“उजाले अपनी यादों के…” : बशीर बद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि

बशीर बद्र- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
जिंदगी की सच्चाई से रूबरू कराने वाले शायर- बशीर बद्र कल इस दुनिया से चले गए।

बशीर बद्र जब ग़ज़ल कहते थे तो गोया बात करते थे। जब दर्द बयां करते थे तो जैसे दुखती रग को छूते थे। जब इश्क़ मोहब्बत के अशआर कहते थे तो रूह तक पहुँचते थे। उनकी शैली, उनकी कलम भावपूर्ण और आम बातचीत जैसी लगती हैं, उनकी सरल भाषा का प्यार और तड़प ना जाने कैसे दिल से जुड़ती है।
बशीर बद्र अपने अंतिम समय में सब कुछ भूल गए पर शायद इसे ही शायर का खुद से जुड़ना कहते हैं। यकीनन वो अपनी उस दुनिया में नायाब शेर लिख रहे होंगे जिसे वो स्वयं तक रखना चाहते थे। युवा पीढ़ी हो या पुरानी पीढ़ी हर कोई उनकी शायरी में स्वयं को तलाशता है और उनकी गजलों से पाठक आत्मसात् करता है।

एक ऐसा मशहूर शायर जिसने वो मंजर देखा जब उसका घर जला दिया गया और तब भी उसने अपने साथ जमाने के दर्द को बयां करते हुए लिखा-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

बशीर बद्र आधुनिक उर्दू शायरी की एक ऐसी बहुत बड़ी हस्ती थे, जिन्हें अपनी सरल, बोलचाल की भाषा और गहरी भावनात्मक गहराई के ज़रिए पारंपरिक ग़ज़ल को एक नया रूप देने के लिए सराहा जाता है। अपने लंबे और शानदार करियर के दौरान, उन्होंने 18,000 से ज़्यादा शेर लिखे, जिनमें उन्होंने प्यार की पेचीदगियों, इंसानी दुखों और हिम्मत को बख़ूबी बयां किया।
15 फरवरी, 1935 को अयोध्या, उत्तर प्रदेश में सैयद मुहम्मद बशीर के नाम से जन्मे बद्र ने अपनी उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पूरी की, जहाँ उन्होंने मास्टर डिग्री और डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की, और बाद में वहीं पढ़ाया भी। अपनी अकादमिक विशेषज्ञता के चलते उन्होंने सत्रह साल से भी ज़्यादा समय तक मेरठ कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर भी काम किया। पर एक दिन मेरठ में हुए भयानक सांप्रदायिक दंगों में बद्र का घर, किताबें और उनकी अप्रकाशित पांडुलिपियाँ जलकर राख हो गईं। इस भयानक नुकसान ने उन्हें मेरठ छोड़ने पर मजबूर कर दिया। वह हमेशा के लिए भोपाल चले गए, जहाँ उन्होंने बड़ी हिम्मत से अपनी ज़िंदगी, अपनी कला और अपने परिवार को फिर से संवारा। इस सदमे और उसके बाद के नए सिरे से जीवन शुरू करने के अनुभव ने उनकी बाद की रचनाओं में एक गहरा दर्द भर दिया, कलम लिखती चली गई । शारीरिक रूप से कमज़ोर होता हुआ ये शायर मानसिक रूप से ना केवल स्वयं सशक्त हुआ बल्कि विस्थापितों और टूटे दिलों वालों की आवाज़ के तौर पर लेखनी से आवाज़ उठाई।
20वीं सदी के मध्य में बद्र के उभरने से पहले, उर्दू ग़ज़ल अक्सर कठोर, पारंपरिक फ़ारसी प्रतीकों और रिवाजों में जकड़ी हुई थी। बद्र ने सुलभ और समकालीन उर्दू का इस्तेमाल करके इस स्थिति को बदल दिया, जिससे उनके शेर आम आदमी के दिलों को गहराई से छूने लगे। उनके काम में शहरी अकेलेपन, उम्मीद की नाज़ुकी और गहरी तड़प जैसे विषय प्रमुखता से उभरकर सामने आते हैं। उनके कुछ सबसे यादगार शेर उनकी इस बोलचाल वाली शैली की महारत को बख़ूबी दिखाते हैं:
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
या फिर आज की पीढ़ी की नयी सोच का

“दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है उस को भूल जाने में”
ये शेर कई युवाओं को ओपन माइक पर बोलते हुए या तथाकथित ब्रेकअप का जश्न मनाते हुए सुना है।

अपने पूरे जीवनकाल में, बद्र ने शायरी के कई मशहूर संग्रह प्रकाशित किए। खास बात यह है कि उनके संग्रह ‘आस’ को, जिसमें 69 ग़ज़लें शामिल थीं, 1999 में प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उसी वर्ष, उन्हें भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान, ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया।
1980 से 2000 के बीच, उनकी लिखी पंक्तियों को जगजीत सिंह, तलत अज़ीज़ और हरिहरन जैसे दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज़ दी और रिकॉर्ड किया; इस तरह उर्दू शायरी सीधे दक्षिण एशियाई मध्यम वर्ग के घरों तक पहुँच गई। उनके शेरों का इस्तेमाल समकालीन भारतीय सिनेमा में भी रचनात्मक ढंग से किया गया, और वे ‘मसान’ (2015) तथा ‘डेढ़ इश्किया’ (2014) जैसी फ़िल्मों में नज़र आए।
91 वर्ष के ये ज़हीन शायर लंबे समय से डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) से जूझ रहे थे। असल में व्यक्ति जब स्वयं से जुड़ जाता है तो अपने आस-पास का सब भूल जाता है। निश्चित रूप से वो अपने भीतर की दुनिया में अपने लिए ग़ज़ल कह रहे होंगे।

जाने-माने गीतकार जावेद अख़्तर ने सार्वजनिक रूप से उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि “हमारी भाषा उर्दू थोड़ी और ग़रीब हो गई है।” आज, बद्र को उन महान आधुनिक उर्दू कवियों में से अंतिम कवि के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने ग़ज़ल को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। दुख और जीवन की कठोर सच्चाइयों को शालीनता और उम्मीद के साथ व्यक्त करने की उनकी क्षमता यह सुनिश्चित करती है कि साहित्यिक जगत में उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी।

बशीर बद्र यूँ तो इस दुनिया से कल चले गए पर असल में उनकी कलम सदियों तक बात करती रहेगी।

स्थानीय संपादक :— अनीता वर्मा

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