राही एक सड़क पर
(प्रवासी जीवन, भावनात्मक संघर्ष)
विजय पताका लेकर भागा, दुनिया की इस दौड़ में
कालचक्र की सुधि नहीं थी, यौवन के इस खेल में l
सुख-दुःख का बन्धन तोड़ दिया, संसार को मानो जीत लिया
ईश्वर को पत्थर समझा, मूर्खों का साधन समझा l
बर्फों की चादर पर चलकर, स्वादहीन भोजन खाकर
मित्र-विहीन का दंश झेलकर पश्चिम का एक अंश बन गया,
युवाकाल की हँसी गँवाकर, विज्ञान गणित को गले लगाकर
इस प्रतियोगी दुनिया में अपनी पहचान बना पाया l
क्या खोया, क्या पाया – यह तो एक अनुभूति है
डायरी के संचित पन्नों में कुछ यादगार क्षणों का वर्णन है,
जीवन की बहती धारा में यादों को कौन संभालेगा
लम्बे अरसे के बाद आज विडियो का एक सहारा है l
धन-दौलत के गहरे सागर में अब तैर नहीं पाता हूँ
हीरे-मोती का भार सहन करने से भी घबड़ाता हूँ,
मन का बोझ अधिक भारी है बोल नहीं पाता हूँ
यह दर्द किसे सुनाऊँ – यही खोजने निकला हूँ l
पीछे मुड़कर देखा तो पाया, राही हूँ सुनसान सड़क पर
प्यास लगी तो चिल्लाया, पर सखा न कोई आगे आया
आँखों से आँसू टपक पड़े, पर कोई नहीं समझाने आया
जीवन के इस पड़ाव पर – दुश्मन हो गई अपनी छाया l
आज उसी पत्थर के आगे, भीख माँगने आया हूँ
दे दो मुझको नया पंख, दूर-दूर तक जाना है
क्षितिज पार नगरी है मेरी, वहीं करूँगा स्तुति तेरी
अपनी मिट्टी अपनी धरती, वहीं करूँगा स्तुति तेरी !
(संकेत : विदेशों में अकेलापन, अपनी पहचान की तलाश)
कवि :— डॉ कौशल किशोर श्रीवास्तव
