विशेषण (कविता)

एक दिन संज्ञा और सर्वनाम ने
विशेषण का पकड़ लिया गिरेबान!
और चिढ़ाते हुए बोले —
हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम?

विशेषण मुस्कराया !
बोला — संज्ञा बी!
यह सर्वनाम तो तुम्हारा गुलाम है
इसे तो क्या कहूँ!
पर तुम बताओ!
यह जो मैं तुम्हें
बिंदी लिपस्टिक लगाता हूँ
जरी के ज़ेवर पहनाता हूँ
कभी मृगनयनी
और कभी गज़गामिनी बताता हूँ
क्या इन आभूषणों के बिना
तुम जी लोगी?

यह सुनकर संज्ञा मंत्रमुग्ध होने लगी
उसकी देह में गुदगुदी होने लगी
उसने विशेषण को गले लगा लिया
बोली —
हाय मेरे सोनू!
मेरे जानू!
तू तो मेरी जान है!
तेरे बिना यह संज्ञा क्या है!
श्मशान है!

सुन मेरे प्यारे!
तू रोज मुझे
नए -नए विशेषणों से सजाना!
……

पर सुनो!
वो जो आखिर में रहती है न त्रिया
बड़ी तेज है वो *क्रिया
उसके झाँसे में न आना!
वो कितने भी डोरे डाले
आभूषण उस पर न लुटाना!

विशेषण मुस्कराया
बोला — संज्ञा बी!
वो आई थी मुझे फुसलाने
दो चार घंटे की सेवा पाने!
मैं जानता था
तुम औरत हो
दूसरी औरत की सेवा
देख नहीं पाओगी!
सो मैंने
अपने एक स्थिरगति भाई को
उसकी सेवा में लगवा दिया
वह क्रिया की सेवा करेगा
इसलिए नाम उसका
क्रियाविशेषण रखवा दिया!!

यह सुनते ही संज्ञा खिलखिलाई
और फुर्र हो गई!
आतिशबाजी की तरह शुर्र हो गई!!

डॉ. अशोक बत्रा

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