सनातन की लहरें

(संदर्भ : सामयिक चर्चा, चुनावी माहौल, परिहास)
वर्ष 2024, तिथि 22 जनवरी l अयोध्या में नवनिर्मित भव्य मंदिर में प्रभु राम की प्राण-प्रतिष्ठा l उनकी प्रतिमा के
दर्शनार्थ राम-भक्तों, श्रद्धालुओं तथा आमंत्रित गणमान्य मेहमानों का आगमन; अभूतपूर्व ऐतिहासिक अवसर, विरासत
का पुनर्जन्म l सनातन संस्कृति, सनातन धर्म, हिंदुत्व का उत्कर्ष l प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्राण प्रतिष्ठा का
अनुष्ठान संपन्न, जय श्री राम का सर्वत्र उद्घोष l राजनैतिक विरोधियों द्वारा समारोह का वहिष्कार, चुनाव प्रचार के
लिए धार्मिक आयोजन का आरोप, मीडिया में आरोप प्रत्यारोप की बाढ़, …. l लाखों पुरुष और महिलाओं द्वारा कई
दिनों तक रामलला के दर्शन, अद्भुत उत्साह का प्रदर्शन l राम की जन्मभूमि अयोध्या मशहूर धर्मस्थली बन गयी l
इसी वातावरण में चुनावी सभा का एक दृश्य l पाँच वर्षों बाद भारतीय लोक सभा का चुनाव, लोकतंत्र का महापर्व
तीन-चार महीनों में संपन्न होगा, राजनीतिक पार्टियों में हलचल l कांग्रेस पार्टी और सहयोगी दलों का सम्मेलन, मोदी
विरोध मुख्य मुद्दा, नीतियों की उपेक्षा l
सभागार में नेताओं का आगमन हो चुका था, विरोधी पक्ष के प्रभावी युवा नेता की प्रतीक्षा थी l आपसी गुफ़्तगू का
सिलसिला जारी था, हल्का-फुलका वाद-विवाद, उत्साह और चिंतन दोनों का समावेश l थोड़ी देर में युवा नेता ने
सभागार में प्रवेश किया, उनके आगे-पीछे सशस्त्र अंगरक्षकों की अच्छी संख्या थी, तालियों की गूँज से उनका स्वागत
हुआ l मंच संचालक द्वारा विषय प्रवेश और सभा की कार्यवाही के औपचारिक वर्णन के पश्चात सर्वप्रथम युवा नेता ने
सभा को संबोधित किया l

