“पहाड़ों मे पगडंडी”- जे. पी. पाण्डेय ( पुस्तक समीक्षा )

यात्रा-वृत्तांत साहित्य की वह विधा है जिसमें लेखक अपनी यात्राओं के अनुभवों, दृश्यों, लोगों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों का सजीव वर्णन करता है। इसमें यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, बल्कि ज्ञान, संवेदना और आत्मानुभूति की प्रक्रिया बन जाती है। लेखक बाहरी संसार के साथ-साथ अपने भीतर की भावनाओं, जिज्ञासाओं और विचारों को भी अभिव्यक्त करता है, इसलिए इसमें तथ्य और व्यक्तिगत अनुभव का संतुलित मेल दिखाई देता है। यह विधा प्रायः गद्य में लिखी जाती है और इसकी भाषा सरल, चित्रात्मक तथा प्रवाहपूर्ण होती है। इसमें किसी स्थान की प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और जनजीवन का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया जाता है कि पाठक स्वयं को उस यात्रा का सहभागी महसूस करने लगता है। इसी कारण यात्रा साहित्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज, इतिहास और संस्कृति को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी बन जाता है। विश्व और भारतीय साहित्य में यात्रा-वर्णन की परंपरा बहुत पुरानी रही है और आधुनिक काल में यह एक स्वतंत्र तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक विधा के रूप में विकसित हुई है। हिंदी साहित्य में भी कई लेखकों ने अपने भ्रमण के माध्यम से विविध समाजों और संस्कृतियों का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। यात्रा साहित्य का महत्व इस बात में निहित है कि यह विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करता है, इतिहास और भूगोल की जानकारी देता है तथा पाठकों में जिज्ञासा, साहस और नए अनुभवों के प्रति उत्साह जगाता है। आधुनिक समय में डिजिटल माध्यमों के बावजूद साहित्यिक यात्रा-वृत्तांत का महत्व बना हुआ है, क्योंकि यह केवल स्थानों का वर्णन नहीं, बल्कि मनुष्य और संसार के संबंधों का संवेदनशील और ज्ञानवर्धक चित्र प्रस्तुत करता है।
विश्व इतिहास के फलक पर यात्रा वृत्तांत की जड़ें हेरोडोटस के ‘इतिहास’ से लेकर ह्वेनसांग की ‘सी-यू-की’, इब्न बतूता की ‘रिहला’ और मार्को पोलो की विश्व-विख्यात यात्राओं तक फैली हुई हैं। हिंदी साहित्य में इस समृद्ध परंपरा का विधिवत सूत्रपात भारतेंदु युग से हुआ, जहाँ स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से ‘हरिद्वार’, ‘लखनऊ’, ‘जबलपुर’, ‘सरयूपार की यात्रा’, ‘वैद्यनाथ की यात्रा’ और ‘जनकपुर की यात्रा’ जैसे वृत्तांतों को अपनी विशिष्ट रोचक, सजीव एवं व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया। इसी कालखंड में प्रताप नारायण मिश्र (‘विलायत यात्रा’), श्रीमती हरदेवी (‘लंदन यात्रा’), दामोदर शास्त्री (‘मेरी पूर्व दिग्यात्रा’, 1885) और देवी प्रसाद खत्री (‘रामेश्वर यात्रा’, 1893) ने परिचयात्मक एवं स्थूल वर्णन की परिपाटी को विस्तार दिया।
स्वतंत्रता-पूर्व युग में इस विधा ने गुणात्मक प्रगति की, जहाँ बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने ‘पृथ्वी प्रदक्षिणा’ (1924) में विश्व का चित्रात्मक वर्णन किया और स्वामी सत्यदेव परिव्राजक ने ‘मेरी कैलाश यात्रा’ (1915), ‘मेरी जर्मन यात्रा’ (1926) एवं ‘यात्रा मित्र’ (1936) के माध्यम से यात्रा साहित्य के महत्त्व को प्रतिस्थापित किया। इसी दौर में विदेशी यात्रा-विवरणों की श्रेणी में कन्हैयालाल मिश्र की ‘हमारी जापान यात्रा’ (1931), रामनारायण मिश्र की ‘यूरोप यात्रा के छः मास’ और मौलवी महेशप्रसाद की ‘मेरी ईरान यात्रा’ (1930) विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे। किंतु इस विधा के वास्तविक ‘जनक’ और ‘पितामह’ राहुल सांकृत्यायन सिद्ध हुए, जिन्होंने ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘रूस में 25 मास’, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘यात्रा के पन्ने’, ‘जापान, ईरान, एशिया के दुर्गम खंडों में’ तथा ‘वोल्गा से गंगा’ जैसी कालजयी कृतियों और अपने सैद्धांतिक ग्रंथ ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ (1948) के माध्यम से यात्रा कला को वैज्ञानिक एवं साहित्यिक गरिमा प्रदान की।
