दक्षिण भारतीय भाषाएं तेलुगु – कन्नड़ मलयालम – परंपरा और विकास की दिशाएँ – संदर्भ हिंदी से अंतर्संबंध सत्र – समर्पित – स्वर्गीय एस. एल. भैरप्पा (रिपोर्ट)

अध्यक्षीय उद्बोधन में शिक्षा संस्कृति उत्तम न्यास के राष्ट्रीय संयोजक डा. विनोद ने कहा कि भारतीय भाषाओं की एक उज्जवल परंपरा है। इस परंपरा की आत्मा हमारा संस्कार है। भारत का संस्कार या जीवन दर्शन देश काल परिस्थिति के अनुसार विविध संप्रदाय, प्रकार, भाव आदि के रूप लेता है। जैन हो या वैष्णव कन्नाडा साहित्य की परंपरा में जैसे प्रकट होते हैं, उसी प्रकार तमिल और मळयाळम में भी प्रकट होते हैं। भाषा मुख्य उद्देश्य है समाज की आवश्यकता की पूर्ति। एक दूसरे से शब्दों को स्वीकार करना, नए-नए प्रयोग करना, इसलिए  कोई भी भारतीय भाषा दूसरी भाषा के विरोध में खड़ी नहीं होती। उन्होंने एक दूसरे को संपन्न ही किया है। शब्द भंडार हो या व्याकरण सभी भारतीय भाषाओं में अनेक समानताएं हैं अत: यह अनिवार्य है कि हम जो सम्मान अपनी भाषा को देते हैं वही सम्मान अन्य भाषाओं को भी दें। यही भारतीय दृष्टि है। आज का संकट किसी एक भाषा का संकट नहीं है। सभी भाषाओं का संकट है। आज औपनिवेशिक शक्तियों के षडयंत्र का खुलासा हो चुका है। जाति, धर्म, भाषा आदि अनेक आधारों पर उन्होंने हमें विभक्त किया है। उसका प्रभाव भारत पर पड़ा है। हमें सोचना है कि इन चुनौतियों से कैसे बाहर आ सकते हैं। इसके लिए हमारी शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे और इसपर काम शुरु भी हो गया है। मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। भारतीय भाषाओं को शिक्षा में पुनर्स्थापित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा को उसमें समाविष्ट करना है। हमें अपने परिवारों में, घर में, आस-पड़ोस में अपनी भाषा, मातृभाषा के प्रयोग को व्यवहार में लाना है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया में भी हम अपनी भाषा का प्रयोग करें। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधीजी के योगदान को चिह्नित करते हुए उनकी पुस्तक ’हिंद स्वराज’ का उल्लेख किया जिसमें उन्होंने भाषा के विषय में अपने विचार व्यक्त किए हैं। गुजराती होते हुए भी, दक्षिण अफ़्रीका में अंग्रेजी का प्रयोग करने के बावजूद जब वे भारत आए तो उन्होंने हिन्दी को अपना माध्यम बनाया। 1919 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की शुरुआत की । अब हमें राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, वैश्विक स्तर पर भी इस अभियान को छेड़ना है। हमारे व्यवहार एवं व्यापार के सभी क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ाना है। न्यायालयों, उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं एवं उनसे जुडे पुस्तक, सब कुछ अनेक भारतीय भाषाओं में होना चाहिए। हमें यह देखना है कि भाषाओं के बीच विरोध नहीं प्रेम एवं आदर की भावना हो। सभी भाषाएं राष्ट्रभाषाएं हैं। परंतु सभी भाषाएं संपर्क या व्यवहार की भाषा नहीं हो सकती उसके लिए एक भाषा चाहिए जो देश को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखती हो।

मुख्य अतिथी श्री राघवेन्द्र श्रीवत्स जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वकील के रूप में सेवारत हैं और विधि से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते आए हैं, उन्होंने अपने व्याख्यान के प्रारंभ में ही एक कविता के उल्लेख के माध्यम से कन्नड भाषा की पूर्णता का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि डा. मैथिली ने भैरप्पा जी के लेखन एवं चिंतन के विषय में जो गहन वक्तव्य प्रस्तुत किया है वह उसी धारा को आगे बढाएंगे। “नानेके बरेयुत्तेने” (अर्थात मैं क्यों लिखता हूँ) भैरप्पा के निबंधों का यह एक संकलन है जिसमें उनहोंने आत्मावलोकन के माध्यम से साहित्य एवं लेखन के उद्देश्य पर विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार साहित्य का उद्देश्य है सत्यान्वेषण है, न कि समाज सुधार। जीवन को प्रत्यक्ष देखकर, उस जीवन को जी कर, और फ़िर उन अनुभवों के तात्पर्य को पकडकर सूक्ष्म रूप से विविधता के साथ लिखा।