“मैं कई सप्ताहों से देश भ्रमण पर था, कन्या कुमारी से कश्मीर तक आम जनता के संपर्क में था l इन्हीं दिनों,
ख़ासकर राम मंदिर के उद्घाटन के पश्चात, मुझे ‘सनातन संस्कृति’ और ‘सनातन धर्म’ जैसे शब्दों से परिचय हुआ l क्या
इनका संबंध हिंदू धर्म से है? हिंदुत्व से है? या कोई नया धर्म है? ‘जय श्री राम’ के साथ-साथ कुछ लोग ‘सनातन धर्म
की जय’ का नारा लगा रहे थे, ऐसा क्यों?”
सभागार में शांति थी, चुप्पी का आलम था l स्थिति की समीक्षा करते हुए युवा नेता ने पुनः कहा, “शायद इस
प्रश्न का सीधा उत्तर देना कठिन हो इसलिए अपनी बात स्पष्ट करता हूँ l वर्षों से हम मुख्यतः हिंदू, मुस्लिम और ईसाई
धर्म की चर्चा करते रहें हैं, इन्हें चुनावी अस्त्र की तरह इस्तेमाल भी करते रहे हैं l किंतु यह सनातन क्या है? क्या आने
वाले चुनाव पर इसका कोई प्रभाव होगा?”
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षित एक विद्वान ने कहा : “सनातन शव्द का सामान्य अर्थ है अनन्त अर्थात्
जिसकी न शुरुवात है और न अन्त l अंग्रेज़ी भाषा में इसके लिए ‘इटरनल (eternal)’ या ‘सीज़लेस (ceaseless)’
शब्द उपयुक्त हैं l सनातन का उदाहरण प्रकृति हो सकती है, जो परिवर्तनशील होते हुए भी शाश्वत है, अनन्त है;
जिसमें पूरी सृष्टि समाहित है l दूसरा उदाहरण ईश्वर हैं जो अनन्त हैं, अजन्मा हैं, अनश्वर हैं, अदृश्य हैं, सर्वत्र हैं l
ईश्वर आस्था के प्रतीक हैं; उनके अस्तित्व को न तो प्रमाणित किया जा सकता है और न नकारा जा सकता है l
लेकिन मानवीय धरातल पर जब हम सनातन धर्म या सनातन संस्कृति की बात करने हैं तो इसे भारतीय जीवन
पद्धति के परिपेक्ष्य में देखा जाता है l धर्म मानव सृजित है; धर्म ने मानव का सृजन नहीं किया है l सभ्यता के विकास
के साथ धर्मों की स्थापना भी हुई : जैसे ईसाई धर्म ~2020 वर्ष पूर्व और इस्लाम धर्म ~1400 वर्ष पूर्व l पौराणिक
काल में, जिसमें वैदिक काल ~8,000 – 10,000 वर्ष पूर्व शामिल है, भारतीय महाखंड में जीवन पद्धति कैसी थी,
सामाजिक मान्यताएँ कैसी थी, धार्मिक विश्वास कैसा था, इत्यादि प्रश्न आज भी ज्वलंत हैं l प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ
‘रिग वेद’ (ऋग्वेद ,1500 ई.पू.) में भगवान राम का वर्णन है जो हिंदुओं के परम आराध्य हैं l वैदिक काल से
जीवन्त धर्म को ‘सनातन धर्म’ का स्थान दिया गया है, प्रभु राम उसके केंद्र में हैं l”
उन्होंने पुनः कहा, “अयोध्या राम की जन्मभूमि है, वहाँ भव्य राम-मंदिर का निर्माण सनातन धर्म के पुनर्जागण का
संदेश देता है, सांस्कृतिक विरासत को उजागर करता है l आधुनिक मीडिया ने इस संदेश को घर-घर पहुँचाने में
अभूतपूर्व भूमिका निभायी है, सनातन की लहरें चारों दिशाओं में फैल गयी हैं l एक अर्थ में सनातन संस्कृति राष्ट्रवाद
से जुड़ गई है l इसका प्रभाव चुनावों पर पड़ना अप्रत्याशित नहीं है l”
किसी नेता ने प्रश्न किया, “चुनाव से सनातन धर्म या संस्कृति का क्या संबंध? चुनाव तो समकालीन पद्धति है,
वर्तमान समाज की रीढ़ है, संविधान में स्थापित नियमों के अनुसार होते हैं l क्या सबों के लिए सनातन धर्म का
अनुयायी होना आवश्यक है?”
“कदापि नहीं l धार्मिक विश्वास व्यक्तिगत है, भारत में धार्मिक आज़ादी है l यहाँ कई धर्मों के लोग रहते हैं, चुनाव
में हिस्सा लेते हैं, राम मंदिर बनने के बाद भी उनका मताधिकार बना रहेगा l”
एक दूसरे नेता ने कहा, “कोई प्रमाण है कि राम की जन्मभूमि अयोध्या है? बाल्मीकि और तुलसीदास द्वारा रचित
रामायण एक सशक्त कहानी है, राम एक काल्पनिक पात्र हो सकते हैं l फिर उनके जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता l”
“इस तर्क का मेरे पास कोई उत्तर नहीं है l राम और रामायण की कथा कई देशों में प्रचलित है, जिसमें मुस्लिम देश
भी शामिल हैं l क्या सभी मनगढ़ंत हैं? काल्पनिक हैं?”
सभा में थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गयी l कई लोग आपस में सलाह-मशविरा भी कर रहे थे l
थोड़ी देर के पश्चात एक दूसरे विद्वान ने मंच सम्भाला, “रामायण में राम और सीता का समान महत्व है, सियाराम
शब्द इसी का सूचक है; सनातन संस्कृति में दोनों पूज्य हैं l यदि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो सीता विशिष्ट गुणों की
आदर्श प्रतिमूर्ति हैं l क्या सीता भी एक काल्पनिक पात्र हैं? क्या उनके जन्म का कोई ऐतिहासिक प्रमाण है? या
किंवदंती ही पर्याप्त है? सीता और राम समकालिक हैं; यदि सीता का जन्म मान्य है तो राम का भी होगा l अर्थात्
दोनों सजीव पात्र हैं, या दोनों काल्पनिक पात्र हैं l”
एक उत्साही नेता बोल पड़े, “हमें सीता के जन्मस्थान पर ध्यान देना चाहिए l यदि हम अयोध्या प्रकरण से कुछ
दिन दूर रहें तो राजनीतिक प्रहार से भी बचेंगे l आने वाले चुनाव के लिए नयी ऊर्जा भी संचित कर सकेंगे l
रामायण के अनुसार सीता का जन्म धरती के गर्भ से हुआ था, बिलकुल असामान्य और अद्भुत l कथा के अनुसार
मिथिलावासी राजा जनक के राज्य में भयानक सूखा पड़ा था, अन्न की भारी कमी थी l ऋषि मुनियों की सलाह पर वे
स्वयं खेत जोतने के लिए गये ताकि इंद्र भगवान प्रसन्न होकर शीघ्र वर्षा दें l जैसे ही उनके हल की नोक ज़मीन के
भीतर गयी, एक बालिका प्रकट हो गई जिसका नाम सीता हुआ l राजा जनक अति हर्षित हुए, उनके लिए यह एक
अभूतपूर्व ईश्वरीय वरदान था l”