स्वातंत्र्योत्तर युग में यात्रा साहित्य में वैचारिकता और शिल्प के नए प्रयोग हुए। अज्ञेय ने ‘अरे यायावर रहेगा याद’ (1953) और ‘एक बूँद सहसा उछली’ (1960) के माध्यम से बाह्य यात्रा को ‘आंतरिक खोज’ में रूपांतरित किया। इसी काल में रामवृक्ष बेनीपुरी ने ‘पैरों में पंख बाँधकर’ (1952) व ‘उड़ते चलो उड़ते चलो’, यशपाल ने ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’ (1953), भगवतशरण उपाध्याय ने ‘कलकत्ता से पेकिंग तक’ (1953) व ‘सागर की लहरों पर’ (1959), तथा प्रभाकर माचवे ने ‘गोरी नज़रों में हम’ (1964) के माध्यम से प्रगतिशील दृष्टि साझा की। साथ ही काका कालेलकर (‘हिमालय की यात्रा’, ‘यात्रा का आनंद’), नागार्जुन (‘यात्रा के पन्ने’) और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (‘मेरी यात्राएँ’) ने इस विधा को सांस्कृतिक और दार्शनिक आधार दिया। मोहन राकेश की ‘आखिरी चट्टान तक’ (1953) ने दक्षिण भारतीय जीवन को नाटकीय रोचकता के साथ उभारा, तो निर्मल वर्मा ने ‘चीड़ों पर चाँदनी’ (1964) में यूरोपीय संस्कृति और इतिहास को सहज गद्य के बिम्बों में अमर कर दिया। वर्तमान समय में भी यह परंपरा अनुराधा बेनीवाल (‘आज़ादी मेरा ब्रांड’), अनुराग चतुर्वेदी (‘पृथ्वी गंधमयी तुम’), अभिषेक श्रीवास्तव (‘कच्छ कथा’), श्रीप्रकाश शुक्ल (‘देस देस परदेस’, 2023) और जे.पी. पाण्डेय (‘पगडंडी में पहाड़’, 2022) जैसे रचनाकारों के माध्यम से जीवंत और निरंतर प्रवाहित हो रही है।
हिंदी यात्रा साहित्य बाह्य जगत से अंतर्मन की खोज है।यायावरी मनुष्य की आदिम और नैसर्गिक प्रवृत्ति है; मानव सभ्यता के विकास की गाथा वास्तव में उसके निरंतर गतिशील होने की ही कहानी है। हिंदी साहित्य में इस विधा को शास्त्रीय गरिमा प्रदान करने का श्रेय महापंडित राहुल सांकृत्यायन को जाता है, जिन्हें निर्विवाद रूप से इस विधा का जनक स्वीकार किया जाता है। उन्होंने अपने कालजयी ग्रंथ ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ में यात्रा को एक वैज्ञानिक आधार देते हुए स्पष्ट किया कि श्रेष्ठ यात्रा साहित्य वह है, जिसमें केवल भौगोलिक स्थानों का स्थूल वर्णन न हो, बल्कि कालखंड और समय के प्रवाह का भी सजीव चित्रण हो। सांकृत्यायन के अनुसार, एक यात्री की दृष्टि सामान्य विवरणों से ऊपर उठकर शुद्ध साहित्यिक बोध तक विस्तारित होनी चाहिए। यात्रा की इस अवधारणा को दार्शनिक गहराई प्रदान करते हुए अज्ञेय ने इसे एक ‘आंतरिक अन्वेषण’ माना। उनका मानना था कि यात्राएँ केवल भौतिक सीमाओं को लांघने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अंतर्मन की ओर ले जाने वाली पगडंडियाँ भी हैं। उनके लिए यात्रा वृत्तांत केवल संस्मरण नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की एक प्रक्रिया है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी पथिक बनता है, किंतु एक सृजनात्मक रचनाकार ही अपने जीवंत अनुभवों को शब्दों में पिरोकर ‘यात्रा साहित्य’ का सृजन कर पाता है। इस साहित्य का मूल उद्देश्य लेखक और पाठक के बीच अनुभवों का साझा सेतु निर्मित करना है, जो न केवल नवीन स्थलों के भ्रमण की प्रेरणा देता है, बल्कि वहां की प्राकृतिक सुषमा, सामाजिक ताने-बाने, सांस्कृतिक विविधता और जनमानस की चेतना से भी हमारा परिचय कराता है। अतः यात्रा साहित्य भौगोलिक सीमाओं से परे वैश्विक संवेदनाओं को समझने की एक झरोखा है।
आधुनिक हिंदी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत की विधा ने पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय विस्तार और परिपक्वता प्राप्त की है। आरंभिक समय में यात्रा-वृत्तांत का स्वरूप मुख्यतः किसी स्थान के परिचय, प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन और लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित रहता था। धीरे-धीरे यह विधा अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जुड़ती गई। आज यात्रा-साहित्य केवल स्थान परिवर्तन का विवरण भर नहीं रह गया है, बल्कि यह मनुष्य, प्रकृति और समाज के जटिल संबंधों को समझने का एक सृजनात्मक माध्यम बन चुका है। इसी परिप्रेक्ष्य में जे.पी. पाण्डेय की कृति “पगडंडी में पहाड़” समकालीन हिंदी यात्रा-साहित्य की एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में सामने आती है। यह पुस्तक हिमालयी प्रदेश, विशेषकर उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन, प्रकृति के वैभव और वहाँ के लोक-संस्कारों को केवल दृश्यात्मक स्तर पर प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक और दार्शनिक अर्थों में भी समझने का प्रयास करती है।

9 अप्रैल 1976 को छत्तीसगढ़ के भिलाई में जन्मे जे.पी. पाण्डेय भारतीय रेलवे कार्मिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, जिनका व्यक्तित्व प्रशासनिक दक्षता और साहित्यिक संवेदनशीलता का अनूठा संगम है। वर्तमान में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत जे.पी. पाण्डेय ने कविता, कहानी और यात्रा वृत्तांत जैसी विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ‘दरिया के दो पाट’ जैसे काव्य-संग्रह के लिए प्रशंसित और ‘अखिल भारतीय रेल हिंदी पुरस्कार’, ‘डॉ. भीमराव आंबेडकर साहित्यिक सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार’ जैसे पुरस्कारों से सम्मानित लेखक ने अपनी नवीनतम कृति ‘पगडंडी में पहाड़’ में हिमालय के सौंदर्य और वहां के चुनौतीपूर्ण जीवन का दार्शनिक चित्रण किया है। इस पुस्तक में वे मखमली बादलों और झरनों की मनमोहक छटा के साथ-साथ भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं और पर्वतीय जीवन की कठोरता को भी शब्दबद्ध करते हैं। मसूरी से लेकर चारधाम और परी-टिब्बा तक की इस यात्रा में लेखक पाठकों को केवल भूगोल की ही नहीं, बल्कि दुर्गम हिमालयी अंचलों के मानवीय और सांस्कृतिक दर्शन की भी सजीव सैर कराते हैं।
‘पगडंडी में पहाड़’ की विषय सूची में शामिल अध्याय क्रमशः पहाड़ों की रानी मसूरी, झड़ीपानी-फॉल, संगम-फॉल, मॉसी-फॉल, शिखर-फॉल एवं राजपुर रोड, गलोगी पावर हाउस एवं भट्टा-फॉल, परी टिब्बा, विनोग-टॉप और जबरखेत नेचर रिजर्व से आरंभ होते हैं। इसके उपरांत लेखक मसूरी में एक दिन-नाग मंदिर से बुद्ध मंदिर तक, भद्रराज मंदिर, मसूरी के पार खट्टा पानी, सुरकंडा एवं धनौल्टी और सहस्त्रधारा तक के अनुभवों को साझा करते हैं। यात्रा का यह क्रम कुमाऊँ दर्शन, चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहेब एवं फूलों की घाटी और अंततः नाग टिब्बा के विस्तृत वर्णन के साथ पूर्ण होता है। अठारह अध्यायों में विभक्त यह कृति मसूरी की धुंधभरी वादियों से लेकर हेमकुंड साहिब की पवित्रता और फूलों की घाटी के प्राकृतिक वैभव तक का एक ऐसा मानचित्र खींचती है, जिसमें इतिहास, लोक-मान्यताएं और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियां साथ-साथ चलती हैं। लेखक का हिमालय दर्शन केवल एक पर्यटक की उत्सुकता भर नहीं है, बल्कि यह उन प्राचीन मूल्यों की खोज है जहां आध्यात्मिकता और प्रकृति का संगम होता है।
