‘भारतीय भाषा संगम 2.0’ का द्वितीय-सत्र ( विषय: विकसित भारत के निर्माण में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम मेधा (AI) का भारतीय भाषाओं के साथ तादात्म्य )

खेल, युवा एवं सांस्कृतिक प्रवृत्ति विभाग, गुजरात; शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास; गुजरात साहित्य अकादमी तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘भारतीय भाषा संगम 2.0’ के अंतर्गत द्वितीय सत्र का आयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण और समसामयिक विषय पर किया गया। सत्र का प्रारंभ सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के स्वागत के साथ हुआ, जिससे एक सकारात्मक और संवादात्मक वातावरण का निर्माण हुआ।
प्रस्तावना
सत्र की प्रस्तावना डॉ. मोतीलाल (भारतीय भाषा मंच) द्वारा प्रस्तुत की गई। उन्होंने भारतीय भाषाओं और प्रौद्योगिकी के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए यूनिकोड, अनुवाद टूल्स (जैसे अनुवादनी) तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि आज के वैश्विक व्यापार और प्रशासनिक ढांचे में ERP (Enterprise Resource Planning) जैसे सिस्टम में भारतीय भाषाओं का समावेश आवश्यक है। वित्तीय क्षेत्र, ई-गवर्नेंस तथा विभिन्न वेबसाइट्स में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि यदि तकनीक में भारतीय भाषाओं का समुचित उपयोग नहीं होगा, तो विकसित भारत की परिकल्पना अधूरी रह जाएगी।
विशिष्ट वक्ता – 1
श्री बुद्ध चंद्रशेखर (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद, नई दिल्ली) ने अपने वक्तव्य में वैश्विक स्तर पर प्रकाशित पुस्तकों में भारतीय भाषाओं की सीमित उपस्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने ‘अनुवादनी’ जैसे उपकरणों की आवश्यकता और उपयोगिता को रेखांकित करते हुए बताया कि 22 भारतीय भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने के लिए तकनीकी प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कीबोर्ड, फॉन्ट, और भारतीय भाषाओं के लिए विकसित तकनीकी उपकरणों की विशेषताओं को भी विस्तार से समझाया।
विशिष्ट वक्ता – 2
डॉ. सुभाष शर्मा (भाषाविद, ऑस्ट्रेलिया) ने विकसित भारत के निर्माण में भारतीय भाषाओं की भूमिका को सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में महत्वपूर्ण बताया तथा तकनीकी क्षेत्र में भारतीय भाषाओं के उपयोग के लिए ठोस नीतियों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि तकनीक को जनसामान्य तक पहुँचाना है, तो उसे भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
विशिष्ट वक्ता – 3
प्रो. सी. जयशंकर बाबू (पांडिचेरी विश्वविद्यालय) ने भारतीय भाषाओं की संरचना, उनके परिवार और विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय भाषा समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का उल्लेख करते हुए भाषाई विविधता की वैज्ञानिक समझ प्रस्तुत की। साथ ही, उन्होंने फॉन्ट संबंधी समस्याओं और उनके समाधान, तथा प्रौद्योगिकी के माध्यम से भाषाई संसाधनों के विकास की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में भारतीय भाषाओं के महत्व को भी स्पष्ट किया।
विशिष्ट वक्ता – 4
डॉ. राचेल फिलिप (आईआईटी जोधपुर) ने अपने वक्तव्य में तकनीकी संस्थानों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की चुनौतियों और संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि IIT जोधपुर में भारतीय भाषाओं को लेकर विभिन्न पहलें की जा रही हैं। अध्ययन के दौरान भाषा के कारण उत्पन्न बाधाओं को दूर करने के लिए अनुवाद टूल्स और अन्य तकनीकी साधनों का उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया।
मुख्य वक्ता
श्री संक्रांत सानु (लेखक एवं भाषाविद्) ने अपने प्रभावशाली वक्तव्य में कहा कि विकसित राष्ट्र वही बनते हैं, जो अपनी भाषा में ज्ञान-विज्ञान का विकास करते हैं। उन्होंने रूस, फ्रांस और इजराइल जैसे देशों का उदाहरण देते हुए बताया कि इन देशों ने अपनी भाषा के माध्यम से तकनीकी और वैज्ञानिक उन्नति हासिल की है। उन्होंने भारतीय भाषाओं में तकनीकी, चिकित्सा और इंजीनियरिंग शिक्षा को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा इस दिशा में हो रहे प्रयासों का उल्लेख किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन
प्रो. सविता रॉय (प्राचार्या, दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय भाषाओं को शिक्षा के केंद्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि नई पीढ़ी में भारतीय भाषाओं के प्रति उत्साह बढ़ रहा है, और विश्वविद्यालय स्तर पर इनके प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। तकनीकी उपकरणों, कीबोर्ड, सॉफ्टवेयर आदि के माध्यम से भाषाई सशक्तिकरण की दिशा में हो रहे कार्यों की सराहना की।
संचालन एवं सत्र लेखन
सत्र का संचालन डॉ. आलोक कुमार पाण्डेय द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया, जिन्होंने सभी वक्ताओं को समुचित समय और क्रम प्रदान किया। सत्र लेखन का कार्य डॉ. सुमित कुमार मीणा (दिल्ली विश्वविद्यालय) द्वारा किया गया, जिन्होंने पूरे सत्र के विचारों को व्यवस्थित रूप में संकलित किया।
निष्कर्ष
यह सत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विकसित भारत के निर्माण में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम मेधा (AI) का भारतीय भाषाओं के साथ समन्वय अत्यंत आवश्यक है। अनुवाद उपकरणों, यूनिकोड, ERP सिस्टम, तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाकर ही हम तकनीकी विकास को जन-जन तक पहुँचा सकते हैं। भारतीय भाषाएँ केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की आधारशिला हैं।
रिपोर्ट – डॉ. सुमित मीणा
