एक जाते हुए शायर के साथ तमाम रूहानी दुनियाबी दास्तान ख़त्म हो जाती है | बशीर वद्र गये उनके जाने का ग़म उनकी शायरियों में रूलाई बन कर फूट रही है। कैसे कहूं ‘अलविदा बशीर बद्र’ | वे तो ख़ुद कहते हैं कि “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…फिर शाम का क्या बशीर वद्र साहब। उनकी शायरी हमारे पास दरिया की लहरों की तरह आती है और उत्तर आधुनिक ज़माने की फितरत से हमारा तारूफ़ करा के चल देती हैं | ऐसे शायर जो हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी का पाठ पढ़ा दे – उसे कोई कैसे भूल जाएं | अक्षर ब्रह्म को अलविदा कहना नामुमकिन हो रहा है..हम भींगे एहसासों से कुछ भी लिखें वह आपके लिए रूई का एक फाहा होगा.. जिसके होने से महफ़िल गुलजार हो ऐसे शायर कम ही होते हैं। एक वाक्या सांझा करें तो ये बात होगी 1995 की। उस दिन राजधानी का तारीखी शंकर-शाद मुशायरा चल रहा था। मॉडर्न स्कूल के सभागार में उर्दू शायरी के शैदाई कुछ खास सुनना चाह रहे थे। मुशायरे में रंग नहीं जम रहा था। तब मुशायरा का संचालन कर रहे नामवर शायर गुलजार देहलवी ने बशीर बद्र को अपने कलाम पढ़ने की दावत दी। गुलजार साहब समझ रहे थे कि बशीर साहब के आने के बाद मुशायरा जम जाएगा। ये ही हुआ। बशीर साहब ने अपने खास अंदाज में अपने कुछ मकबूल शेर पढ़े। उन्होंने पहला शेर सुनाया – ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…।’ इस शेर के पढ़ते ही सभागार गूंजने लगा- बशीर साहब फिर पढ़िए… फिर पढ़े।

अभी सभागार में कुछ शांति हुई थी कि बशीर साहब ने अब अपना मकबूल शेर-

‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों…।’


इसे पढ़ने के साथ उन्होंने मुशायरा लूट लिया।

उन्हीं हर दिल अजीज बशीर बद्र साहब का जाना दिल-ज़िगर को चाक कर रहा है । उर्दू अदब का एक रौशन चिराग बुझ गया। वे आधुनिक उर्दू शायरी के शिखर पुरुष थे, जिनकी ग़ज़लों ने लाखों दिलों को छुआ। सरल ज़बान, साफगोई, गहरी संवेदना और इंसानी ज़िंदगी की मज़बूरियों को बयान करने का उनका अंदाज़ बेमिसाल था। बशीर साहब की शायरी में इश्क़ की तड़प हो, ज़िंदगी की उदासी हो या समाज की हक़ीक़त, सब कुछ इतनी आसानी से उतरता था कि आम आदमी भी अपनी कहानी सुन लेता था। संवेदनाओं की यही तरलता उनकी प्रासंगकिता को मुखर करता है।

डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ। अवध संस्कृति और नफ़ासत, गंगा-जमुनी तहज़ीब को शायरी में घोलने वाले बशीर साहब की शायरी में अपनी मिट्टी की ख़ुशबू मिलती है | वे उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ आये और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीए, एमए और पीएचडी की। उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक सेवा की। लेकिन 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जल गया, अप्रकाशित क़लाम राख हो गयी। फिर भी उनकी रूह ने हार नहीं मानी। वे भोपाल शिफ्ट हो गए और वहां से भी शायरी की रोशनी बिखेरते रहे। उनकी ‘इकाई, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘इमेज’ जैसी किताबें उर्दू अदब के खज़ाने हैं। उन्हें उर्दू साहित्य अकादमी अवॉर्ड, भारत सरकार का पद्मश्री सम्मान और कई उर्दू अकादमियों के सम्मान उन्हें मिले।

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी है। उन्होंने जदीद ग़ज़ल को नई तासीर दी। पुरानी परंपरा की जटिलताओं से दूर, उन्होंने बोलचाल की ज़बान में इतना गहरा असर पैदा किया कि मुशायरों में उनका क़लाम सुनकर लोग वाह-वाह करते रह जाते। उनकी शायरी इश्क़ की तहज़ीब पर टिकी है, लेकिन वो इश्क़ महज़ रोमांटिक नहीं, बल्कि इंसानी फितरत का आईना है। उनका बहुप्रचलित शे’र: ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी यूँ कोई बेवफा नहीं होता’

