“युद्ध और स्त्रियाँ”- डॉ.नीना छिब्बर
स्त्रियाॅं चाहे हो
ताकतवर या कमजोर देश की
युद्ध चाहे शीत हो या विध्वंसक
दिन का उजाला हो या घुप अंधेरा
कभी टैंकों की गड़गड़ाहट गूंजे
कभी मिसाइल से दहलता सब
ठोस क्षति आंकी जाए शायद
पर असंभव है आंकना दर्द
जो दोनों ओर की स्त्रियाॅं भोगती हैं
उनके सामने है शवों का अंबार
सड़ी गली लाशों का जखीरा
अधकटे,अधजले शरीर बेहिसाब
धुऑं,आग तपिश चिर मौन
रह गयी वे अकेली बेबस लाचार
दरिंदों के बीच लोलुपता से घिरी
बचाने को अपनी अस्मत रोज है मरती
भरने को बच्चों के पेट कड़ा कर दिल
नुचवाती अपना तन मुठ्ठी भर अन्न खातिर
हर ओर की स्त्रियों की कहानी एक ही है
खूनी आसूओं से सनी।
