हम मिलें आमने-सामने – ( लेखक – डॉ कौशल किशोर श्रीवास्तव )

(बृद्धावस्था, सामयिक चिंतन)

खुशी की खोज में मैं करवटें बदलता हूँ
मैं कोई संगीतकार या कवि नहीं हूँ
और नहीं हूँ शब्दों का जाल बिछाता लेखक
जो बनाते हैं कृत्रिम हर्ष का भव्य महल l

मैं कोई दार्शनिक भी नहीं हूँ
और नहीं हूँ कोई विचारमग्न व्यक्ति
जो स्व-रचित काल्पनिक दुनिया में घूमते हैं,
मैं तो एक साधारण बुजुर्ग आत्मा हूँ
जिसे इस यथार्थ संसार में खुशी की खोज है l

मेरी उम्र में हँसी संकुचित है
कहीं यह कमजोर हड्डियों और नसों में
दर्दनाक तनाव न पैदा कर दे,
बिताया हर्षमय समय याद करना मुश्किल है
क्योंकि डिमेंशिया का झोंका प्रबल है,
मुझे आनन्दमय स्वप्न भी नहीं आते
क्योंकि गहरी नींद की भारी कमी है l

बुजुर्गों को खुशी मिलती है
आमने-सामने मिलकर बातचीत करने से
अपनी यादों को बाँटने से, अनवरत गुफ्तगू से
हलके-फुलके विवादों से, विचारशील क्षणों से l
यदि आप सहमत हैं
तो आएँ और हम मिलें आमने-सामने l

नास्ता के टेबुल पर
मेरा दोस्त है एक गूँगा समाचारपत्र
जब कि टेलीविज़न पर रहता है एकालाप, सड़क पर, बाजार में, बगीचे और मैदान में
कभी-कभी हो पाता है केवल “हाय या हेलो”
व्यर्थ लगता है फेसबुक या ट्वीटर पर वार्तालाप l

क्षीण हो गई है वाक्-चतुराई और बौद्धिक शक्ति
हो रही है ज़िन्दगी से विरक्ति,
चिकित्सक कहते हैं मुझे हो गया है डिप्रेशन
परन्तु देते नहीं कोई प्रिस्क्रिप्शन l
मुझे जरुरत है एक वाचाल चेहरे की
यदि आप सहमत हैं
तो आएँ और हम मिलें आमने-सामने l

(सन्दर्भ: बढ़ती उम्र की सामाजिक समस्या)

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