अंतरराष्ट्रीय बहुभाषी कवि सम्मेलन (रिपोर्ट)

कवि, वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कृत श्री कृष्ण राव  ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में वैश्विक हिन्दी परिवार समेत अन्य आयोजकों के इस कार्यक्रम की सराहना की। विशेषत: इस प्रकार के काव्य-पाठ के माध्यम से समरसता एवं सौहार्द के संदेश को प्रतिपादित करने के प्रति अपनी प्रशंसा को व्यक्त किया। सभी कवियों एवं उनकी रचनाओं की भी प्रशंसा करते हुए उन्होंने उनका संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया। भारतीय कविता के सौंदर्यशास्त्र के बारे में विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने दर्शकों को इस महत्वपूर्ण तथ्य के प्रति सचेत किया कि भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार ध्वनि, लय और अर्थ  समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने कहा कि कविता का सार उसका सौंदर्य है। पण्डितराज जगन्नाथ ने ‘रसगंगाधर’ में इस लक्षण ’रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’ के अनुसार रमणीय अर्थ से तात्पर्य ‘लोकोत्तर आह्लादजनक’ ज्ञान से है, वह ज्ञान जो अलौकिक आनंद की रसानुभूति कराता है। लेकिन उस सौंदर्य के अलग-अलग अर्थ होते हैं। हर संघर्ष का अपना सौंदर्य होता है। एक कवि वह देख सकता है जो सूरज भी अनुमान नहीं लगा सकता । उनके अनुसार कोई भी विषय कविता के लिए अयोग्य नहीं होती है।

सत्र का प्रारंभ करते हुए डॉ. मैथिली ने अध्यक्ष एवं सभी कवियों का स्वागत किया। इस सत्र में कुल 13 कवि थे जिन्होंने 12 भारतीय भाषाओं में अपनी काव्य-रचना प्रस्तुत की।

डॉ. नजम इक़बाल  (उर्दू),  डॉ सुधा कुमारी (कन्नड़),   डॉ. धीरज सरकार (बंगाली)   सुश्री तरिंदर कौर (पंजाबी), डॉ सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ (तेलुगू), डॉ. शिवप्रसाद पी (मळयाळम), डॉ रत्नोत्तमा दास  (असमिया), सुश्री इंद्रा टेकचंदानी (सिंधी), डॉ. वी. अनंती (तमिळ), सुश्री शर्मिष्ठा बर्मन (असमिया), सुश्री शांतला किरण (कन्नड़), सुश्री आभा झा (मैथिली) एवं श्री अप्परसु कृष्ण राव  ने काव्य पाठ के साथ  अध्यक्षीय उद्बोधन भी प्रस्तुत किया।