उन्होंने इस सत्र के मूल विषय की ओर बढ़ते हुए कन्नड साहित्य के इतिहास पर प्रकाश डाला और विभिन्न भाषिक आंदोलनों की चर्चा की। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य था एक स्वस्थ मनुष्य एवं समाज का निर्माण। कन्नड साहित्य के एक और दिग्गज हैं श्री डी.वी. गुंडप्पा लेकिन उनकी कन्नड थोडी क्लिष्ट थी। 20वीं शताब्दी के एक महान नाटककार थे टी.पी. कैलासम। उनकी मातृभाषा तमिल थी। लेकिन परंपरा की बेडियों को तोडते हुए उन्होंने कन्नड में  साहित्य सृजन किया। 1947 में जब वे कन्नड साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष थे जब उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण विचारों को प्रस्तुत किया था। तावरेकेरे नामक नाटक के पात्रों में एक तेलुगु है और एक मुसलमान। इस नाटक में उन्होंने उनकी ही भाषा / बोली को कन्नड लिपि में लिख कर प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा “नाटकं रम्यम भाषा आभासं, इति कैलासम” – जहाँ तक विकास एवं परंपरा की बात है, हम देख रहे हैं कि प्रादेशिक भाषा का प्रयोग बहुत अशुद्ध होता जारहा है विशेषत: पत्रकारिता में। हमें भाषा की शुद्धि के प्रति सतर्क रहना होगा। संविधान में ही हिन्दी के विकास हेतु केंद्र सरकार प्रतिबद्ध है। प्रशासन में भाषा के प्रति भी सजग रहना होगा। अनावश्यक अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। संविधान भी कहता है कि अधिकांश शब्द संस्कृत के हों एवं बाकी शब्द अन्य भारतीय भाषाओं से लिए जाएँ। न्यायालयों में भी क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग ही सूक्त है। कर्नाटक में अभी तक सिर्फ़ दो ही फ़ैसले कन्नड में लिखे गए हैं। अन्य सभी अंग्रेजी में ही लिखे गए हैं। यह आवश्यक है कि न्यायिक फ़ैसले प्रादेशिक भाषा या मातृभाषा में ही हों।

डा. वी वेंकटेश्वर राव ने अपने वक्तव्य में सूचित किया कि उनकी मातृभाषा तेलुगु है। तो इसलिए तेलुगु भाषा उसका विकास, उसकी परंपरा और हिंदी भाषा के साथ उसके अंत:संबंध पर  संक्षेप में कुछ कहेंगे। तेलुगु का इतिहास यदि 2000 वर्षों का है तो हिन्दी का मात्र 1000 वर्षों का है। इसलिए भारत सरकार ने 2008 में तेलुगु को शास्त्रीय भाषा का सम्मान प्रदान किया। इसकी प्राचीनता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि ऋगवेद के ऐतरेय ब्राह्मण में ही ’आंध्र’ शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। भारत में जितने भी आक्रमण हुए तुर्क, खिलजी, मुगल आदि दक्षिण भारत भी आए तो उनके साथ आई उनकी भाषा जो हमारी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ घुल-मिल गई। इसने दखिनी हिन्दी का रूप धारण कर लिया। इसके लिए वेंकटेश्वर जी ने अनेक उदाहरण भी दिए। यद्यपि, व्याकरण के दृष्टिकोण से हिन्दी और तेलुगु में अंतर अवश्य है परंतु दोनों भाषाओं के बीच में शब्दों के आदान-प्रदान के कारण दोनों के बीच एक अद्भुत सामरस्य स्थापित हो गया है। यह सामरस्य ही भारतीय परंपरा का मूल है। अपने वक्तव्य का अंत एक उदाहरण के साथ करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाएं एक ही सांस्कृतिक माला के विभिन्न सुगंधित पुष्प है और हिंदी वह