इस सृजनात्मक सफ़र के पहले अध्याय में लेखक जे.पी. पाण्डेय हमें बताते हैं कि देहरादून से मसूरी जाते समय रास्ते में एक प्राचीन शिव मंदिर पड़ता है जिसकी बहुत मान्यता है। यात्री वहाँ रुककर भगवान शिव के दर्शन करते हैं। मंदिर की साफ-सफाई और दान न लेने की व्यवस्था विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। दर्शन और प्रसाद ग्रहण कर यात्री नए उत्साह के साथ आगे की यात्रा पर बढ़ जाते हैं। यथा–“हम भी भगवान शिव का आशीर्वाद लेने उतर पड़े। मंदिर मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। मंदिर की साफ-सफाई देखकर हम दंग रह गए, इसके अलावा हमारा जिस चीज ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया, वह था-यहाँ पर लगा एक बोर्ड। जिस पर लिखा था-मंदिर में किसी प्रकार का दान करना मना है, इसलिए कहीं भी पैसे न चढ़ाएँ। मैंने अपनी तरह का यह पहला मंदिर देखा जहाँ दान देने से मना किया गया है। मंदिर में सुकून के साथ भोलेनाथ जी के दर्शन कर हमने सूजी के हलवे का स्वादिष्ट प्रसाद खाया और नए उत्साह के साथ मसूरी की तरफ आगे बढ़ गए।” (पृ.सं.1)
यह कृति मूलतः यात्रा-वृत्तांत है, किंतु इसकी प्रस्तुति और संरचना इसे सामान्य यात्रा-विवरण से कहीं अधिक अर्थपूर्ण बना देती है। पुस्तक के विभिन्न अध्याय हिमालय के अलग-अलग स्थलों, प्राकृतिक दृश्यों और सांस्कृतिक संदर्भों को केंद्र में रखकर रचे गए हैं। मसूरी, झड़ीपानी फॉल, संगम फॉल, नाग टिब्बा, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी और चारधाम जैसे प्रसिद्ध स्थलों का वर्णन करते हुए लेखक केवल पर्यटन संबंधी जानकारी नहीं देता, बल्कि उन स्थानों से जुड़े इतिहास, लोकविश्वास, सामाजिक जीवन और पर्यावरणीय परिस्थितियों को भी उजागर करता है। इस प्रकार पाठक के सामने हिमालय का केवल प्राकृतिक रूप ही नहीं, बल्कि उसका सांस्कृतिक और मानवीय आयाम भी उद्घाटित होता है।
हिमालय भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीक रहा है। प्राचीन काल से यह पर्वत-श्रेणी केवल भूगोल का हिस्सा नहीं मानी गई, बल्कि आध्यात्मिक साधना, प्रकृति के वैभव और मानवीय धैर्य का प्रतीक भी रही है। जब लेखक इन पर्वतीय अंचलों की यात्रा करता है, तब उसकी दृष्टि मात्र पर्यटक की नहीं होती; वह इन स्थानों की ऐतिहासिकता और सांस्कृतिक अर्थवत्ता को भी समझने का प्रयास करता है। इसी कारण पुस्तक में प्रकृति का चित्रण केवल दृश्यात्मक नहीं, बल्कि संवेदनात्मक भी बन जाता है। झरनों की मधुर ध्वनि, पहाड़ी नदियों का तीव्र प्रवाह, चीड़ और देवदार के सघन वन, बादलों से आच्छादित घाटियाँ और दूर-दूर तक फैली हिमाच्छादित चोटियाँ—इन सबका चित्रण लेखक की भाषा में एक सजीव सौंदर्यबोध का निर्माण करता है।
कृति का शीर्षक भी अत्यंत अर्थगर्भित और प्रतीकात्मक है। ‘पगडंडी’ उस साधारण मार्ग का संकेत है जो कठिनाइयों, श्रम और धैर्य से भरा होता है, जबकि ‘पहाड़’ विशालता, स्थायित्व और चुनौती का प्रतीक है। इन दोनों शब्दों का संयोजन जीवन की उस प्रक्रिया का रूपक बन जाता है जिसमें मनुष्य छोटे-छोटे प्रयासों और संघर्षों के सहारे ऊँचाइयों तक पहुँचता है। इस दृष्टि से यह शीर्षक केवल भौगोलिक यात्रा का संकेत नहीं देता, बल्कि जीवन-दर्शन की एक गहन अनुभूति को भी व्यक्त करता है।
