बूढ़ी यादें ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना

याद आ रही तेरी बेटा
दिन में ही अँधियारा छाया
आँखें अब कमज़ोर हो गईं,
सही लग रहा मैला-मैला॥

तू अपने घर उलझा है,
पर मेरा आँगन खाली है
चिंता की बस उछल-कूद है,
मुस्काना मेरा जाली है॥

चाह रहा हूँ भाग यहाँ से
तुझको अपने से लिपटा लूँ
यादों में जी रहा जो अब तक
हाथ बढ़ाऊँ, तुझको पालूँ॥

पर तू उलझा अपने घर में,
शाम उम्र की मेरे तन में
एकाकी ही ढलती जाती…..
कितना भी उलझाऊँ ख़ुद को,
याद तेरी पर बढ़ती जाती॥

चाह रहा हूँ देश पराया 
छोड़, देहरी-घर को आजा
बिखरा-बिखरा जीवन मेरा
मतलब जीने का समझा जा॥

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