रेशम धागा है जो इन सबको एक सूत्र में प्रयोग कर एक सुगठित राष्ट्र और वैश्विक परिवार का गौरव प्रदान करता है।

हमारे पूर्व राष्ट्रपति सर्वेपल्ली श्री राधाकृष्णन ने कहा था कि भारतीय साहित्य एक ही है लेकिन विविध भाषाओं में लिखा गया है। कई बार यह परिस्थिति उनके मन में भी संदेह उत्पन्न करती है कि क्या कन्नड साहित्य, तेलुगु साहित्य, हिन्दी साहित्य आदि सब वाकई अलग-अलग हैं या साहित्य एक है सिर्फ़ अलग-अलग शब्दों में अभिव्यक्त हुआ है। उदाहरण के माध्यम से उन्होंने अपने इस संदेह को स्पष्ट किया। कन्नड का श्रेष्ठ साहित्य “विक्रमार्जुन विजय” के रचयिता थे आदिकवि पम्प जो एक तेलुगु भाषी थे। उसी प्रकार तेलुगु के श्रेष्ठ कवि नन्नया एक कन्नड भाषी थे। इससे भी पेचीदा स्थिति है तमिल की श्रेष्ठ रचना ‘तिरुक्कुरल’ की। उसे तमिल साहित्य माना जाता है लेकिन गौर-तलब बात यह है कि उस समय तमिलनाडु राज्य की भौगोलिक सीमा नहीं थी। तो ऐसे में यह पूरे दक्षिण भारत की धरोहर बन जाती है। उन्होंने इतिहास से एक और उदाहरण लिया सम्राट कृष्णदेवराय का जिनका जिक्र पिछले वक्ताओं ने भी किया था। उन्हें कर्नाटक का सर्वश्रेष्ठ राजा कहते हैं, वो वास्तव में तेलुगु भाषी थे । उन्होंने ’अमुक्तमालयदा’ की रचना की जो आळ्वार भक्तों के बारे में है। प्रेमचंद का लगभग पूरा साहित्य तेलुगु में उपलब्ध है तो क्या तेलुगु भाषी उन्हें तेलुगु का साहित्यकार कहते हैं? श्री राम अयोध्या के थे या दक्षिण भारत के थे? रामायण की महिमा और शक्ति द्रष्टव्य है जो इतनी सारी भाषाओं में उपलब्ध है। यही भारतीय साहित्य का सौंदर्य है। हमें अब आगे से किसी भाषा विशेष के अंतर्गत साहित्य का नाम न लेते हुए इसे भारतीय साहित्य कहना चाहिए । इससे सभी प्रकार की भाषागत चुनौतियां सामाप्त हो जाएंगी।

अगले विशिष्ट वक्ता थे दिल्ली के ख्यात पत्रकार श्री दत्तन जी । उन्होंने प्रारंभ करते हुए उक्ति कही कि  Journalism is literature in a hurry. उन्होंने व्यक्त किया कि उनका विषय है भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है। कोई भी भाषा क्यों सीखता है? अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पहले उन्होंने पोर्चुगीस के दो सर्टिफ़िकेट कोर्स किए थे । मळयाळम में पोर्चुगीस के अनेक शब्द हैं जिसपर कुछ शोध करना चाहते थे इसलिए यह भाषा सीखी। जब तक पढ़ रहे थे ओर भाषा बोल रहे थे तब तक पोर्चुगीस आती थी लेकिन पाठ्यक्रम की समाप्ति के बाद उस भाषा के प्रयोग के लिए लोग न मिलने के कारण धीरे धीरे अब उसे भूलते चले जा रहे हैं। ऐसे में काम आती है प्रौद्योगिकी। आज प्रौद्योगिकी की बदौलत इतने एप्स आ गए हैं कि भाषा सीखना सरल हो गया है। पिछले एक दशक से पहले तक पूरी जानकारी सिर्फ़ अंग्रेजी में उपलब्ध थी लेकिन आज वही जानकारी भारत के ही नहीं, विश्व की अनेक भाषाओं में भी उपलब्ध है। आज विश्व के मान्य साहित्यिक सम्मान भी भारतीय भाषाओं को प्राप्त हो रहे हैं जैसे बुकर सम्मान। किसी भी भाषा के प्रचार-प्रसार या प्रोत्साहन के लिए नागरिक, सरकार आदि सभी को साथ मिलकर काम करना है, और लगातार काम करना है।

