगवद्गीता के छठे अध्याय के श्लोक—
“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥”
का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा दीपक स्थिर रहता है, उसी प्रकार योग-साधना में लीन साधक का चित्त भी स्थिर होना चाहिए। दीपक बाहरी प्रकाश के साथ मन की एकाग्रता और आत्मसंयम का भी प्रतीक है।
श्री जोशी ने बताया कि वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से देश-विदेश में दीप पर्व के आयोजन की योजना बनाई गई है। उन्होंने सदस्यों से अपने-अपने क्षेत्रों में काव्य-पाठ, रचना-पाठ और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने का आग्रह किया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भारत और विदेशों के 30 से 40 स्थानों पर ऐसे आयोजन होंगे। साथ ही उन्होंने सभी सदस्यों से रविवार के नियमित कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता करने और वैश्विक हिंदी परिवार की सदस्यता ग्रहण करने का अनुरोध किया।
उन्होंने सदस्यता से पहले कुछ भाषायी संकल्प लेने का भी आग्रह किया। इनमें अपनी भाषा में हस्ताक्षर करना, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर रोमन लिपि के स्थान पर देवनागरी का प्रयोग करना, घर के नामपट्ट पर अपनी भाषा में नाम लिखवाना तथा सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन में यथासंभव अपनी भाषा का प्रयोग करना शामिल है। उन्होंने कहा कि भाषा के प्रति प्रतिबद्धता केवल विचारों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
कार्यक्रम की संचालिका स्वरांगी साने ने श्री अनिल जोशी के विचारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सदस्यता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भाषा के प्रति प्रतिबद्धता और निष्ठा का प्रतीक है। उन्होंने मुख्य वक्ता श्री मनोज श्रीवास्तव के विचारों को ज्ञानवर्धक बताते हुए कहा कि उनके वक्तव्य से दीप पर्व की परंपराओं और सांस्कृतिक पक्षों को व्यापक रूप में समझने का अवसर मिला है। उन्होंने सभी सहभागियों से अपने सुझाव और प्रश्न साझा करने तथा आगामी आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया।
अंत में डॉ. गंगाधर वानोडे सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद केंद्र ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक हिंदी परिवार कोरोना काल से ही केंद्रीय हिंदी संस्थान, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के सहयोग और मार्गदर्शन में निरंतर कार्यक्रम आयोजित करता आ रहा है। उन्होंने आज की संगोष्ठी को सार्थक और ज्ञानवर्धक बताते हुए मुख्य वक्ता श्री मनोज श्रीवास्तव तथा कार्यक्रम की संचालिका स्वरांगी साने के प्रति आभार व्यक्त किया।
रिपोर्ट : अजय शर्मा
