‘भारतीय भाषा संगम 2.0’ का प्रथम-सत्र ‘भारतीय भाषा संगम 2.0’ का प्रथम-सत्र ( विषय : विकसित भारत का सांस्कृतिक आधार-स्त्रोत: एक विमर्श )

गुजरात साहित्य अकादमी एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘भारतीय भाषा संगम २.०’ का प्रथम सत्र राष्ट्र के सर्वांगीण उत्थान में सांस्कृतिक चेतना की भूमिका को रेखांकित करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण सत्र रहा। कार्यक्रम के प्रथम सत्र की शुरुआत भारतीय भाषा मंच के श्री अनिल जोशी की प्रस्तावना से हुई, जिन्होंने विषय का आधार रखते हुए यह प्रतिपादित किया कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके आर्थिक संकेतकों से कहीं अधिक उसकी सांस्कृतिक जड़ों की मजबूती से मापी जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकसित भारत का स्वप्न केवल भौतिक सुविधाओं का विस्तार मात्र नहीं है, बल्कि यह अपनी समृद्ध भाषाई और दार्शनिक विरासत को पुनर्जीवित करने का एक सामूहिक प्रयास है। उनके अनुसार, जब तक भारतीय समाज अपनी मौलिक पहचान और भाषाओं के प्रति गौरव का भाव जागृत नहीं करेगा, तब तक विकास की अवधारणा अधूरी रहेगी। वे कहते हैं कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है बल्कि भाषा हमारी पहचान भी है, इसके लिए नई पीढ़ी को अपनी भाषा के लिए जागरूक करना होगा। उन्होंने अपनी कविता ‘भटका हुआ भविष्य’ का उद्धरण देते हुए अपनी बात को और अधिक स्पष्ट तरीके से रखा।
विमर्श को अकादमिक और ऐतिहासिक गहराई प्रदान करते हुए विशिष्ट वक्ता प्रो. सत्यकेतु सांकृत (डॉ. बी. आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) ने भारतीय इतिहास के उन स्वर्णिम पृष्ठों की ओर ध्यान आकृष्ट किया जहाँ भारत ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर रहा था। उन्होंने तर्क दिया कि हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति और जीवन मूल्य ही वे आधार-स्रोत हैं जो भविष्य के विकसित भारत को एक नई दिशा दे सकते हैं। वे कहते हैं कि आधुनिकता और परंपरा का तालमेल बहुत आवश्यक है, इसके साथ ही वे ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’, अटल बिहारी वाजपेई जी की कविताओं आदि का उद्धरण देकर अपनी बात को और पुष्ट किया। इसी क्रम में साहित्य अकादमी के सदस्य श्री नरेंद्र पाठक ने साहित्य और संस्कृति के अटूट संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य ही वह दर्पण है जिसमें राष्ट्र अपनी आत्मा का दर्शन करता है। उन्होंने बल दिया कि ‘विकसित भारत’ की यात्रा में हमारे कवियों, ऋषियों और चिंतकों का योगदान सर्वोपरि है, क्योंकि उनके द्वारा रचित विचार ही समाज को नैतिक और चारित्रिक बल प्रदान करते हैं। उन्होंने स्टोरीटेलिंग ऐप का जिक्र किया तथा सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की बात की।
सत्र के मुख्य वक्ता, ‘ऑर्गनाइजर’ पत्रिका के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने अपने ओजस्वी संबोधन में इस विमर्श को एक बौद्धिक परिप्रेक्ष्य दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वर्तमान समय में भारत को पश्चिमी मानकों पर स्वयं को सिद्ध करने के बजाय अपने ‘स्व’ (Self) के बोध को जागृत करना चाहिए। श्री केतकर के अनुसार, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से मुक्ति और अपनी परंपराओं पर अडिग विश्वास ही वह शक्ति है जो भारत को पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन करेगी। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़कर ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करें।
कार्यक्रम के समापन सत्र में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री ने संपूर्ण चर्चा को एक सूत्र में पिरोया। उन्होंने अत्यंत प्रभावी ढंग से यह बात रखी कि भारत की पहचान उसकी सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना में निहित है, जो आज के अशांत विश्व के लिए एकमात्र समाधान है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि विकसित भारत का मॉडल विदेशी उधार का नहीं, बल्कि स्वदेशी संस्कारों का प्रतिफल होना चाहिए। इस अत्यंत गरिमामयी और ज्ञानवर्धक सत्र का संचालन डॉ भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, शंभाजी नगर की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. विशाला शर्मा द्वारा किया गया। उन्होंने न केवल वक्ताओं के विचारों का सूत्रधार बनकर समन्वय किया, बल्कि अपनी विश्लेषणात्मक टिप्पणियों से विमर्श की गुणवत्ता को और अधिक बढ़ाया, जिससे यह सत्र एक सार्थक और दूरगामी चिंतन का केंद्र बन सका।

रिपोर्ट – प्रखर शर्मा

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