प्रमुख रचनाओं का नाट्य पाठ (रिपोर्ट)

अन्तरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन के दूसरे दिन ‘समवेत’ सभागार के भव्य प्रांगण में ‘प्रमुख रचनाओं का नाट्य पाठ’ विषय पर आयोजित यह विशेष सत्र केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शब्दों की शक्ति और अभिनय की बारीकियों का एक अनूठा अनुष्ठान था। इस गरिमामयी आयोजन ने सिद्ध कर दिया कि साहित्य जब अपनी लिखित सीमाओं को तोड़कर रंगमंच की आभा से जुड़ता है, तो वह केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि साक्षात जिया जाता है।

सत्र की अध्यक्षता देश के प्रख्यात साहित्यकार, मनीषी और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने की। डॉ. निशंक, जिनके चिंतन में भारतीय संस्कृति की जड़ें और लेखनी में वैश्विक चेतना का वास है, ने अपने अध्यक्षीय संबोधन से सत्र की वैचारिक भूमिका तैयार की। सत्र की महत्ता तब और बढ़ गई जब इसमें अंतरराष्ट्रीय फलक के नक्षत्रों का आगमन हुआ। विशिष्ट अतिथि के रूप में ऑस्ट्रेलिया से पधारी प्रख्यात रचनाकार रेखा राजवंशी और सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजेश चेतन ने मंच की शोभा बढ़ाई। इन विभूतियों की उपस्थिति ने इस बात पर मुहर लगा दी कि भारतीय साहित्य आज अपनी भौगोलिक सीमाओं को लाँघकर ‘विश्व-संस्कृति’ का रूप ले चुका है। आयोजन का केंद्रबिंदु वे छह नाट्य प्रस्तुतियाँ रहीं, जिन्होंने अपनी शिल्पगत सुंदरता और भाव-प्रवणता से सभागार में उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सबसे पहले मंच पर डॉ.रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की बहुचर्चित कृति ‘वो जरूर लौटेगा’ का नाटकीय मंचन हुआ । इस सामूहिक नाट्य पाठ का उत्तरदायित्व अनुराग वर्मा, सुधांशु श्रीवास्तव, कंचन गौतम और अभिषेक राठौर की टीम ने संभाला। इस प्रस्तुति की विशेषता कलाकारों के बीच का वह अद्भुत लयबद्ध तालमेल था, जहाँ एक का संवाद दूसरे की भावना को पूर्ण कर रहा था। यह कहानी विश्वास और उस शाश्वत प्रतीक्षा की है, जो मानवीय जिजीविषा को जीवित रखती है। अनुराग और सुधांशु के गंभीर स्वरों ने जहाँ संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार की, वहीं कंचन गौतम और अभिषेक की भावुक अदाकारी ने दर्शकों के दिलों को भीतर तक भिगो दिया। मंच पर बिना किसी बाहरी तामझाम के, केवल आवाज़ों के उतार-चढ़ाव और चेहरों के भावों से इन कलाकारों ने एक ऐसा अदृश्य संसार रचा कि दर्शकों को ‘लौट आने की वह उम्मीद’ साक्षात् अनुभव होने लगी।

इसके उपरांत, सुविख्यात कहानीकार और कवि अनिल जोशी की दार्शनिक रचना ‘विसर्जन’ का एकल वाचन प्रारंभ हुआ। इसे अपनी आवाज़ के जादू से सजाया युवा अभिनेता संकल्प जोशी ने। संकल्प की प्रस्तुति अभिनय कला की एक ‘मास्टरक्लास’ की भाँति थी। उन्होंने शब्दों के अर्थ को केवल बोला नहीं, बल्कि उन्हें अपने शारीरिक हाव-भाव और श्वासों की गति से संप्रेषित किया। ‘विसर्जन’ जैसी गंभीर रचना, जो जीवन के मोह, मुक्ति और अंततः त्याग की बात करती है, उसे संकल्प ने एक आध्यात्मिक प्रवाह प्रदान किया। जब उन्होंने रचना के अंतिम अंशों को पढ़ा, तो सभागार में व्याप्त सन्नाटा स्वयं एक संवाद बन गया। यह प्रस्तुति इस बात का जीवंत उदाहरण थी कि एक अकेला अभिनेता यदि शब्द के मर्म में डूब जाए, तो वह पूरे जनसमूह को एक ध्यानस्थ अवस्था में ले जा सकता है।