मुख्य वक्ता डा. मैथिली पी. राव, बेंगलूरु से शिक्षाविद एवं स्वतंत्र अनुवादक ने विषय की विशिष्टता को प्रकाशित करते हुए करते हुए कन्नड के ख्यात कवि राष्ट्रकवि श्री कु. वें. पु,  द्वारा रचित कर्नाटक के राज्य गीत का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि “भारत जननी की पुत्री कर्नाटक माँ की जय हो!” और इस संपूर्ण कविता में कवि ने अनेक संतों, मनीषियों, साहित्य, प्राकृतिक संपदा आदि की समृद्धि का उल्लेख करते हुए प्रत्येक अनुच्छेद में दिखाया है कि इन सभी विषयों में किस प्रकार भारत की परंपरा को कर्नाटक ने सुदृढ एवं समृद्ध किया है। यही कर्नाटक एवं कन्नड की शक्ति है कि अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व का निर्माण करते हुए भी उसने अपने आप को भारत का एक अंग बनाया है, भारत की सभी परंपराओं को आगे बढाया है एवं भारत को और अधिक शक्ति प्रदान की है।

यह सत्र युगपुरुष एस. एल. भैरप्पा को समर्पित था। दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार, तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार। कबीरदास की इस उक्ति को प्राय: कन्नड के ख्यात लेखक ऐस. एल भैरप्पा (1931–2025) ने आत्मसात करते हुए उसी आशय के साथ अपने जीवन एवं साहित्य की रचना की। पद्मभूषण एवं पद्मश्री जैसे सम्मानों के अलावा अनेक महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित भैरप्पा जी सिर्फ़ एक महान उपन्यासकार नहीं थे; वे एक सभ्यतागत विवेक थे। 1958 में पहली बार प्रकाशित ‘भीमकाय’ से शुरू करके, भैराप्पा ने पांच दशकों से ज़्यादा के करियर में चौबीस उपन्यास लिखे। कन्नड़ में लिखते हुए भी पूरे भारत से जुड़े, वे उन दुर्लभ रचनाकारों में से एक हैं जिनका जीवन और साहित्य अविभाज्य हैं। अपनी सोच में महाकाव्य और भावना में अडिग, भैरप्पा एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो तब तक बनी रहेगी जब तक भारत खुद पर विचार करता रहेगा।

एस.एल. भैरप्पा के उपन्यास धर्म (नैतिकता) और राष्ट्र (देश/सांस्कृतिक पहचान) के जटिल मेल को दर्शाते हैं, अक्सर पारंपरिक हिंदू मूल्यों की तुलना आधुनिकता, दूसरी संस्कृतियों और समकालीन भारतीय राजनीति से करते हैं।  महाकाव्यों की पुनर्कल्पना, कथा शैली एवं विषयों की श्रृंखला, ईमानदारी एवं अनुशासन को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। संक्षेप में, भैराप्पा अपने व्यापक तथ्यात्मक शोध, गहन दार्शनिक जांच और सम्मोहक कहानी कहने के अनूठे मेल के लिए जाने जाते हैं, जो पाठकों को इतिहास, संस्कृति और मानव अस्तित्व के बारे में जटिल सवालों का सामना करने के लिए मजबूर करता है।

          सत्र का संचालन डॉ. सुधा कुमारी, प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय ने किया और संयोजक थीं सुश्री नर्मदा कुमारी, वरिष्ठ अनुवादक, भारतीय लेखा विभाग।

रिपोर्ट प्रस्तुति- डा. मैथिली पी. राव, बेंगलूरु।

सत्र दक्षिण भारतीय भाषाएं तेलुगु – कन्नड़ मलयालम – परंपरा और विकास की दिशाएँ –

संदर्भ हिंदी से अंतर्संबंध सत्र – समर्पित – स्वर्गीय एस. एल. भैरप्पा

स्थान – दर्शनम्‌ – 1 सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

सत्र दिनांक  -10  जनवरी,  2026

समय- 02:00 से 03:30 बजे तक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »