“यादों की ढलती शाम और बद्र का उजाला”- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…”
स्टेशन के किसी कोने में बैठकर जब चाय की सुड़कती चुस्की के साथ यह शेर कानों में पिघलता है, तो भीतर कुछ टूटता है। यह बद्र साहब की जादुई दुनिया है। अमूमन शायर अपनी ग़ज़लों से महफ़िल लूटते हैं, मगर डॉ. बशीर बद्र ने इंसानी तन्हाई को लूटा। उन्होंने उस वक़्त लिखना शुरू किया जब अदब पर एक ख़ास वर्ग का पहरा था। उन्होंने शायरी को कोठियों से निकालकर उस पगडंडी पर ला खड़ा किया जहाँ आम आदमी फटे जूते पहने अपनी रोटी की जद्दोजहद में मसरूफ़ था। वे महज़ तुकबंदी के उस्ताद नहीं थे; वे तो उस बंजारे दिल की धड़कन थे जो जानता था कि ज़िंदगी की शाम बेहद अनजानी है। उनकी लिखी हर पंक्ति दरअसल एक थके हुए मुसाफ़िर के कंधे पर रखा हुआ हमदर्द हाथ है।
बशीर साहब का सबसे बड़ा कमाल यह था कि उन्होंने कभी भारी-भरकम शब्दों का लबादा नहीं ओढ़ा। जब लोग फ़ारसी और अरबी की भूलभुलैया में खोए थे, तब इस शख़्स ने हिंदी और उर्दू के उस सुंदर संगम को चुना जिसे आम अवाम अपनी रसोई और आँगन में बोलती है। वे जानते थे कि दिल की बात पहुँचाने के लिए ज़बान की सख़्ती नहीं, बल्कि लहजे का भोलापन ज़रूरी है।
“आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा, कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा” इस शेर की गहराई को नापिए। यहाँ कश्ती का मुसाफ़िर वह आधुनिक इंसान है जो सतह पर तो सब कुछ देखता है, मगर किसी की रूह के भीतर झाँकने की फ़ुरसत उसके पास नहीं है। बद्र साहब ने इंसानी रिश्तों के इसी सतहीपन को बिना किसी शोर के, बेहद ख़ामोशी से बेनक़ाब कर दिया।
कहानियाँ बहुत सी हैं, मगर बशीर साहब ने वक़्त के बदलते मिज़ाज को जिस बारीकी से समझा, वैसा कोई दूसरा न कर सका। आज के इस दौर में जहाँ लोग सोशल मीडिया पर हज़ारों ‘फ्रेंड्स’ पाकर भी अकेले हैं, वहाँ बद्र साहब दशकों पहले एक चेतावनी लिख गए थे। “कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो…” यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि महानगरों की उस ठंडी और पथरीली बेरुखी का एक्सरे है जहाँ गर्मजोशी को एक बीमारी समझा जाता है। वे हमें आगाह करते हैं कि अपनी भावनाओं को थोड़ा सहेज कर रखो, क्योंकि यह नई दुनिया जज़्बातों की क़द्र करना भूल चुकी है। यहाँ हर कोई अपनी एक बनावटी दीवार खड़ी करके जी रहा है।
अक्सर जब कोई शख़्स उम्र के एक पड़ाव को पार कर लेता है, तो उसकी अपनी जड़ों से दूरी उसे भीतर ही भीतर खोखला करने लगती है। बशीर साहब ने इस अजनबी अहसास को भी बड़ी सिद्दत से काग़ज़ पर उतारा है। “बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे, इक ‘उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा” इस पंक्ति में उस मध्यवर्गीय नौकरीपेशा इंसान का समूचा जीवन सिमट आया है जो सुबह अँधेरे में निकलता है और रात ढले लौटता है। अपने ही घर में अजनबी हो जाने की यह टीस इतनी गहरी है कि इसे पढ़ते ही रीढ़ में एक सिहरन सी दौड़ जाती है। उन्होंने यह मुकाम किसी आरामगाह में बैठकर नहीं पाया, बल्कि इसके पीछे उनके जीवन की एक लंबी और अंतहीन यात्रा रही है।
ज़िंदगी में जब मंज़िलें सामने होती हैं, तो लोग अक्सर रास्तों की कठिनाइयों को भूल जाते हैं। मगर बद्र साहब ने सफ़र के संघर्ष को कभी ओझल नहीं होने दिया। “जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है, आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा” यह शेर उस मुसाफ़िर का घोषणापत्र है जो केवल लक्ष्य की पवित्रता को जानता है। उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं कि उसने कितनी दूरी तय कर ली है या कितना थक चुका है। उसकी आँखें तो बस उस क्षितिज पर टिकी हैं जहाँ उसे पहुँचना है। यही वह सादगी भरा जीवट है जो उनकी शायरी को हर उस युवा के लिए एक मशाल बना देता है जो अपनी ज़िंदगी में कुछ कर गुज़रने का ख़्वाब देख रहा है।
