प्रभु का ध्यान – ( प्रभु का ध्यान – ( लेखक – डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव )
(आत्मिक चिंतन, अधूरे प्रश्न)
प्रभु, मैं कैसे ध्यान करूँ?
अपने मन के भावों को कैसे तुम्हें बताऊँ
श्रद्धा भक्ति के गीतों को कैसे तुम्हें सुनाऊँ व्याथापूर्ण वाणी को कैसे तुम तक पहुँचाऊँ?
मन्दिर के कोलाहल में ध्यान-योग तो दुर्लभ है
दान-दक्षिणा का व्यापार पूजा-पाठ पर भारी है
हवन-यज्ञ के वैश्वीकरण में
शामिल हैं ज्ञानी पंडित और धूर्त पाखंडी
मैं ज्ञानी को कैसे पहचानूँ?
नतमस्तक होकर प्रभु तेरे आगे
मन ही मन पुष्प चढ़ाऊँl
तुम्हें खोजने मैं पहुँचा गिरजाघर में
दरवाजे पर प्रहरी ने पूछा,
“कैथोलिक हो या प्रोटेस्टेंट?
मेथोडिस्ट या युनाईटिंग?”
इतनी बड़ी परीक्षा देना मेरे वश के बाहर था
उलटे पैरों मैं भाग पड़ा
और पहुँचा एक मस्जिद में
शिया और सुन्नी का झगड़ा सुनकर
मैं छुप गया एक कोने में
दिल की धड़कन तेज हुई
मैं पड़ गया बड़ी मुश्किल मेंl
तुम्हें खोजने मैं पहुँचा गुरुद्वारा
पर द्वारपाल ने रोक दिया
और सिर ढकने का फ़रमान दे दिया,
“यदि पगड़ी नहीं, तो रुमाल चलेगा
अन्यथा प्रवेश वर्जित होगा l”
मैं बोला “सत (सत्य) श्री अकाल”
और चल पड़ा बाजार की ओर,
आया था प्रभु तुम्हें खोजने
पर खोज रहा हूँ एक रुमाल !
आज प्रभु मैं विचलित हूँ
क्या तेरा आँगन भी भेदभाव का स्थल है?
जब मानव ने जन्म लिया था
तेरा ही अंश सबों में था
अनन्त प्रेम, निर्मल चरित्र, जीवन रक्षा का
बीज सबों में डाला था
किन्तु इन बीजों के नाजुक पौधों में
भेदभाव का रोग लग गया,
अब कैसे इन्हें बचाएँ –
एक बड़ा ही प्रश्न बन गया l
धर्मों के सभी पुजारी तेरी महिमा गाते हैं फिर भी उन पौधों को सींच नहीं पाते हैं l
प्रभु, मैं कैसे ध्यान करूँ?
तेरे आँगन का अमृत फल मैं कैसे चख पाऊँ
श्रद्धा भक्ति के गीतों को कैसे तुम्हें सुनाऊँ?
कैसे तुम्हें पुकारूँ ! कैसे ध्यान करूँ !!
(संदर्भ : सामयिक चिंतन, धार्मिक द्वंद्व)
