कागज के शेर और समोसे का फेर(व्यंग्य)-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

शहर की धूल फाँकती एक तंग गली के आखिरी छोर पर ‘साहित्यिक पुनरुत्थान परिषद’ का बैनर ऐसे लटक रहा था, मानो अपनी बदहाली पर खुद ही आंसू बहा रहा हो। कार्यक्रम का नाम था ‘अखिल भारतीय विराट कवि सम्मेलन’, जिसमें ‘अखिल भारतीय’ शब्द का भार केवल उन कवियों के कंधों पर था, जो पड़ोस के जिलों से रोडवेज की खटारा बसों में धक्के खाकर आए थे। मंच पर बिछी सफेद चादर पर इतने दाग थे कि वे खुद किसी रहस्यमयी कविता के प्रतीक मालूम पड़ते थे। आयोजक महोदय की सक्रियता ऐसी थी कि वे हर दो मिनट में माइक को ठोककर यह सुनिश्चित कर रहे थे कि ‘हल्लो-हल्लो’ की आवाज मोहल्ले के उस कुत्ते तक जरूर पहुँचे, जो इस आयोजन का एकमात्र निष्पक्ष श्रोता था। श्रोताओं के नाम पर वही दस-बारह लोग थे, जिन्हें समोसे और चाय का लालच देकर रोका गया था, और जो बार-बार अपनी घड़ी की तरफ ऐसे देख रहे थे जैसे कि जेल से रिहाई का वक्त करीब आ रहा हो।

मंच संचालन की कमान एक ऐसे सज्जन के हाथ में थी, जिनकी अपनी कविताएँ इतनी लंबी थीं कि उन्हें पढ़ने के लिए श्रोताओं को पुनर्जन्म लेना पड़े। उन्होंने संचालन शुरू करते ही हिंदी साहित्य के गिरते स्तर पर साढ़े तीन मिनट का विलाप किया, जिसमें उन्होंने स्वयं को ‘साहित्य का आखिरी पहरेदार’ घोषित कर दिया। बीच-बीच में वे किसी कवि का परिचय देते हुए विशेषणों की ऐसी झड़ी लगाते कि लगता साक्षात कालिदास या तुलसीदास बस अभी रोडवेज की बस से उतरे ही हैं। जब उन्होंने पहले कवि को आमंत्रित किया, तो उनके शब्दों में इतनी चाशनी थी कि पास रखे पानी के गिलास में चींटियाँ लगने का डर पैदा हो गया। कवि महोदय मंच पर ऐसे पधारे जैसे कि नोबेल पुरस्कार उनके स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा हो। उन्होंने अपनी जेब से कागजों का एक ऐसा गट्ठर निकाला, जिसे देखकर पहली पंक्ति में बैठे बुजुर्ग ने गहरी आह भरी और अपनी लाठी संभालकर निकलने का मन बना लिया।

कवि जी ने माइक को अपनी नाक के इतने करीब सटा लिया कि उनकी सांसों की आवाज किसी चक्रवाती तूफान जैसी सुनाई देने लगी। उन्होंने पहले दो मिनट तक इस बात पर शोधपरक भाषण दिया कि आज का कवि कितना उपेक्षित है और कैसे सरकार को कवियों के लिए कम से कम ‘पेंशन और मुफ्त हवाई यात्रा’ का प्रबंध करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने अपनी कालजयी रचना का शीर्षक पढ़ा—’फटे जूते की आत्मकथा’। पहली दो पंक्तियाँ पढ़ते ही उन्होंने दर्शकों की ओर ऐसे देखा जैसे कि उनसे ‘वाह-वाह’ की उगाही करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। जब किसी ने दाद नहीं दी, तो उन्होंने अपनी चिरपरिचित भोजपुरी शैली में तंज कसा, “का हो मैनेजर भाई, का ई शहर में रसज्ञ लोग मर गइलन का? अइसन सन्नाटा त मरघटो में ना होला!” इतना सुनकर पीछे बैठे एक युवक ने, जो मोबाइल पर रील देख रहा था, मजबूरी में दो बार मेज थपथपा दी।

अगले कवि एक ओजस्वी धारा के लेखक थे, जिनका गला बैठा हुआ था, लेकिन अहंकार पूरी तरह खड़ा था। उन्होंने वीर रस की कविता शुरू करने से पहले तीन बार अपना कुर्ता झटककर यह संकेत दिया कि अब मंच पर बिजली गिरने वाली है। उनकी कविता में ‘लहू’, ‘तलवार’, और ‘दुश्मन की छाती’ जैसे शब्द इतनी बार आए कि मंच के पास खड़ा पानी पिलाने वाला लड़का डर के मारे दूर भाग गया। वे चिल्ला-चिल्लाकर पढ़ रहे थे और हर बंद के बाद आयोजक की ओर गर्दन घुमाकर पूछते, “कैसा है?” आयोजक महोदय, जो उस वक्त बजट का हिसाब लगा रहे थे, बिना सुने ही बोल देते, “अतुलनीय! अप्रतिम! युगांतरकारी!” उधर श्रोताओं की हालत यह थी कि वे समझ नहीं पा रहे थे कि देश की सीमाओं की रक्षा की चिंता करें या अपनी फटी हुई जेब की, जिसमें समोसे का तेल लग चुका था।