युवा नेता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “सुझाव अच्छा है, इसमें नयापन है l इसके लिए मैं एक समिति का गठन
करता हूँ जिसमें दो इतिहासकार, एक सामाजिक कार्यकर्ता, और एक अनुभवी नेता होंगे l समिति उस स्थान का पता
लगाएगी जहाँ से सीता प्रकट हुई थीं, और इस संदर्भ में प्रचलित दन्त कथाओं तथा ऐतिहासिक तथ्यों का भी आकलन
करेगी l यथाशीघ्र समिति अपना गोपनीय रिपोर्ट मेरे समक्ष रखेगी l” आज की सभा समाप्त हुई l
दो सप्ताह बाद l समिति के सभी सदस्य रिपोर्ट के साथ युवा नेता के ऑफिस में मौजूद थे l इतिहासकार ने उपरोक्त
स्थान चिन्हित कर लिया था, आसपास के इलाक़ों के कई इतिहासकारों का मंतव्य भी रिपोर्ट में शामिल था l
विवेचना के पश्चात निर्णय हुआ कि समिति के सदस्य निर्धारित तिथि पर वहाँ पहुँचेंगे और युवा नेता चिन्हित स्थान
पर हल चलाएँगे l प्रोग्राम गोपनीय रहेगा, युवा नेता दो दिन पहले से सात्विक भोजन करेंगे, पारंपरिक वस्त्र पहनेंगे l
एक दिन पहले रात्रि में हम वहाँ पहुँचेंगे, अगले दिन प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में कार्य संपन्न होगा l हल का प्रबंध वहाँ के
एक स्थानीय किसान करेंगे जिसके लिए अग्रिम धनराशि मिलेगी; इसकी ज़िम्मेदारी सामाजिक कार्यकर्ता की होगी l”
आज वह दिन था l प्राची आकाश में अरुणिमा थी, मंद पवन की शीतलता थी, वातावरण मनोहर था l युवा नेता
ने कंधे पर हल उठाया और उसकी नोक को ज़मीन के अंदर घुसाया l तभी एक आवाज़ हुई “इस पवित्र स्थल को दूषित
मत करो l लोभ-रहित शुद्ध अंतरात्मा वालों को भगवान वरदान देते हैं l” सबों को आश्चर्य हुआ और भय का एहसास
भी ! संयमित होकर युवा नेता ने दूसरा प्रयास किया l लेकिन पुनः वही आवाज़ ! एक इतिहासकार ने कहा,
“पौराणिक कथाओं में ‘आकाशवाणी’ की चर्चा तो मिलती है लेकिन ‘पृथ्वीवाणी’ की नहीं l दूसरे ने कहा, “मैंने पूरी
घटना की रिकॉर्डिंग कर ली है, भविष्य में चिंतन के लिए l” अनुभवी नेता ने धीरे से कहा, “सनातन की जीत हुई l”

लेखक :— डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव

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