इस शेर में उन्होंने बेवफाई को भी इंसानी मजबूरी या सामंती समाज की प्रेम विरुद्ध रवायतों और कमज़ोरियों से जोड़ दिया। उसे ग़लत नहीं ठहराया, बल्कि समझने की कोशिश की। यही उनका हुनर था। दर्द को बयान करना बिना नफरत के, बिना जजमेंटल हुए । उनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी की रफ़्तार, वक़्त की बेरुखी और यादों की अहमियत बार-बार आती है। “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो” वाला शेर तो आज भी हर उस शख्स की ज़बान पर है जो गुज़रे वक़्त को संभाल कर रखना चाहता है। यादें उनके लिए रोशनी हैं, जो अंधेरी गलियों में भी साथ देती हैं।

बशीर बद्र ने इश्क़ को नया रूप दिया। उनका इश्क़ न तो फ़रहाद-शिरीं वाला था, न लैला-मजनूं का पारंपरिक। बल्कि आधुनिक इंसान की तन्हाई, बिछड़ने का गम और मिलने की उम्मीद से भरा हुआ था। बेशक ‘न जी भर के देखा न कुछ बात की बस एक आस बाकी रह गई’ जैसे शेर उनकी ग़ज़लों को अमर बना देते हैं। मुहब्बत में दिखावा नहीं, सच्चाई चाहते हैं। वे कहते हैं कि मुहब्बत में ज़रूरत नहीं, बस एक एहसास ही काफी है। हम देखें तो उनकी शायरी में समाज की हक़ीक़त भी झलकती है। दंगों का दर्द, इंसानी रिश्तों की नाज़ुकी, वक़त के साथ बदलते रिश्ते की चाह और जरूरत भी | इन सब के बीच दोस्ती-दुश्मनी का संतुलन सब कुछ उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में है। “दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे” वाला शेर तो आज भी साम्प्रदायिकता और नफ़रत के माहौल में मिसाल बनता है। सही मायने में गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रामाणिक आवाज़ | वे इंसानियत के शायर थे। ज़िंदगी ने उन्हें बहुत कुछ छीना, लेकिन उन्होंने कभी उम्मीद और इंसान पर यक़ीन नहीं छोड़ा।

बशीर बद्र की शायरी की एक और खासियत है उसका संगीतमय अंदाज़। कई फ़िल्मों में उनकी ग़ज़लें गाई गईं | उनके ज़बान की सहजता उन्हें आम श्रोता से जोड़ता है | उनकी जनधर्मिता उनकी लोकप्रियता का आधार है। उन्होंने कहा भी था कि ग़ज़लों के साथ उनका कई जन्मों का है।इसीलिए एहसासों की गहराई बहुत स्वाभाविक हैं। बशीर साहब ने ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो’ शेर में उत्तरआधुनिक शहर की ठंडक, रिश्तों की औपचारिकता, दुनियाबी नातों से मोह-भंग, दरकते विश्वासों और दिलों की गहराती दूरी को बखूबी बयान किया है। वे ज़माने के बदलाव को समझते थे और उसे शायरी में ढाल देते थे।

उन्होंने अपने पीछे उर्दू शायरी की समृद्ध विरासत छोड़ी। उनकी तक़रीबन 18 हजार शेरों का खज़ाना है। इतनी बड़ी तादाद में
भी हर शेर में ताज़गी है। वे कहते थे कि शायरी ज़िंदगी का आईना है। उनकी ग़ज़लें आंसुओं से भीगी भी हैं तो उन गीली आंखों में उम्मीद की किरण बन कर चमकती भी हैं।

बशीर बद्र का सबसे बड़ा योगदान है कि उर्दू ग़ज़ल को उन्होंने आम लोगों तक पहुंचाया और उसके माध्यम से बेदारी पैदा करने की कोशिश की | वे जाने-माने उर्दू आलोचक भी रहें । उनकी पुस्तक “आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला” बहुत महत्वपूर्ण है और “बीसवीं सदी में ग़ज़ल”बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी आलोचना से उर्दू शायरी के अदब को समझने और सिखाने का काम भी किया।

उनके इंतकाल से उर्दू अदब के एक युग का अंत हो गया। लेकिन उनकी शायरी ज़िंदा रहेगी। मुशायरों में, ज़ुबानों पर, दिलों में। बशीर बद्र साहब ने साबित किया कि शायर सिर्फ शेर कहने वाला नहीं, बल्कि ज़माने का गवाह होता है। उनकी ग़ज़लें आज भी हमेशा छूती हैं और रहेंगी | क्योंकि वे हमनुमा हमारे अपने दर्द, अपनी उम्मीद और अपनी कहानी बयान करती हैं। उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो… ये शेर अब उनकी याद में और भी गहरा हो गया है। हम भावनाओं के उमड़ते ज्वार के साथ विदा कर रहें है।

बशीर बद्र साहब! आपकी शायरी अमर है। आपकी रूह को सलाम। तफ़सील से फिर ग़ज़लों से रूहानी मुलाक़ात होगी….सादर नमन

शोककर्ता :— डॉ. पूनम सिंह

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