‘पगडंडी में पहाड़’ का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि लेखक की दृष्टि केवल प्राकृतिक दृश्यों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह पर्वतीय समाज के जीवन को भी समझने का प्रयास करता है। पहाड़ों में रहने वाले लोगों का जीवन अनेक कठिनाइयों से घिरा होता है, फिर भी उनमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है। महिलाएँ लकड़ी और पानी का बोझ लेकर खड़ी ढलानों पर चढ़ती-उतरती हैं, बच्चे दूरस्थ विद्यालयों तक लंबी दूरी तय करते हैं और सीमित संसाधनों के बीच भी पूरा समाज जीवन की गति को बनाए रखता है। लेखक इन अनुभवों को गहरी संवेदनशीलता और सम्मान के साथ चित्रित करता है, जिससे पाठक पर्वतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों को निकट से महसूस कर पाता है।
इस यात्रा-वृत्तांत में पर्यावरणीय चेतना का स्वर भी स्पष्ट रूप से उभरता है। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ ने हिमालयी पारिस्थितिकी को कई प्रकार के संकटों के सामने ला खड़ा किया है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, भूस्खलन, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित पर्यटन जैसी समस्याएँ पर्वतीय संतुलन को प्रभावित कर रही हैं। लेखक इन मुद्दों को किसी नारे या उपदेश के रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि अपने अनुभवों और अवलोकनों के माध्यम से पाठक को इन चुनौतियों के प्रति सजग करता है। इस प्रकार यह कृति पर्यावरणीय चेतना का भी एक महत्त्वपूर्ण पाठ बन जाती है। लेखक कुमाऊँ यात्रा में सुमित्रानंदन पंत के जन्मस्थल को तीर्थ समान मानते हुए उनकी स्मृतियों से भावविभोर होता है। कौसानी की प्राकृतिक सुंदरता से प्रभावित पंत की कविता प्रकृति-प्रेम को मानवीय आकर्षण से भी श्रेष्ठ और अधिक मोहक रूप में प्रस्तुत करती है। लेखक प्रकृति के सुकुमार कवि को उद्धृत करता है, “छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,/तोड़ प्रकृति से भी माया,/ बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?/ भूल अभी से इस जग को!/ तज कर तरल तरंगों को,/ इंद्रधनुष के रंगों को,/ तेरे भ्रू भ्रंगों से कैसे बिधवा दूँ निज मृग सा मन?/भूल अभी से इस जग को!” (पृ. सं.115)
‘पगडंडी में पहाड़’ में धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों का वर्णन भी विशेष महत्त्व रखता है। गंगोत्री, हेमकुंड साहिब और अन्य तीर्थस्थलों के प्रसंगों में लेखक आस्था के साथ-साथ प्रकृति और आध्यात्मिक अनुभव के गहरे संबंध को रेखांकित करता है। यहाँ धर्म किसी संकीर्णता या विभाजन का साधन नहीं बनता, बल्कि प्रकृति के प्रति श्रद्धा और मनुष्य के आंतरिक अनुभव का विस्तार बनकर सामने आता है। इस प्रकार कृति में आध्यात्मिकता का स्वर व्यापक, उदार और समावेशी दिखाई देता है।
मसूरी के अंतिम छोर स्थित बुद्ध मंदिर में लेखक ने शांत वातावरण में ध्यान किया। यह अनुभव आंतरिक शांति से जुड़ा है। भगवान बुद्ध के उपदेश आज भी विश्व में शांति, करुणा और सद्भावना के प्रसार के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं, जो मानवता को संतुलन और सहअस्तित्व का मार्ग दिखाते हैं। यथा–
“हैप्पी वैली से आगे मसूरी के अंतिम छोर पर बुद्ध मंदिर है। हमने भी भगवान बुद्ध का आशीर्वाद प्राप्त किया। हम कुछ देर तक शांति से आँखें मूँदे भगवान बुद्ध का ध्यान करते रहे। भगवान बुद्ध के संदेश विश्व में शांति एवं सद्भावना की स्थापना में अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।” (पृ.सं. 77)
भाषा और शैली की दृष्टि से भी ‘पगडंडी में पहाड़’ उल्लेखनीय है। लेखक की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और चित्रात्मक है। छोटे-छोटे दृश्यात्मक बिंबों के माध्यम से वह प्रकृति का ऐसा जीवंत चित्र उपस्थित करता है कि पाठक स्वयं को उस यात्रा का सहभागी महसूस करने लगता है। साहित्यिक सौंदर्य और तथ्यात्मक जानकारी के बीच संतुलन बनाए रखना इस शैली की एक प्रमुख विशेषता है। “पगडंडी में पहाड़” में लेखक ने मुख्यतः हिंदी के साथ संस्कृत-निष्ठ शब्दावली, उर्दू-प्रभावित शब्द, तथा कुछ अंग्रेज़ी शब्दों का भी स्वाभाविक प्रयोग किया है, जिससे भाषा सरल, प्रभावपूर्ण और बहुस्तरीय बनती है।