मगर दुनिया बड़ी ज़ालिम है; वह उगते हुए सूरज को तो सलाम करती है, लेकिन उसके पीछे की तपिश को नहीं समझती। बशीर साहब की सफलता को देखकर जलने वालों की कमी नहीं थी, मगर उन्होंने अपने दर्द को भी एक ख़ूबसूरत शक्ल दे दी। “ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं, तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा” इस एक पंक्ति में उन्होंने अपने आलोचकों को वह आईना दिखा दिया जिसकी चमक से आँखें चुंधिया जाएँ। वे कहते हैं कि मेरी इस शोहरत और इस मक़बूलियत के पीछे कांटों की वह सेज है जिस पर मैं ताउम्र सोया हूँ। उन्होंने बिना किसी कड़वाहट के यह समझा दिया कि विरासत में केवल ज़मीनें मिलती हैं, हुनर तो अपने ख़ून से सींचकर ही पैदा किया जाता है।
प्यार और दोस्ती में मिलने वाले धोखे इंसानी दिल को अक्सर पत्थर बना देते हैं। मेरठ के दंगों में जब उनका भरा-पूरा घर जल गया, उनकी अनमोल डायरियाँ राख हो गईं, तब भी उनके भीतर का इंसान नहीं मरा। उन्होंने नफ़रत का जवाब नफ़रत से नहीं, बल्कि एक असीम उदासी और मोहब्बत से दिया। “यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने, फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा” यह शेर उस गहरे विश्वासघात की कहानी कहता है जहाँ घाव पीठ पर नहीं, बल्कि ठीक सीने पर और अपनों के द्वारा दिया गया हो। बशीर साहब ने उस ज़ख्म को सहलाया और उसे एक ऐसी शाश्वत कविता में बदल दिया जो हर उस दिल का मर्म बन गई जिसने कभी किसी पर अंधा भरोसा किया था।
उनकी शख़्सियत में एक अजीब सा सूफ़ीपन था, एक बेलौस अंदाज़ जो हर चीज़ को एक झटके में छोड़ देने का माद्दा रखता था। अतीत के मोहापाश में बँधकर रोना उनकी फ़ितरत नहीं थी। “महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें, जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा” यह शेर जीवन के उस कठिन दर्शन को समझाता है जिसे पाना संन्यासियों के लिए भी मुश्किल होता है। वे कहते हैं कि जो पीछे छूट गया, वह चाहे कितना भी अज़ीज़ क्यों न हो, उस पर बार-बार हसरत की निगाहें डालना अपनी ही गरिमा को कम करना है। आगे बढ़ने का नाम ही ज़िंदगी है, और इसी फलसफे ने उन्हें हर विपरीत परिस्थिति में टूटने से बचाए रखा।
शायरी के शिल्प पर बात करें तो उनकी लिखावट में एक गज़ब की सुलेखीय सुंदरता थी, जो सीधे रूह में पैठ बनाती थी। “ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं, वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा” यह पंक्ति उस ग़रीब और सच्चे कलाकार की वंदना है जिसके पास भौतिक सुख-सुविधाएँ तो नहीं हैं, लेकिन उसकी उँगलियों में विधाता ने वह जादू दिया है जो पत्थरों को भी जीवंत कर दे। बशीर साहब ख़ुद ऐसे ही एक शिल्पी थे जिन्होंने शब्दों के कच्चे धागों से ऐसी मखमली चादर बुनी जिसे वक़्त का कोई भी तूफ़ान मैला नहीं कर सका। वे पूरी दुनिया के सामने अपनी कोमलता को लेकर बेहद आश्वस्त थे, भले ही लोग उन्हें कठोर समझते रहे।
“पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला, मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा” इस शेर में जो मार्मिकता है, वह अमूमन प्रेम की सबसे ऊँची अवस्था में ही देखने को मिलती है। दुनिया अक्सर हमारी बाहरी सख़्ती को देखकर हमारे भीतर का फ़ैसला कर लेती है। मगर कोई बद्र साहब से पूछे कि उस मोम जैसी रूह को सँभाले रखने में कितनी रातें रोते हुए गुज़री हैं। वे अपने चाहने वालों की इस नासमझी पर भी मुस्कुरा देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि प्रेम में परीक्षा देना ही प्रेमी का पहला और आख़िरी कर्तव्य होता है। उनके इस निश्छल मिज़ाज ने ही उन्हें हर घर का चहेता शायर बना दिया।
