स्टैप्लर (व्यंग्य)

बजाज साहब की मेज पर वह बिल्कुल आखिरी कोने में पड़ा रहता था। एक ऐसा अनाम कैदी, जिसकी तरफ कोई मुस्कुराकर देखता भी नहीं था। क्रोमियम की उसकी चमकीली खाल पर अब जंग और धूल की ऐसी परतें जमी थीं, जैसे इस सरकारी दफ्तर के बूढ़े बाबुओं के चेहरों पर मजबूरियों की झुर्रियां होती हैं।

जब भी बजाज साहब का वो भारी, खुरदरा हाथ उसकी पीठ पर पड़ता, उसकी रीढ़ में एक तीखी कराह कौंध जाती। वह अपनी पूरी ताकत समेटकर जोर से चीखना चाहता था, पर उसके मुंह से सिर्फ एक ही आवाज निकलती थी—खट! और उस एक खट के साथ उसकी आंतों से स्टील का एक नुकीला दांत खिंचकर बाहर आता, जो सीधे उन मासूम, कोरे कागजों के सीने को बेरहमी से छेद देता। कागज की वह मूक कराह, उसका रिसता हुआ अदृश्य खून, स्टैप्लर की आत्मा को हर पल छलनी करता था। यह कैसा अभिशाप था कि उसे जिंदा रहने के लिए दूसरों के सीनों में कीलें ठोकनी पड़ती थीं? वैसे हम सब भी तो कॉर्पोरेट के दफ्तरों में यही करते हैं ना, जिंदा रहने के लिए रोज अपनी ही किसी प्यारी उम्मीद का गला घोंटते हैं।

उसे याद आता था वह चमचमाता हुआ बॉक्स, जिसमें वह मखमली गद्दी पर लेटा हुआ इस दफ्तर में आया था। तब उसके भीतर की पिनें कितनी चमकदार, कितनी बेदाग थीं! उसने सोचा था कि वह दो बिछड़े हुए पन्नों को मिलाकर उन्हें एक मुकम्मल प्रेम-कहानी देगा। वह प्यार का धागा बनेगा। लेकिन इस दफ्तर की स्याह हकीकत ने उसे जल्द ही समझा दिया कि वह मिलन का सेतु नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों के बिखरे हुए गुनाहों को एक साथ बांधने वाला एक बेबस कसाई है। हर पिन के साथ उसका अपना एक हिस्सा टूटकर अलग हो जाता था। कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं, उन्हें जबरदस्ती साथ रखने की जिद में आप खुद रोज थोड़े-थोड़े टूटते जाते हैं।

दफ्तर में आज अजीब सी, उदास खामोशी थी। खिड़की से आती धूप की एक पतली सी लकीर सीधे स्टैप्लर के जख्मों को कुरेद रही थी। बगल में रखी गोंद की शीशी बड़े घमंड से मुस्कुरा रही थी। जो बिना किसी दर्द के, बिना कोई घाव दिए, दो पन्नों को जोड़ देती थी। स्टैप्लर अपनी इस नियति पर भीतर ही भीतर रो पड़ा। जोड़ने का काम दोनों का था, पर एक को प्यार मिला और दूसरे को सिर्फ एक हिंसक प्रहार। बजाज साहब ने एक बार फिर उसकी पीठ पर अपनी भारी हथेली का वजन डाला। एक और चीख, एक और घाव। उसकी आखिरी पिन भी खत्म हो चुकी थी। अब उसका पेट खाली था, उसकी आत्मा पूरी तरह खाली हो चुकी थी।

तभी दफ्तर का दरवाजा धड़ाम से खुला। पुलिस की वर्दी में कुछ लोग अंदर दाखिल हुए। बजाज साहब के चेहरे का रंग उड़ चुका था। रिश्वत के उस बड़े मामले की फाइल, जिसे स्टैप्लर ने अपनी आखिरी सांस तक जोड़कर रखा था, अब मेज पर खुली पड़ी थी। बजाज साहब ने घबराहट में अपनी दराज से एक छोटी, काली पिस्तौल निकाली। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई।

बजाज साहब का हाथ बुरी तरह कांप रहा था। पिस्तौल उनके हाथ से छूटकर स्टैप्लर के ठीक बगल में जा गिरी। दोनों लोहे के थे। दोनों का काम छेदना था। लेकिन पिस्तौल की नली से बारूद की जो गंध आ रही थी, उसने स्टैप्लर के भीतर कुछ अजीब सा जगा दिया। बजाज साहब ने हड़बड़ी में पिस्तौल उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर आंखें कहीं और थीं, तो उनका हाथ गलती से स्टैप्लर की जंग लगी पीठ पर जा पड़ा।

एक भयानक, अंतिम खट की आवाज हुई।

कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया। पिस्तौल अपनी जगह बेजान पड़ी रही। बजाज साहब की आंखों में एक शाश्वत शून्यता तैर गई, जैसे उन्हें समझ आ गया हो कि अब किसी पिन की जरूरत नहीं बची थी।  पुलिस ने देखा कि फाइलें बिखरी पड़ी थीं और स्टैप्लर का मुंह हमेशा के लिए बंद हो चुका था। उसके भीतर से अब लोहे की पिन नहीं, बल्कि बजाज साहब की कनपटी से रिसता हुआ गाढ़ा लाल खून आहिस्ता-आहिस्ता बहकर मेज के सफेद सन्माइका को लाल कर रहा था। उस खाली पेट वाले, बिना पिन के स्टैप्लर ने बिना किसी कारतूस के ही व्यवस्था के सबसे बड़े शिकारी को हमेशा के लिए नत्थी कर दिया था। पिस्तौल वहीं अछूती रह गई, पर न्याय किसने और कैसे किया… यह उस खामोश कमरे की दीवारों में आज भी कुछ अनकहा छोड़ गया।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

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