डॉ.  सुधा कुमारी (कन्नड) ने गीत के रूप में अपनी कविता को प्रस्तुत करते हुए आपरेशन सिंदूर के प्रति एक भावभीनी कविता प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने देश के वीर सिपाहियों, राष्ट्र-गौरव एवं स्वाभिमान की भावनाओं को जागृत किया।  सुश्री तरिंदर (पंजाबी) की कविता का शीर्षक था ’जिन्दगी’  जिसने “ज़िंदगी” शब्द के गहरे को प्रकाशित किया। जो तुरंत बीते हुए पलों की यादें ताज़ा कर देता है और आत्मा में दबी भावनाओं को बाहर निकालता है। ज़िंदगी को एक अजीब इत्तेफ़ाक के तौर पर दिखाया गया है – कभी-कभी अजनबियों को सब कुछ बना देती है, और कभी-कभी सब कुछ अनजान लगने लगता है। यह कुछ लोगों को मौत की याद दिलाती है और उन्हें हर पल को पूरी तरह से जीना सिखाती है, जबकि दूसरे लोग ज़िंदगी की कीमत समझे बिना धीरे-धीरे खुद को खो देते हैं। आखिर में, कवि को एहसास होता है कि ज़िंदगी की असली कीमत समझना ही आखिरकार यह सिखाता है कि सच में कैसे जिया जाए। डॉ. सुरेश कुमार ‘उर्तृप्त’(तेलुगु) की कविता ने उत्तर आधुनिक परिप्रेक्ष्य में हुए मानवीयता के ह्रास की एक ज्वलंत कहानी सुनाई। कहानी का शीर्षक है ‘इमोशनल आई सी यु’ । कहानी एक सरकारी अस्पताल में शुरू होती है, जहाँ पीतांबर चौबे भर्ती हैं, यह सोचकर कि अपने आखिरी दिनों में इलाज करवाते समय उनके पैसे बचेंगे। शुरू से ही, डॉक्टर यह स्पष्ट कर देते हैं कि अस्पताल के सख्त, बेजान सिस्टम में भावनाओं की कोई जगह नहीं है। जब चौबे की मौत हो जाती है, तो उनकी गर्भवती पत्नी संध्या टूट जाती है, लेकिन अस्पताल का सिस्टम बिना रुके चलता रहता है। हेड नर्स शांता, संध्या को तुरंत बिस्तर साफ़ करने का आदेश देती है। नर्स, डॉक्टर और यहाँ तक कि सफ़ाई कर्मचारी भी संध्या के दुख को बेकार का “इमोशनल ड्रामा” कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। स्टाफ़ प्रोटोकॉल, बेड और एफिशिएंसी की भाषा में बात करता है, और इंसान की मौत को रूटीन मेंटेनेंस तक सीमित कर देता है। तेज़ी से अगले मरीज़ के लिए उनका बिस्तर साफ़ किया जाता है। सिस्टम करुणा से ज़्यादा निरंतरता और व्यवस्था को महत्व देता है, जिससे व्यक्तिगत दुख एक प्रशासनिक काम बन जाता है। यह कहानी एक अमानवीय सरकारी सिस्टम को उजागर करती है जो एक ‘इमोशनल आई सी यु’ बनाता है, जहाँ इंसानी भावनाओं को चुपचाप कुचल दिया जाता है और नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। डॉ. रत्नोत्तमा दास जी (असमिया) ने एक लघु कविता सुनाते हुए अपनी भाषा के सौंदर्य पर भी एक संक्षिप्त टिप्पणी दी। विशेष रूप से उन्होंने दर्शकों को सूचित किया कि असमिया में ‘हॉ’ स्वर हर कहीं आता है। उदा. के लिए आकाश – हॉकाश बन जाता है । उनकी कविता का केन्द्रीय भाव यह था कि ठंड या शीत में भी गर्मी होती है। अगर सर्दी आती है तो क्या बसंत दूर हो सकता है । उनकी कविता के अंत में दो शब्द आते हैं – निहाली अर्थात रजाई और ज़ोहर अर्थात दिल। जिसका तात्पर्य यह है कि ठंड चाहे कितनी ही क्यों न हो उसी ठंड के भीतर ताप भी होता है। सुश्री इंद्रा टेकचंदानी ने अपनी सिंधी कविता में श्री राम एवं सीता के मानव सहज प्रतिरूप के प्रति संवेदनशील कविता प्रस्तुत की। कितना सहजता से उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए त्याग एवं तपस्या का उदाहरण दिया इसलिए वो मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनते हुए पूरे संसार के लिए आदर्श पुरुष बने। डॉ. वी. अनंती (तमिळ) कविता सुनाई जिसका अंग्रेजी में शीर्षक था “लैट अस लिव टू” इस कविता आज के समय में इंसानी गतिविधियों से हो रहे प्रकृति के बढ़ते विनाश पर केंद्रित है। जंगल का कटना, पानी के संसाधनों की कमी, और जीवों के रहने की जगहों का खत्म होना दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। इस कविता में, कवि सभी गैर-इंसानी जीवों की आवाज़ में बात करता है। यह प्रकृति की उस खामोश पुकार को