“रफ़ी के सुरों में गूंजती गाडगिल की आवाज़”- स्वरांगी साने

‘दुःख-सुख की हर एक माला, कुदरत ही पिरोती है’ सन् 1981 की फ़िल्म ‘कुदरत’ का यह गीत है, जिसे आर.डी. बर्मन ने संगीतबद्ध किया और फ़िल्म में इसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया। कतील शिफ़ाई लिखित इस गीत में जीवन के सुख-दुःख के चक्र को प्रकृति से जोड़ा गया है। यदि आप एचएमवी से इस गीत को सुनेंगे तो वह मो. रफी की आवाज़ में न होकर चंद्रशेखर गाडगिल की आवाज़ में है, जिसे 4 मार्च 1981 को रिलीज़ किया गया था। रफ़ी का गाया गीत केवल फ़िल्म के साउंड ट्रैक पर ही है, जिसमें तीन पद मिलते हैं जबकि एल पी रिकॉर्ड पर गाडगिल की आवाज़ में यह मूल गीत चार अंतरों का है। यह गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है। मराठी सिनेमा के लिए गाडगिल का नाम जाना-पहचाना है। उन्होंने कई हिंदी फ़िल्मों के गीत भी गाए हैं। शास्त्रीय संगीत के किराना घराने के वे घरानेदार गायक थे। ‘कुदरत’ के ‘दुःख-सुख की हर माला’ गीत में उनकी पहाड़ी आवाज़ की झलक मिलती है। फ़िल्म के निर्माता चेतन आनंद ने इसे फ़िल्म में रफी से गवाया पर जब तीन पद रिकॉर्ड हो जाने के बाद उन्हें पता चला कि इसे पहले गाडगिल गा चुके हैं तो वे रिकॉर्डिंग आधी छोड़ स्टूडियो से चले गए थे। नवोदित गायक की कला दबाना उन्हें मंज़ूर नहीं था।  

इससे जुड़ा किस्सा खुद गाडगिल ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था। उन्होंने बताया कि पंचम दा को यह गाना उनकी आवाज में ही चाहिए था। पंचम दा ने फिल्म के निर्माता- निर्देशक को कई बार इस बारे में कहा। वे रोज चेतन आनंद के कान में कुछ कहते थे और चेतन आनंद हमेशा ना कर देते। ऐसा दो-तीन दिन हुआ। तीसरे दिन चेतन आनंद शायद झल्लाकर ही बोले कौन है, कहाँ है। गाडगिल के शब्दों में, ‘उन तीन दिनों में मुझे बस इतना ही एक वाक्य सुनाई दिया। तब पंचम दा ने मेरी ओर इशारा किया कि यह है वह लड़का। पंचम दा जानते थे कि यह क्षण कभी भी आ सकता है, इसलिए वे रोज मुझे सिटिंग में आने के लिए कहते थे। उनका अनुमान सही था। एकदम तीन दिन के ब्रेन वाश के बाद वह दिन आ गया, जब चेतन आनंद उनकी आवाज़ सुनने के लिए तैयार हो गए। उनके सुनाओ कहते ही पंचम दा ने मुझे गाने के लिए कहा। मैंने ‘बेनाम’, ‘चढ़ता सूरज’ जैसे तीव्र स्वर वाले दो-तीन गीतों के मुखड़े सुना दिए। पंचम दा ने ही मुझे कहा था वे ही गीत मैं गाऊँ। चेतन आनंद के पास एक और सज्जन बैठे थे। मैं चेतन आनंद को पहचान गया पर उस व्यक्ति को पहचान नहीं पाया। तीसरे दिन जब चेतन आनंद ने मुझे दो-तीन गाने सुनाने को कहा, तो मैंने वे गाने सुना दिए और अक्षरक्षः चेतन आनंद थंब देते हुए खड़े हो गए और कह उठे- डन, गाना दे दो इसे। पास बैठे उस व्यक्ति ने मुझे लिखकर देना शुरू किया, तब मुझे पता चला वे कतील शिफ़ाई थे, गीतकार-ग़ज़लकार। जब उन्होंने मुझे वह गाना लिखकर दिया था तब उसके बोल अलग थे कि ‘संसार के सागर में जो भी कोई मोती है’।

