“वैश्विक हिंदी परिवार की संगोष्ठी में त्रिभाषा सूत्र और भारतीय भाषाओं के विकास पर गंभीर विमर्श”

दिनांक : 7 जून 2026 (रविवार), विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन संपन्न हुआ। संगोष्ठी का विषय “त्रिभाषा सूत्र, मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं का विकास : चुनौतियाँ, समस्याएँ और समाधान” था। कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन डॉ. वरुण कुमार द्वारा किया गया। उन्होंने अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं एवं उपस्थित सभी श्रोताओं का औपचारिक स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सुरेंद्र दुबे (उपाध्यक्ष, हिंदी शिक्षा मंडल) ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने त्रिभाषा सूत्र के विकास, उससे जुड़ी समस्याओं तथा भाषा के प्रश्न पर हो रही राजनीति पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि त्रिभाषा को अनावश्यक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। भारत एक बहुभाषी देश है और यह हमारी शक्ति है, कमजोरी नहीं। देशाटन एवं तीर्थाटन के माध्यम से विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का परस्पर आदान-प्रदान होता है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाएँ एक ही भाषाई परिवार से निकली हैं तथा अंग्रेज़ों ने सुनियोजित रूप से भारतीय भाषाओं को विभाजित करने का कार्य किया। उन्होंने त्रिभाषा सूत्र की व्याख्या करते हुए बताया कि— R1 (प्रथम भाषा) : छात्र द्वारा चुनी गई पहली भाषा, जिसमें मातृभाषा या कोई अन्य भाषा हो सकती है। R2 (द्वितीय भाषा) : R1 से भिन्न भाषा। यदि R1 के रूप में अंग्रेज़ी चुनी जाती है, तो R2 के रूप में किसी भारतीय भाषा का चयन आवश्यक होगा। R3 (तृतीय भाषा) : R1 एवं R2 से भिन्न एक अतिरिक्त भाषा। डॉ. सुरेन्द्र दुबे ने कहा कि शिक्षा व्यक्ति के भविष्य निर्माण में सहायक होती है, किंतु आज स्वार्थवश विद्यालयों में विदेशी भाषाओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है। अंग्रेज़ी रोजगार दिला सकती है, परंतु सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान अपनी मातृभाषा से ही प्राप्त होता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले 50 वर्षों में लगभग 220 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं और उनके साथ उनकी सांस्कृतिक विरासत भी समाप्त हो गई है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहक भी है। अतः भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि श्री ए. विनोद (संयोजक : शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास) ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, जनजातीय अथवा पहाड़ी भाषा जैसे विभिन्न नामों से विभाजित किया गया है, जबकि ये सभी भारतीय अभिव्यक्ति की विविध धाराएँ हैं। उन्होंने कहा कि भाषाओं के विकास के लिए उन्हें शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक व्यवहार में उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि 1968 की शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र के अंतर्गत अंग्रेज़ी अनिवार्य थी, जबकि नई शिक्षा नीति 2020 में किसी भाषा को अनिवार्य नहीं रखा गया है और विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार भाषा चयन की स्वतंत्रता दी गई है। संगोष्ठी के संरक्षक एवं वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल शर्मा जोशी ने अपनी कविता “पहले मोर्चा” के माध्यम से विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भाषा को राजनीति का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। सभी भाषाओं को सम्मान और उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषायी विखंडन को समाप्त करने में त्रिभाषा सूत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भाषा व्यक्ति की पहचान, अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का आधार है। देश के विकास और सामाजिक एकता में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका है। मुख्य वक्ता श्री प्रणय कुमार (शिक्षाविद् एवं वरिष्ठ स्तंभकार) ने कहा कि कक्षा 6 से 10 तक त्रिभाषा सूत्र विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने बताया कि R1 में मातृभाषा, R2 में हिंदी तथा R3 में विदेशी अथवा अन्य भारतीय भाषा का चयन किया जा सकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि कुछ विद्यालयों में विषयों की अधिकता के कारण हिंदी का स्थान सीमित होता जा रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा भारतीय भाषाओं में निहित है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य दक्षिण भारत से निकलकर पूरे देश में सांस्कृतिक एकता का संदेश देने में सफल हुए। कुंभ जैसे आयोजनों में भी भाषायी विविधता बाधा नहीं बनती। उन्होंने कहा कि त्रिभाषा सूत्र भारत की सांस्कृतिक एकता की कुंजी है। तमिलनाडु के सीबीएसई विद्यालयों में हिंदी का अध्ययन तथा कर्नाटक में लगभग 7.5 लाख विद्यार्थियों द्वारा हिंदी को वैकल्पिक भाषा के रूप में अपनाना इसका प्रमाण है। शोधों के अनुसार मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों का बौद्धिक विकास अधिक प्रभावी होता है। विशिष्ट अतिथि प्रो. संध्या सिंह (एनसीईआरटी) ने अपने वक्तव्य में कहा कि त्रिभाषा का विषय संवाद का विषय होना चाहिए, विवाद का नहीं। उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 1369 भाषाएँ दर्ज की गई हैं, जिनमें 22 अनुसूचित भाषाएँ हैं तथा लगभग 49 भाषाएँ प्रमुख भाषाओं के रूप में विकसित होने की क्षमता रखती हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भाषाओं के विकास और बहुभाषिकता को विशेष महत्व दिया है। बहुभाषिकता की अवधारणा 1986 की शिक्षा नीति में भी उभरकर सामने आई थी। उन्होंने मातृभाषा-आधारित बहुभाषिक शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि एक भाषा का ज्ञान दूसरी भाषा सीखने में सहायक होता है। सुप्रसिद्ध चिंतक डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ने पाठ्यक्रम निर्माण और त्रिभाषा सूत्र के क्रियान्वयन से संबंधित चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 1 जुलाई से त्रिभाषा सूत्र लागू किए जाने की योजना है, किंतु इसके संबंध में न्यायालय में याचिकाएँ भी दायर की गई हैं। उनका मत था कि भाषा सीखना आत्मीयता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ाता है, परंतु इसके लिए पर्याप्त शिक्षकों, संसाधनों और प्रशासनिक ढाँचे की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को बोझ नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। अगले वक्ता श्री राजेश वर्मा (कुलपति, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर) ने अपने जीवनानुभवों के माध्यम से त्रिभाषा सूत्र के महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि इस सूत्र को लागू होने में कई दशक लगे हैं, इसलिए आज इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उन्होंने प्रशासनिक कार्यों में हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं के उपयोग के अपने अनुभव भी साझा किए। कार्यक्रम के अंत में सुश्री स्वररांगी साने ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं तथा मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित श्री नारायण कुमार एवं प्रो. तोमियो मिजोकामी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री ऋषि कुमार शर्मा ( पूर्व उपसचिव हिन्दी अकादमी दिल्ली ) द्वारा किया गया।
संगोष्ठी में त्रिभाषा सूत्र, मातृभाषा-आधारित शिक्षा तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श हुआ। सभी वक्ताओं ने भारतीय भाषाओं के सम्मान, बहुभाषिकता के विकास तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने में भाषाओं की भूमिका पर विशेष बल दिया।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