जब वे जुदाई और अधूरेपन की बात करते हैं, तो उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक आ जाती है जो सीधे कलेजे को चीरती है। “अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा, मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा” यह पंक्ति उस खोए हुए प्रेम की अमर गाथा है जिसे हर प्रेम करने वाला कभी न कभी महसूस करता है। विकल्प हमेशा मौजूद रहते हैं, दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती, लेकिन उस एक ख़ास इंसान की जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता। बशीर साहब ने इस शेर के ज़रिए उस अद्वितीय और अनमोल प्रेम को प्रतिष्ठित किया है जो बाज़ार के इस दौर में लगभग विलुप्त हो चुका है। वे हमें याद दिलाते हैं कि चेहरों की इस भीड़ में उस एक रूह को ढूँढना ही जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।
वियोग की इस तड़प को और आगे बढ़ाते हुए वे आँखों की उस भाषा को पकड़ते हैं जो शब्दहीन होती है। “तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा, मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा” इस शेर में एक अजीब सा गुरूर भी है और एक बेपनाह बेबसी भी। वे जानते हैं कि दुनिया में रूप-रंग के दीवाने बहुत मिल जाएँगे, लेकिन उस रूहानी गहराई को कहाँ से लाया जाएगा जो सिर्फ़ और सिर्फ़ सच्चे प्रेमी की आँखों में ही तैर सकती है। बद्र साहब का यह अंदाज़ ही उन्हें महफ़िलों का सरताज बनाता था, जहाँ हर इंसान को लगता था कि शायर ने सीधे उसकी ही अधूरी मोहब्बत की दास्तान को बयां कर दिया है।
दिल के सूनेपन और उसके भीतर आने वाले नए मेहमानों की फितरत पर भी उनकी पैनी नज़र थी। “न जाने कब तिरे दिल पर नई सी दस्तक हो, मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा” इस शेर का विश्लेषण करें तो यह जीवन की निरंतरता का सबसे बड़ा नियम है। दिल कभी ख़ाली नहीं रहता; वहाँ यादों, उम्मीदों या नए इंसानों का आना-जाना लगा ही रहता है। मगर बशीर साहब इस बदलाव को एक ठंडी आसाँइश के साथ स्वीकार करते हैं। वे अपने आप को भी इस खेल से अलग नहीं रख पाते और मुस्कुराते हुए कहते हैं— “मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ, अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा” यह स्व-अवरोध की वह स्थिति है जहाँ इंसान ख़ुद ही अपनी खुशियों का रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है, महज़ इस डर से कि कहीं दोबारा दिल न टूट जाए।
बशीर बद्र साहब की शायरी केवल दुख का विलाप नहीं है, बल्कि उसमें मिलन के उन पलों का उत्सव भी है जो जीवन को जीने योग्य बनाते हैं। “तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो… जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो…” वे रिश्तों को सँभालने और उन्हें गरिमा के साथ विदा करने का हुनर जानते थे। “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा…” यह शेर अंधभक्ति और अत्यधिक मोह के ख़िलाफ़ एक कड़ा कसीदा है। वे समझाते हैं कि जीवन में संतुलन ही सबसे बड़ा सत्य है। जब वे कहते हैं— “हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा” तो इस एक पंक्ति में वे समूचे मानव समाज को अपनी शक्ति को पहचानने का हौसला दे जाते हैं।
आज बशीर साहब हमारे बीच सशरीर मौजूद नहीं हैं, मगर जैसा कि वे ख़ुद लिख गए हैं, उनके शेरों के उजाले हमेशा हमारे साथ रहेंगे। उनकी सादगी, उनका यह ‘आम फ़हम’ अंदाज़ और इंसानी जज़्बातों को पन्नों पर बिखेर देने की यह कला इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगी। जब भी कोई दिल टूटेगा, जब भी कोई मुसाफ़िर अपनी मंज़िल की ओर बढ़ेगा, और जब भी कोई अपनी यादों की गली में शाम ढले टहलेगा, बद्र साहब अपनी पूरी रूहानी ताक़त के साथ वहाँ मुस्कुराते हुए मिलेंगे। अलविदा बद्र साहब! इस बेजोड़ और पाक सादगी के लिए यह अवाम हमेशा आपकी ऋणी रहेगी और आपकी यादों के इन उजालों को ताउम्र अपने सीने से लगाकर रखेगी।