यात्रा-वृत्तांत की इस कृति में दार्शनिक चिंतन का समावेश भी इसे विशेष गहराई प्रदान करता है। यात्रा के दौरान घटित छोटे-छोटे प्रसंग लेखक को जीवन के व्यापक अर्थों पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। साथ चलने वाले यात्रियों का धीरे-धीरे अलग हो जाना उसे इस सच्चाई की याद दिलाता है कि जीवन में संबंध और साथ समय के साथ बदलते रहते हैं। इस प्रकार यात्रा केवल भौगोलिक अनुभव नहीं रह जाती, बल्कि जीवन की परिवर्तनशीलता का प्रतीक बन जाती है।
हिंदी यात्रा-साहित्य की परंपरा में कई लेखकों ने यात्राओं को आत्मबोध और बौद्धिक विस्तार का माध्यम बनाया है। उसी परंपरा की कड़ी के रूप में “पगडंडी में पहाड़” को देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह कृति आधुनिक संदर्भों में यात्रा-वृत्तांत की संभावनाओं को नए रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें प्रकृति का सौंदर्य, लोकजीवन की सादगी, पर्यावरणीय चेतना और दार्शनिक विचार का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।
समग्रतः कहा जा सकता है कि “पगडंडी में पहाड़” समकालीन हिंदी यात्रा-साहित्य की एक सार्थक और महत्त्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक पाठक को केवल हिमालय की यात्रा ही नहीं कराती, बल्कि उसे प्रकृति, समाज और जीवन के पारस्परिक संबंधों को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर भी प्रदान करती है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, सरल अभिव्यक्ति और गहन अनुभव इस कृति को साहित्यिक तथा सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। इसी कारण यह कृति सामान्य पाठकों के साथ-साथ शोधार्थियों और साहित्य के विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी अध्ययन सामग्री के रूप में देखी जा सकती है। हिंदी यात्रा-साहित्य की समकालीन धारा में यह पुस्तक उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जिसमें यात्रा केवल स्थानों की खोज नहीं, बल्कि जीवन और समाज की व्यापक समझ की एक सृजनात्मक प्रक्रिया बन जाती है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने सुप्रसिद्ध निबंध ‘कविता क्या है’ में यात्रा के सार को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि एक सार्थक अन्वेषण के लिए बुद्धि और हृदय का समन्वय अनिवार्य है। उन्होंने अपनी कालजयी कृति ‘[चिंतामणि]’ की भूमिका (निवेदन) में इस वैचारिक यात्रा को अत्यंत सूक्ष्मता से परिभाषित करते हुए लिखा है, “यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि, पर हृदय को भी साथ लेकर। अपना रास्ता निकालती हुई बुद्धि जहाँ कहीं मार्मिक या भावाकर्षक स्थलों पर पहुँची है, वहाँ हृदय थोड़ा-बहुत रमता और अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कुछ कहता गया है। इस प्रकार यात्रा के श्रम का परिहार होता रहा है। बुद्धि-पथ पर हृदय भी अपने लिए कुछ-न-कुछ पाता रहा है।” शुक्ल जी का यह कथन स्पष्ट करता है कि जहाँ बुद्धि मार्ग का संधान करती है, वहीं हृदय उस मार्ग के सौंदर्य और संवेदना को आत्मसात कर यात्रा की थकान को सार्थकता और आनंद में बदल देता है। शुक्ल जी के इन कथनों को चरितार्थ करते हैं “पगडंडी में पहाड़” के यात्री जय प्रकाश पाण्डेय।
“पगडंडी में पहाड़” कृति की आत्मा है मसूरी। अर्थात् मसूरी की जीवटता पूरी कृति में उपस्थित है, “घुमक्कड़-शास्त्र” में इसी जीवटता को यात्रा की जान कहते हैं और “संस्मरण-साहित्य” में रचनात्मक यादें।
समीक्षक :— गोलेन्द्र पटेल