‘उस गीत का मीटर कैसा था, उसकी भी एक कहानी है। मुझे यह बताते हुए आज भी तनाव महसूस होता है’। गाडगिल ने बताया कि ‘मैं पंचम दा के सामने बैठा था, मारुती राव कीर और सब बैठे थे। पंचम दा धुन बना रहे थे। जब वे धुन बनाते थे तो उन्हें एक आदत थी कि वे अपने चश्मे में से सबकी ओर देखते थे, इसकी ओर-उसकी ओर, वे सबके चेहरे देखते थे, अपने चश्मे से। उनसे तेज चेहरे पढ़ने वाला मैंने कभी कोई और नहीं देखा, बहुत तेज, बहुत ही तेज, कोई सोच भी नहीं सकता इतना तेज। धुन बनाते हुए इधर उधर देख रहे थे। मैं सामने ही बैठा था। उन्होंने मेरी ओर देखा और हारमोनियम बजाना रोक दिया। मुझे पूछा कि क्या हुआ तुमको? मैं सकते में आ गया कि अरे बाप रे मुझे ही पकड़ लिया, मैं कुछ बोलने को तैयार नहीं था, वे बोले जल्दी बोल ईडियट, क्या हुआ तेरे को। वे प्यार से बोलते थे ईडियट । वे बोले जल्दी बोल,क्या हुआ तेरे को। आज भी सोचते हुए मेरे हाथ-पैर काँप जाते हैं, सांताक्रुज में जो सिटिंग रूम था, उसकी चौथी मंजिल थी और जो मुझे काटो तो खून नहीं था। मुझे लग रहा था यदि मैं बता दूँगा, तो मुझे चौथी मंजिल से नीचे फेंक देंगे। और वह सब मेरे चेहरे पर दिख रहा था। क्या हुआ बताओ। बताए बिना मेरे पास और कोई चारा नहीं था। वे ज़्यादा से ज़्यादा क्या करेंगे, निकाल देंगे, लेकिन अब तो बताना था। मैंने कहा पंचम दा ये जो धुन आप बना रहे हैं, ये पहले आ चुकी है। फिल्म का नाम ‘हमशक्ल’, आपका ही संगीत है- ‘बनके तितली’, उसकी धुन भी ऐसी ही जा रही है ‘संसार के सागर में, जो भी कोई मोती, कुदरत ही उसे पिरोती है’। यह कहते हुए मेरा चेहरा उतर गया था। मेरे जीवन का पहला ही गीत और यह सब हो रहा था। उन्होंने मेरी ओर देखा, गुस्से से तो नहीं पर खीझकर देखा, बहुत ही खीजकर देखा और हारमोनियम का भाता जोर-जोर से भरना शुरू कर दिया, एक-दो, तीन-चार, पाँच। सब तनाव में आ गए थे। मैं तो बहुत तनाव में था कि अब क्या होगा। लग रहा था कि ये आदमी हारमोनियम तोड़ देगा। छह-सात भाते भरने के साथ वे अपने हाथों को हवा में ऊपर नीचे करने लगे और देखते ही देखते, ‘संसार के सागर में’.. की अंतिम चाल सामने थी। मैं अवाक् था। देखता ही रह गया। तब तो उन्होंने मेरी ओर नहीं देखा। वे कहीं और ही देख रहे थे, ऐसा लग रहा था कि वे मनवा रहे थे कि बोल बेटा अब क्या बोलता है। सिटिंग खत्म होने के बाद सब बाहर जाने की तैयारी में थे। मैं भी तुरंत बाहर जाने की फिराक में था। उन्होंने मुझसे कहा तुम रुको। मुझे लगा अब तो मैं गया। सब बाहर रुके थे कि अब इस दाढ़ीवाले (गाडगिल दाढ़ी रखा करते थे) का क्या होता है, देखते हैं। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा लिफ्ट तक ले गए और कहा- यू आर नॉट ओनली माय सिंगर, यू आर माय सिटिंग मेंबर।