ज़ाहिर करती है कि सभी जीवों को जीने का हक है। यह कविता ज़ोर देकर बताती है कि इंसान विकास के नाम पर प्रकृति का कैसे शोषण कर रहे हैं। यह हमें इस सच्चाई की याद दिलाती है कि प्रकृति के बिना इंसानी जीवन मुमकिन नहीं है। पेड़, मिट्टी, पानी, जानवर और पक्षी, सभी की रक्षा करनी चाहिए। यह कविता खासकर आने वाली पीढ़ियों के लिए चिंता दिखाती है। यह इस बात पर ज़ोर देती है कि प्रकृति की रक्षा करना एक ज़िम्मेदारी है, कोई पसंद नहीं। कविता एक दिल को छू लेने वाली अपील, ज़िम्मेदारी की भावना और एक मज़बूत इरादे के साथ खत्म होती है ताकि एक ऐसी दुनिया बनाई जा सके जहाँ आने वाली पीढ़ियाँ साँस ले सकें, जी सकें और मुस्कुरा सकें।  सुश्री शर्मिष्ठा बर्मन (असमिया)  ने नारी शक्ति के आधार पर एक कविता पाठ किया था, कविता का शीर्षक था “बन तू चिता की आग” नारी को खुद की लड़ाई खुद को ही करनी पड़ेगी, इस प्रेरणादायक संदेश को कविता के माध्यम से प्रकट किया। । कन्नड की कवयित्री सुश्री शांतला किरण ने ‘ब्रह्मत्’ नामक एक ‘विडंबना कविता’ सुनाई जो एक थकी हुई आत्मा पर लिखी गई है। वह दुनिया के हंगामे से थककर और रोज़ाना की नाकामियों से डरकर, नाटकीय ढंग से सब कुछ छोड़कर अपने कृष्ण जनेऊ के साथ ब्रह्म ज्ञान की तलाश में जंगल चला जाता है। लेकिन इसके बाद जो होता है, वह दिव्य शांति से ज़्यादा मज़ेदार गड़बड़ होती है—उसका मन बार-बार परिवार वालों, उनकी आदतों, उनकी समस्याओं और उनकी ज़िंदगी की कभी न खत्म होने वाली कहानियों की तरफ भटकता रहता है, जो गहरे ध्यान में भी उसे अकेला नहीं छोड़ते। ज्ञान पाने की हर कोशिश उन ज़िम्मेदारियों के ख्यालों से मज़ेदार तरीके से बाधित होती है, जिनसे उसे लगा था कि वह बच गया है। आखिर में ज्ञान, मुस्कुराते हुए आता है: उसे एहसास होता है कि इन्हीं समस्याओं को सुलझाना ही उसका सच्चा ब्रह्म ज्ञान है। त्याग से नहीं, बल्कि सच्चाई से ज्ञान पाकर, वह खुशी-खुशी जंगल की अपनी खोज छोड़ देता है और घर लौट आता है, यह समझते हुए कि ब्रह्मत्व ज़िंदगी से भागने में नहीं, बल्कि हंसते हुए उसे अपनाने में है। सुश्री आभा झा (मैथिली) ने सबसे पहले पाँती यानि पत्र पर केन्द्रित एक मधुर छंद प्रस्तुत किया ।  उनकी दूसरी रचना का शीर्षक था ‘उर्मिला’ जिसमें लक्ष्मण की धर्मपत्नी,  उर्मिला के विरह-वेदना, त्याग, तप और समर्पण का सुन्दर वर्णन किया गया है।  सत्र का अंत हुआ श्री अप्परसु कृष्ण राव जी की तेलुगु कविता ’नाको कोत्त पेरू वचिंदी’ अर्थात ‘अम्मा, मुझे एक नया नाम मिला है’ जो एक लड़की की आवाज़ में अपनी माँ (“अम्मा”) को संबोधित करते हुए कही गई एक शक्तिशाली विरोध कविता है। इस समाज में एक महिला को अक्सर बलात्कार और हत्या के बाद ही नाम, पहचान और सम्मान मिलता है – जब वह जीवित होती है तब नहीं। निर्भया और दिशा जैसे नाम व्यक्तिगत नाम नहीं हैं; वे समाज और मीडिया द्वारा बलात्कार और हत्या की गई महिलाओं को दिए गए लेबल हैं। कविता सवाल करती है कि एक महिला महत्वपूर्ण क्यों बनती है, वह भी तब जब उसे नष्ट कर दिया जाता है। निर्भया (2012) और दिशा (2019) मामलों की पृष्ठभूमि में लिखी यह कविता दर्द, अन्याय को दर्शाती शक्तिशाली और भावनात्मक तेलुगु कविता है । इस प्रकार के क्रूर अपराधों के बाद की स्थिति को दर्शाती  यह कविता दिखाती है कि किस प्रकार से पीड़ितों की व्यक्तिगत पहचान मिटा दी गई थी, और राष्ट्र ने उन्हें प्रतीकात्मक “नए नाम” देकर शोक व्यक्त किया। यह समाज की अंतरात्मा और उस देश में नामों के अर्थ पर सवाल उठाती है जहाँ हर महिला की सुरक्षा अनिश्चित है। इस संपूर्ण सत्र का संचालन एवं संयोजन डॉ. मैथिली एवं सुश्री तरिंदर ने किया।

सत्र – अंतरराष्ट्रीय बहुभाषी कवि सम्मेलन

स्थान – उमंग सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

सत्र दिनांक – 10 जनवरी,  2026 समय – 6:00 से आरम्भ

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