
‘वसुदेव सुतम देवम, कंसचाणूर मर्दनम ।
देवकी परमानंदम, कृष्णम वन्दे जगद्गुरुम’ ॥
कृष्णाय वासुदेवाय, देवकी नंदनाय च ।
नन्द गोप कुमाराय, गोविंदाय नमो नमः ॥


वैश्विक हिन्दी परिवार द्वारा “कृष्ण जन्माष्टमी’ के उपलक्ष्य में सहयोगी संस्थाओं के साथ 24 जुलाई 2025 को ‘विदेश में कृष्ण, विषय पर आभासी कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रख्यात निबंधकार डॉ॰ नर्मदा प्रसाद उपाध्याय जी द्वारा की गई। उन्होने सभी को ‘जन्माष्टमी’ की बधाई देते हुए कहा कि कृष्ण प्रत्येक द्वार के सामने प्रतिदिन खड़े होते हैं और कहते हैं कि –‘खोलें गृह के द्वार’। कृष्ण काले नहीं बल्कि “उजाले’ रूप में विश्व को आलोकित करते हैं। उनके विश्वरूप में सरस प्रेम और कल्याण निहित है। समस्त वैश्विक दर्शन में कृष्ण का दर्शन है। कान्हा का एक अर्थ है –‘कहाँ नहीं है जो’ । कृष्ण केवल भगवद्गीता में ही नहीं बल्कि पूर्व और पश्चिम के सभी अनुशासनों में यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान और स्वीकार्य हैं। मुख्य अतिथि के रूप में टोकियो विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ॰ हिरोयुकी सातो ने कहा कि वे कृष्ण से संबन्धित मथुरा, वृन्दावन, द्वारिका और कुरुक्षेत्र आदि सभी स्थानों पर शोधार्थी और भक्त के रूप में रह चुके हैं। विश्व के सभी देशों विशेषकर जापानवासियों में कृष्ण से संबन्धित जानकारी की बहुत आवश्यकता है। अतएव उन्हें इन स्थानों पर जाना चाहिए ताकि कृष्ण के विराट स्वरूप को जान सकें। इस कार्यक्रम में देश -विदेश से अनेक साहित्यकार, विद्वान विदुषी, कवि, तकनीकीविद, योग साधक, प्राध्यापक,अनुवादक, शिक्षक, राजभाषा अधिकारी, शोधार्थी, विद्यार्थी और भाषा-संस्कृति प्रेमी आदि जुड़े थे।






आरंभ में आस्ट्रेलिया से श्री विनयशील चतुर्वेदी द्वारा “कृष्णम वंदे जगद्गुरुम’ के साथ सबका स्वागत किया गया। तत्पश्चात जर्मनी से पत्रकार और साहित्यकार डॉ॰ शिप्रा शिल्पी द्वारा सधे और मधुर शब्दों में “गुणाकरम ,कृपाकरम’ की स्वर लहरी के साथ बखूबी संचालन संभाला गया। विशिष्ट वक्ता के रूप में उज्बेकिस्तान के ताशकंद विश्वविद्यालय से जुड़ीं प्रो॰ उलफत मुखीबोवा ने मन्तव्य दिया कि भारतीयों का संस्कार रामायण और महाभारत की देन है। उनके विश्वविद्यालय में इन्डोनेशिया और मलेशिया आदि 14 देशों के विद्यार्थी पढ़ते हैं जिन्हें भक्तिकाल पढ़ाने का मौका मिलता है। उज्बेकिस्तान में कृष्ण भक्त सोसाइटी भी है। वृन्दावन में रह चुकी प्रो॰ उलफत का मानना है कि भगवान कृष्ण सर्वव्यापी हैं। थाईलैंड से जुड़ीं आध्यात्मिक वक्ता, वैष्णव दीक्षित भक्तिशास्त्री दिव्या जोशी ने कहा कि इस्कॉन के माध्यम से उन्हें दुनिया के अनेक देशों में कृष्ण पर उपदेश देने का मौका मिला है जिससे कृष्ण के अखिल ब्रह्मांड का दर्शन होता है। कृष्ण प्रथम राजनयिक और राजनीतिज्ञ तथा रणनीतिज्ञ भी हैं। जगत की समस्याओं का समाधान ‘भगवद्गीता’ में है। हिन्दी राइटर्स गिल्ड कनाडा की संस्थापक और साहित्यकार डॉ॰ शैलजा सक्सेना ने कहा कि कनाडा के प्रमुख स्थानों पर सामूहिक रूप से ‘हरे राम हरे कृष्ण’ गाते बजाते और नृत्य करते तथा भगवतगीता बांटते हुए भक्त प्रायः दीखते हैं। उन्होने कहा कि कृष्ण सदैव प्रासंगिक रहेंगे। अर्जुन रूपी दुनिया वालों के प्रश्न आते रहेंगे और कृष्ण उत्तर देते रहेंगे। कृष्ण के विश्वात्मा रूप से शांति मिलती है। कृष्ण देश धर्म से परे हैं। आइये, हम कर्मयोग,ज्ञानयोग और भक्तियोग के सिद्धान्त से स्थितिप्रज्ञता की ओर बढ़ें।