संध्या की तीसरी कड़ी के रूप में ब्रिटेन स्थित प्रतिष्ठित रचनाकार दिव्या माथुर की कृति ‘जुनून’ का मंचन हुआ। इस रचना को व्यंग्यकार आचार्य राजेश कुमार ने अपनी विशिष्ट और पैनी वाचन शैली में प्रस्तुत किया। राजेश कुमार ने एक मंझे हुए किस्सागो की तरह कहानी का अर्थ खोला। दिव्या माथुर की यह रचना प्रवासी भारतीय जीवन के अंतर्द्वंद्व, वहां की महानगरीय जड़ता और जड़ों की ओर लौटने की छटपटाहट को दर्शाती है। राजेश कुमार ने लेखिका की संवेदनाओं को अपने व्यंग्यात्मक लहजे के साथ इस तरह घुला-मिला दिया कि श्रोता कभी मुस्कुराते तो कभी गहरी सोच में डूब जाते। उन्होंने सात समंदर पार की ठंडी आबोहवा और वहां बसने वाले भारतीय मन की गर्माहट को बड़ी कुशलता से श्रोताओं के समक्ष रखा।

साहित्य की इस बहती धारा में ऑस्ट्रेलिया से पधारीं  रेखा राजवंशी की कृति ‘रज्जो की रजामंदी’ ने मानवीय संबंधों की एक नई और संवेदनशील परत खोली। इस रचना के माध्यम से उन्होंने वैश्विक परिवेश में भारतीय संस्कारों और रिश्तों की गरिमा को बड़ी ही सरलता किंतु गहराई के साथ दर्शकों के समक्ष रखा। उनकी लेखनी का सहज प्रवाह श्रोताओं को एक ऐसे संसार में ले गया जहाँ मूक रजामंदी भी बहुत कुछ कह जाती है।

​इसी क्रम में, प्रतिष्ठित रचनाकार अलका सिन्हा की मर्मस्पर्शी रचना ‘शापमुक्त’ का नाट्य पाठ संपन्न हुआ। ब्रिटेन से आई तितिक्षा की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने  ‘शापमुक्त’ के पात्रों की आंतरिक पीड़ा और उनकी मुक्ति के संघर्ष को एक जीवंत रंगमंचीय स्वरूप प्रदान किया।

​कार्यक्रम के अंतिम चरणों में रचनाकार एवं कुशल उद्घोषक प्रतिबिंब शर्मा ने अपनी स्वयं की कृति ‘संघम शरणम्’ का वाचन किया। चूँकि लेखक स्वयं ही वाचक की भूमिका में थे, इसलिए रचना की मूल संवेदना और उसका उद्देश्य सीधे दर्शकों के अंतर्मन तक पहुँचा। उनकी विशिष्ट वाचन शैली ने रचना में निहित संदेश को एक दार्शनिक और वैचारिक ऊँचाई प्रदान की।

इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने भारतीय मुख्यधारा के साहित्य और प्रवासी भारतीय साहित्य के बीच के फासलों को पाट दिया। नाट्य पाठ की इस विधा ने यह प्रमाणित किया कि संप्रेषण के लिए केवल शब्द पर्याप्त नहीं होते, उनमें प्राण फूँकने के लिए कलात्मक दृष्टि की भी आवश्यकता होती है।

समापन के बाद सभागार से निकलते हुए दर्शकों के चेहरों पर एक तृप्ति का भाव था—जैसे वे केवल एक कार्यक्रम देखकर नहीं, बल्कि एक गहरी आत्मानुभूति लेकर लौट रहे हों। ‘समवेत’ की वह संध्या वास्तव में साहित्य के उत्सव की संध्या थी, जहाँ शब्द, स्वर और अभिनय ने मिलकर एक अमर स्मृति की रचना की।

रिपोर्ट – प्रखर शर्मा

त्र – प्रमुख रचनाओं का नाट्य पाठ

स्थान – समवेत सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

सत्र दिनांक – 09 जनवरी 2026

समय 6:30 से 7:30 बजे तक

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