गद्य रचनाओं का पाठ (रिपोर्ट)

दिल्ली की उस धुंधली शाम में जब शब्दों ने अपनी चमक बिखेरी, तो साहित्य का आकाश उमंग‘ की रोशनी से जगमगा उठा। यह आयोजन केवल गद्य का पाठ नहीं था, बल्कि भावनाओं का एक ऐसा पवित्र संगम था जहाँ सात समंदर पार की संवेदनाएं और स्वदेश की मिट्टी की महक एक साथ मिल रही थीं।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध योगाचार्य डॉ. धनंजय ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्य की आत्मा को जिस तरह छूआ, वह अद्भुत और अनुपम था। डॉ. धनंजय ने गद्य की बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कविता अगर हृदय की धड़कन है, तो गद्य उस हृदय का विस्तार है। उन्होंने योगा विद्या  के अपने गंभीर अनुभवों को साहित्य की संवेदनात्मक शक्ति के साथ पिरोकर एक ऐसा कोलाज बनाया जिसे सुन कर हर कोई मंत्रमुग्ध था। उन्होंने मुख्य अतिथि से लेकर अंतिम वक्ता तक की रचनाओं का सारगर्भित विश्लेषण किया। विशेष रूप से जब उन्होंने शानदार शेरों का पाठ किया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। उनके शब्दों में एक ऐसी चुंबकीय शक्ति थी जो श्रोताओं को चिंतन के गहरे सागर में ले जा रही थी। डॉ. धनंजय ने जोर देकर कहा कि आज के खंडित समय में साहित्य ही वह सेतु है जो मनुष्यता को बचाए रख सकता है। उन्होंने समकालीन कविता और गद्य की प्रासंगिकता पर विचार रखते हुए सभी रचनाकारों की प्रशंसा की। उनका संबोधन एक ऐसी रचनात्मक ऊर्जा का संचार कर गया, जिसने नई दृष्टि और नई चेतना का निर्माण किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री इंद्रजीत शर्मा (हरिद्वार, उत्तराखंड) जी का संबोधन किसी रूहानी अनुभव की तरह था। उन्होंने हरिद्वार की पवित्र धरती पर अपने और अपने पूज्य पिता द्वारा किए जा रहे सेवा कार्यों की जो दास्ताँ सुनाई, उसने सबके अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। शर्मा जी ने बड़ी ही दरियादिली से यह ऐलान किया कि हरिद्वार आने वाले किसी भी अतिथि के लिए हमारे द्वार सदैव खुले हैं, जहाँ सेवा और सत्कार का कोई मूल्य नहीं लिया जाएगा। इसके बाद जब उन्होंने लल्लू नामक पात्र की रोमांचक संस्मरण सुनाया, तो वातावरण में एक अलग ही कौतुक छा गया। उनके अनुभवों में जीवन का वह सत्य छिपा था जो बड़ी-बड़ी किताबों में भी नहीं मिलता।

विशिष्ट अतिथि श्रीमती वंदना यादव ने जब मंच संभाला, तो उनकी वाणी में सरस्वती का वास-सा प्रतीत हुआ। उन्होंने स्त्री सशक्तीकरण पर जो रचना पढ़ी, वह महज शब्द नहीं थे, बल्कि समाज की सोई हुई चेतना को जगाने वाला एक प्रचंड शंखनाद था। उन्होंने नारी के अस्तित्व, उसके संघर्ष और उसकी असीम संभावनाओं को जिस मार्मिकता से उकेरा, वह सीधे कलेजे में उतर गया। वंदना जी की रचना में जहाँ एक ओर कोमल संवेदनाओं का दरिया था, वहीं दूसरी ओर अन्याय के विरुद्ध वज्र सा प्रहार भी था। उनकी अभिव्यक्ति इतनी सशक्त थी कि सभागार में उपस्थित प्रत्येक नारी की आँखों में गौरव की चमक और पुरुषों के मन में सम्मान का भाव जाग उठा। उनकी प्रस्तुति ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब स्त्री अपनी कलम उठाती है, तो वह केवल लिखती नहीं, बल्कि युग का भाग्य बदलती है।

सत्र के वक्ताओं ने अपनी विधाओं से साहित्य के आकाश में इंद्रधनुष बिखेर दिए: • उगते सूर्य के देश जापान से आए डॉ. वेदप्रकाश ने जापान के एक विचित्र कीट की कहानी सुनाकर सबको कौतुक से भर दिया। उनकी प्रस्तुति ज्ञान का अनमोल मोती थी। • निर्देश निधि (दिल्ली) ने कहानी के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना कि हर श्रोता उस कहानी का हिस्सा बन गया। उनकी शैली बेमिसाल थी। • व्यंग्यकार रामकिशोर उपाध्याय (दिल्ली) ने अपनी धारदार भाषा से विसंगतियों पर ऐसे बाण छोड़े कि लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो गए। उनका व्यंग्य घाव करे गंभीर वाला था। • ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ के संयोजकों में एक डॉ. बरुण कुमार (दिल्ली) ने वरंगल के संस्मरण से इतिहास की धूल झाड़कर उसे वर्तमान के सामने खड़ा कर दिया। उनकी प्रस्तुति अतीत का दर्पण थी। • डॉ. अरुणा अजितसरिया (ब्रिटेन) ने जब प्रसिद्ध कथाकार दिव्या माथुर को संप्रेषित किए गए पत्रों का पाठ किया, तो लगा जैसे स्मृतियों के बंद झरोखे खुल गए हों। उनकी भाषा में अपूर्व माधुर्य था। • अर्चना पेन्यूली (डेनमार्क) ने वृद्धों के प्रेम की जो हृदयस्पर्शी गाथा सुनाई, उसने यह साबित कर दिया कि प्रेम कभी बूढ़ा नहीं होता। उनकी कहानी ने सबको भावुक कर दिया। • शैलेंद्र अस्थाना (बिहार) ने बिहार की बौद्धिक विरासत को समेटे हिंदी साहित्य के भविष्य पर जो चिंतन रखा, वह खरी-खरी और बेहद प्रभावशाली था।

सत्र के सफल और शानदार संपादन का श्रेय डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ को जाता है। जब उन्होंने अपना व्यंग्य किताबों की अंतिम यात्रा सुनाया, तो पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया। यह व्यंग्य नहीं, बल्कि उन किताबों की मार्मिक सिसकी थी जो आज के डिजिटल युग में उपेक्षित हैं। उनके शब्दों ने हर पाठक के जमीर को झकझोरा। उनके व्यंग्य ने यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर किताबें नहीं रहेंगी, तो मनुष्य की संवेदनाओं का क्या होगा?

कार्यक्रम के अंत में संयोजक डॉ. सुरेंद्र सिंह रावत ने सबका आभार व्यक्त किया। उन्होंने स्वयं भी एक मर्मस्पर्शी कहानी सुनाकर श्रोताओं के दिलों को छू लिया। श्रोताओं के लिए यह आयोजन आजीवन स्मृति का खजाना बन गया।

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