विशिष्ट अतिथि के रूप में वृन्दावनवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्वामी हरिदासजी के वंशज तथा ‘श्री कृष्णामृतम’ के संपादक डॉ॰ कृष्ण चन्द्र गोस्वामी ने श्रीकृष्ण के स्वरूप की भंगिमाओं पर गहन प्रकाश डाला। उन्होने कहा कि वृन्दावन के कृष्ण की नितांत अलग भूमिकाएँ हैं। उसके पहले और बाद के कृष्ण अवतार नहीं अवतारी भी हैं। वृन्दावन के कृष्ण के संबंध में पुस्तकों में उपलब्धता कम है। मूल वृन्दावन 2 वर्ग किमी में ही है जहाँ से चैतन्य महाप्रभु , राधा बल्लभ और हरिदास तीन संप्रदाय प्रस्फुटित हुए। उद्भट विद्वान श्री गोस्वामी जी ने कृष्ण के भगवत रसिक अनेक स्वरूपों के विषय में दुर्लभ जानकारी दी। 1- गोविंद 2- मदनमोहन 3-गोपीनाथ 4- राधारमण 5- युगल किशोर 6- बिहारीजी आदि। राधिका के पायल में न्योछावर हो जाने वाले कृष्ण सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हैं। मॉरीशस के रामायण सेंटर की अध्यक्ष डॉ॰ विनोद बाला अरुण ने कहा कि कृष्ण ने अपने गुरु के यहाँ 64 दिनों में 64 कलाएं सीख लीं। उन्होने श्रीमदभगवद्गीता के श्लोकों का उद्धरण देते कहा कि हमें अपना प्रकाश स्वयं बनना है। बड़े लोग जिस रास्ते पर चलते हैं, छोटे भी उसका अनुसरण करते हैं।

विमर्श की प्रतिभागी, उड़ीसा से जुड़ी डॉ॰ धरित्री ने जगन्नाथ जी के मंदिर का माहात्म्य बताया। उन्होने कहा कि जन्माष्टमी पर जगन्नाथ जी यशोदा मैया की तरह कृष्ण को गर्भ में धारण करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो॰ राजेश गौतम का कहना था श्रीकृष्ण पूर्ण अवतार हैं। कृष्ण वैश्विक नायक और मार्गदर्शक हैं जिनमें समूचा विश्व समाया हुआ है। अमेरिका से जुड़े प्रौद्योगिकीविद प्रो॰ दीपक मशाल का मन्तव्य था कि युद्ध के वर्तमान समय में कृष्ण की निहायत जरूरत है। हमें कृष्ण की नीतियों पर चलना होगा। केवल ‘कार’ नहीं बल्कि ‘संस्कार’ का संवर्धन का होगा और कृष्ण को सखा बनाना होगा। कृष्ण जीवन दर्शन के मानक हैं।
यह कार्यक्रम विश्व हिन्दी सचिवालय, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, वातायन और भारतीय भाषा मंच के सहयोग से वैश्विक हिन्दी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी के मार्गनिर्देशन में सामूहिक प्रयास से आयोजित हुआ। कार्यक्रम प्रमुख एवं सहयोगी की भूमिका का निर्वहन ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार सुश्री दिव्या माथुर और पूर्व राजनयिक सुनीता पाहुजा द्वारा किया गया। अंत में अमृतसर से डॉ॰ किरण खन्ना के आत्मीय धन्यवाद ज्ञापन के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ। कृष्णानुरागियों को अतीव आनंद की अनुभूति हुई। यह कार्यक्रम “वैश्विक हिन्दी परिवार, शीर्षक के अंतर्गत “यू ट्यूब ,पर उपलब्ध है।
कृष्णाय वासुदेवाय, हरये परमात्मने ।
प्रणत: क्लेश नाशाय, गोविंदाय नमो नमः ॥
शब्दांकन – डॉ॰ जयशंकर यादव

बहुत सुंदर कार्यक्रम। कृष्ण जीवन हैं, उन्हें जीना है। कुछ कहना नहीं। क्योंकि कहते तो उनके लिए जो हमसे अलग है। आंख अपने आप को देख नहीं पती न।