मेरे मुँह से निकल पड़ा कि क्या बात, किसी भी व्यक्ति में जरा सा भी कोई गुण दिखता तो वे उस व्यक्ति को अपनी ओर कर लेते थे। हम सुनते आए हैं कि अकबर के दरबार में नव रत्न थे, पर इनके दरबार में शत-प्रतिशत 90 रत्न थे। वे वह गाना उन्हें मुझे ही देना चाहते थे। मैंने गाया भी, रिकॉर्डिंग भी हो गई। उसके बाद जाने क्या राजनीति हुई। कोई तो था जो नहीं चाहता था कि वह वह गीत गाऊँ। चेतन आनंद का फिर से ब्रेनवाश किया गया और वह गाना मो. रफी की आवाज में रिकॉर्ड होना तय हुआ। तब पंचम दा ने कहा यू आर द कैप्टन आफ द शिप, तुम निर्माता निर्देशक हो। फिल्म के साथ जो करना है, करो लेकिन एचएमवी के पास यह गाना चंद्रशेखर गाडगिल की आवाज में ही जाएगा। हैट्स ऑफ़ टू हिम (पंचम दा), इसलिए रफी साब द्वारा गाये गये गीत की कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं। केवल मूवी में है। फ़िल्म के टाइटल में मेरा नाम है, पर मेरी आवाज नहीं। मेरा रिकॉर्ड और कैसेट एचएमवी का है। और यह सब पंचम दा की वजह से है। नहीं तो मैं किसी को कैसे बताता कि मैंने ही कुदरत का गीत गाया है’।

‘इससे जुड़ा एक किस्सा और है। मो. रफी व पंचम दा की ग्रेटनेस का। मो. रफी की आवाज में उस गीत को गाते समय गाना तीन चार स्केल नीचे किया गय। उसे थोड़ा धीमा भी किया गया और पंच हटा दिए गए। यह सब संगीत निर्देशक ने किया। रफी साब क्या कर सकते थे। तीन पद रफी की आवाज में हुए। ट्रैक तो पहले ही तैयार हो चुका था। तीन पद रिकॉर्ड हो गए। वे दो मिनट रुके चाय-पानी के लिए। वे रुके तब रिकॉर्डिस्ट के केबिन में कोई बोल रहा था, जो रफी साब को उनके हेडफोन में सुनाई दे गया कि यही गाना वो पुणे के दाढ़ीवाले ने कितना बढ़िया गाया था। इतना सुनते ही रफी साब ने कहा पंचम इधर आओ। पंचम रफी के सिंगर केबिन में गए। उन्होंने पूछा कि क्या यह गाना किसी और ने गाया है। पंचम उनसे क्या झूठ बोलते, हाँ कह दिया। मो. रफी ने हेडफोन निकाल कर पंचम दा से कहा कि क्यों किसी नए कलाकार की जिंदगी मेरे हाथों बर्बाद करते हो और चौथा पद रफी साब ने गाया ही नहीं। वे चौथा पद गाए बिना चले गए। तीन पद वे पहले गा चुके थे, उसका तो कुछ नहीं हो सकता था। फिल्म में तीन पद सुनाई देते हैं। मेरे द्वारा रिकॉर्डेड गीत में चार पद हैं। कुदरत, पंचम दा और मैं हम तीनों के बारे में बताने के लिए इतनी बातें हैं कि पूरी किताब लिखी जा सकती है’।

उस इंटरव्यू में चंद्रशेखर गाडगिल ने इतना ही वक्तव्य दिया और 2 अक्टूबर 2014 को वे इस दुनिया से चले गए।

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