जल प्रकृति और जीवन (रिपोर्ट)

जल, प्रकृति और जीवन पर परिचर्चा आयोजित करना भी समाधान – गोयल
भारत सरकार ने योजनाएँ बनाई हैं लेकिन उन्हें अमल में नहीं लाया जाता। फिर समाधान क्या है? राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष आदर्श कुमार गोयल ने जल, प्रकृति और जीवन सत्र की अध्यक्षता करते हुए समस्या से अधिक समाधान खोजने की बात कही। उन्होंने वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा आयोजित इस परिचर्चा को भी समाधान की दिशा में ही कदम माना। उन्होंने कहा कि 72% गंदा पानी बिना प्रक्रिया किए रह जाता है और इसे नदियों/झीलों/भूमिगत जल में बहा दिया जाता है। जारी होने वाले और प्रक्रिया किए जाने वाले पानी के बीच इस अंतर को खत्म करना होगा ताकि गंदे पानी को कीमती संसाधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। सभी औद्योगिक क्षेत्र का पानी प्रदूषित है। सारा गंदा पानी हमारे पीने के पानी में मिल रहा है। इंदौर में बीते दिनों जो दुर्घटना हुई, वह पीने के पानी में गंदा पानी मिलने से हुई। उन्होंने बताया कि भारत में प्रतिदिन 53, 396 मिलियन लीटर नाले का पानी संचारित होता है।
क्या कभी पहाड़ों से बात की है
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिक्षा संस्कृति न्यास की पर्यावरण गतिविधियों के राष्ट्रीय संयोजक संजय स्वामी ने स्वयं को पर्यावरण का कार्यकर्ता बताया। उनका मानना है कि आप पानी बना तो नहीं सकते, बचा तो सकते हैं। उन्होंने श्रोताओं से पूछा कि क्या कभी आपने पहाड़ों से बात की है, नदियों, झरनों से बात की है। अपना बचपन याद कीजिए या अपने आसपास के बच्चों को देखो। तो हमें प्रकृति का स्वभाव समझ आएगा। भारतीय संस्कृति प्रकृति के संरक्षण की है। भारत ऐसा देश है, जहाँ जितनी हमें वर्षा की आवश्यकता है, उससे अधिक वृष्टि होती है। हमारे पूर्वजों ने तालाब बनाएँ, कुएँ बनाएँ, बावड़ियाँ बनाईं। भारत में 250 नदियों की बात होती है पर भारत में वैसे तो 4 हजार नदियाँ हैं। हम अपने तालाब-पोखरों को अभी भी बचा लें। आद्र भूमि में ही जैव विविधता रहती है। ऐसे कुछ प्रयास होने चाहिए। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी से आप विचार लेकर जाए कि आपके सामने जो पानी की बोतल रखी है, उसका या तो आप पूरा पानी पीकर जाएँगे या छोड़कर जाएँगे…एक-दो घूँट पीकर नहीं छोड़ देंगे।
पानी कहाँ चला गया?
जिलाधिकारी संस्था के अध्यक्ष कैलाश गोदूका ने विशिष्ट अतिथि के तौर पर बताया कि वे पानी पर वर्ष 2012 से काम कर रहे हैं। भारत जैसे देश में जहाँ किसी को पानी पिलाना सबसे बड़ा धर्म है, वहाँ किसी की मृत्यु पानी न मिलने से हो जाती है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। पहले हर गली-मोहल्ले में पानी की प्याऊ हुआ करती थी, वे गायब हो गए। हैंडपंप नहीं है। यह स्थिति क्यों बनी, पानी कहाँ चला गया? जेब में पैसे है तो पानी खरीदकर पी सकते हैं पर जेब में पैसे नहीं तो उसे बिना पानी के मरना ही होगा। मेरा पहला कदम है कि पानी का व्यवसाय नहीं होना चाहिए। पानी पर मालिकाना हक किसी एक का कैसे हो सकता है। नदी पुत्र के नाम से जाने जाते भारतीय नदी परिषद के अध्यक्ष रमन कांत त्यागी ने विशिष्ट वक्ता के रूप में कहा कि बड़ी नदियों की बात छोड़ दें तो बाकी सब नदियाँ आईसीयू में है। हम मैदानी कार्यकर्ताओं को तकनीकी सहयोग देते हैं। नदी का काम करने वालों की शिकायतें बहुत होती हैं। हम नदी के कार्यकर्ताओं के नैतिक समर्थन में खड़े होते हैं। विशिष्ट वक्ता के तौर पर ही फल्गु नदी योजना से संबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता संजय सज्जन ने बताया कि उन्होंने फल्गु नदी क्षेत्र में नया-पुराना मिलाकर 400 जल संधारण क्षेत्र तैयार किए हैं।
बीज वक्तव्य देते हुए ओ.पी.जिंदल विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर कृति शर्मा ने आदिवासियों के साथ काम करने के अनुभवों को बताया। आदिवासी मत्स्यपालन, वृक्ष कटाई आदि को बड़ी गंभीरता से करते हैं। महिलाएँ वहाँ इसमें सशक्त भूमिका निभाती है। पेसा नियमों का सही तरीके से पालन होना चाहिए। उन्होंने आदिवासी कवयित्री जेंसिता केरिकट्टा की कविता से समापन किया- क्या लेना है पूछने लगा दुकानदार…थोड़ी बारिश, थोड़ी गीली मिट्टी, एक बोतल नदी, वो डिब्बे बंद पहाड़, उधर दीवार पर टंगी प्रकृति भी दे दो और ये बारिश इतनी महँगी क्यों? …आँचल की गाँठ में पैसों की जगह, पूरा वजूद मुड़ा पड़ा था।
वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी ने जानकारी दी कि सम्मेलन हेतु ताशकंद से विशेष दल पधारा है। ताशकंद दल की संयोजक उल्फत ने दल के सभी सदस्यों से परिचय कराया।
स्वागत अर्चना त्रिपाठी, ज्ञानेंद्र पांडे, विवेक शर्मा ने किया। संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. वेद प्रकाश वत्स ने किया। सत्र संयोजन दिल्ली विवि के शोधार्थी विकास गिरी ने किया था।
सत्र – जल प्रकृति और जीवन
स्थान –उमंग सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक – 9 जनवरी, 2026
समय – 2:00 से 3:30 तक