तभी मंच के कोने में बैठे एक वरिष्ठ साहित्यकार, जो पिछले तीस सालों से एक ही फटी हुई जैकेट पहनकर ‘साहित्य सेवा’ कर रहे थे, अपनी बारी का इंतजार करते-करते झपकी लेने लगे। संचालक ने जब उनका नाम पुकारा, तो वे हड़बड़ाकर ऐसे जागे जैसे कि किसी ने नींद में उन पर ठंडा पानी डाल दिया हो। उन्होंने माइक संभाला और बिना किसी भूमिका के समाज के ‘दोहरेपन’ पर एक दार्शनिक व्यंग्य पढ़ना शुरू किया। उनकी भाषा इतनी क्लिष्ट थी कि शब्द मंच से टकराकर वापस लौट रहे थे और श्रोताओं के सिर के ऊपर से निकलकर गली के अंधियारे में गुम हो रहे थे। एक स्थानीय पार्षद, जो मुख्य अतिथि के रूप में आए थे, अपनी उबासी रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए बार-बार अपने पीए से पूछ रहे थे, “ई का बोल रहे हैं? कुछ समझ में आवत बा?” पीए ने धीरे से कान में फुसफुसाया, “नेताजी, इहे त साहित्य हवे, जेके समझ में आ जाई ऊ साहित्यकार थोड़े कहलाई!”

कवि सम्मेलन के मध्य में चाय का दौर चला, जिसने मरे हुए श्रोताओं में थोड़ी जान फूँकी। चाय क्या थी, गर्म पानी में चीनी का घोल था, जिसे पीकर कवियों के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई कि किसका सम्मान पत्र ज्यादा बड़ा छपा है। एक कवि महोदय तो इस बात पर रूठ गए कि पोस्टर में उनका नाम सबसे नीचे क्यों है। उन्होंने अपनी कविताओं का झोला उठाया और ‘भोजपुरिया प्रलय’ की धमकी देते हुए बाहर जाने लगे। “अरे साहब, हम त ई सोच के आइल रहीं कि ई विद्वानों की सभा हवे, बाकी यहाँ त सिर्फ़ गुटबाजी बा! हमरा जैसन कलम के सिपाही के अइसन बेइज्जती बरदास्त ना होई!” आयोजक ने उन्हें पकड़कर वापस बैठाया और वादा किया कि अगले साल उनका नाम सबसे ऊपर और ‘बोल्ड’ अक्षरों में होगा। इस झूठे आश्वासन के बाद कवि जी ऐसे शांत हुए जैसे कि भूखे बच्चे को लॉलीपॉप मिल गया हो।

अब बारी थी उस कवयित्री की, जिनका मुख्य योगदान कविता से ज्यादा उनकी रंगीन साड़ी और सजीली मुस्कान थी। उनके मंच पर आते ही श्रोताओं की संख्या अचानक एक से बढ़कर दो हो गई—गली का एक मनचला लड़का भी आकर खड़ा हो गया। उन्होंने ‘प्रेम’ पर कुछ ऐसी पंक्तियाँ पढ़ीं जिनमें तुकबंदी का अकाल था, मगर भावुकता का सैलाब। उन्होंने हर लाइन के बाद एक मधुर मुस्कान बिखेरी, जिससे मंच पर बैठे बूढ़े कवियों के हृदय में भी ‘साहित्यिक कंपन’ होने लगा। उन्होंने पढ़ा, “तुम्हारी याद में मैं ऐसे पिघलती हूँ, जैसे तवे पर रखा मक्खन।” इस महान बिंब पर संचालक महोदय ने दस मिनट तक व्याख्या की और मक्खन को ‘शाश्वत प्रेम का प्रतीक’ बता दिया। श्रोता गण अब पूरी तरह आत्मसमर्पण कर चुके थे, उन्हें समझ आ गया था कि यहाँ से बिना अपनी बुद्धि गंवाए निकलना नामुमकिन है।

सम्मेलन का समापन उस वक्त हुआ जब बिजली गुल हो गई और इन्वर्टर ने जवाब दे दिया। अंधेरे में भी कवियों का उत्साह कम नहीं हुआ; वे बिना माइक के ही एक-दूसरे को अपनी कविताएँ सुनाने लगे। हर कोई सुना रहा था, सुनने वाला कोई नहीं था—शायद यही आधुनिक हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। आयोजक महोदय ने अंधेरे का फायदा उठाकर मुख्य अतिथि को पिछवाड़े के रास्ते से निकाल दिया ताकि उन्हें मानदेय के लिए न रोकना पड़े। बाहर निकलते वक्त एक कवि ने दूसरे से पूछा, “गुरु, आज के प्रोग्राम के बारे में का राय बा?” दूसरे ने बीड़ी सुलगाते हुए जवाब दिया, “राय का होई भाई, साहित्य त बच गइल, बाकी हमनी के किराया के पइसा डूब गइल लागत बा!” गली के कुत्तों ने एक साथ भौंककर इस महान साहित्यिक अनुष्ठान की समाप्ति की घोषणा की, और शांति छा गई।

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